डॉ. स्मिता। हम प्रायः समाज को कोटियों यानी वर्गों या श्रेणियों में बांटकर देखने के आदी हो गए हैं। दलित, जनजाति, सवर्ण, हिंदू, मुस्लिम जैसी अनेक कोटियां समाज को देखने के हमारे नजरिये पर हावी रहती हैं। हम अक्सर समाज को इन्हीं स्थिर वर्गों के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं और मान लेते हैं कि सामाजिक वास्तविकता इन्हीं सीमाओं के भीतर पूरी तरह समाहित हो जाती है, लेकिन हम यह नहीं सोचते कि इन कोटियों के बीच भी अनेक ऐसे सामाजिक समूह मौजूद हो सकते हैं, जो इन निर्धारित श्रेणियों में पूरी तरह समाहित नहीं होते। हम यह भी समझना नहीं चाहते कि ये कोटियां हमेशा कठोर और स्थायी नहीं होतीं, बल्कि कई बार लचीली और परिवर्तनशील भी होती हैं। सामाजिक जीवन की जटिलता कई बार इन कोटियों की सीमाओं को चुनौती देती है।

वास्तव में समाज की संरचना इतनी सरल नहीं होती कि उसे केवल कुछ तयशुदा श्रेणियों में पूरी तरह समझ लिया जाए। दलित एवं जनजाति दो ऐसी कोटियां हैं, जिन्हें हमारी राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था ने विशेष रूप से निर्मित किया है। औपनिवेशिक जनगणना के दौरान पहली बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की कोटियां बनाकर अनेक विविध सामाजिक समूहों को उनमें सम्मिलित कर दिया गया। औपनिवेशिक शासन की रणनीति समाज को अलग-अलग वर्गों में बांटकर शासन को सरल बनाना और कई बार विभाजन की रेखाएं खींचना भी था। इसके परिणामस्वरूप कई ऐसे समुदाय बने रहे, जो इन श्रेणियों में रखे जाने के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को अलग ढंग से समझते एवं विश्लेषित करते रहे।

उदाहरण के लिए, कई दलित जातियां दलित कोटि में दर्ज होने के बावजूद अपने आपको जनजातीय विशेषताओं से युक्त मानती रही हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में रहने वाले मुसहर समुदाय को प्रशासनिक रूप से दलित कोटि में दर्ज किया गया है, किंतु अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक आत्मछवि में वे अपने आपको कई जनजातीय विशेषताओं से युक्त मानते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में कोल और खरवार जैसे समुदायों को प्रशासनिक दृष्टि से अनुसूचित जाति में रखा गया है, जिन्हें कई स्थानों पर जनजातीय माना जाता है। उनके दैनिक जीवन, कर्मकांड, पूजा-पद्धति और सांस्कृतिक व्यवहार में वैसे जनजातीय संस्कृति की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। यह स्थिति दर्शाती है कि सामाजिक वास्तविकता प्रशासनिक वर्गीकरण से कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी होती है।

इन दोनों कोटियों के बीच भी कई ऐसे सामाजिक समूह मौजूद हैं, जो न पूरी तरह इधर के हैं और न पूरी तरह उधर के। वे सामाजिक संरचना में एक प्रकार की मध्यवर्ती स्थिति में रहते हैं। ऐसे समूहों को सिद्धांतकार ‘बीच के समूह’, ‘बीच की अस्मिता वाले समुदाय’ अथवा ‘लिमिनल आइडेंटिटी’ वाले समूह कहते हैं। ये समुदाय समाज की मुख्यधारा में होते हुए भी कई बार पहचान और अधिकार के स्तर पर अस्पष्ट स्थिति में रहते हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसा ही एक समूह है-वनटांगिया समुदाय, जो मुख्यतः महाराजगंज एवं गोरखपुर क्षेत्र के जंगलों में बसता है। इनका मुख्य कार्य जंगलों में विशेष पद्धति से साखू के पेड़ लगाना था। यह स्पष्ट नहीं है कि ये समुदाय कब और कैसे इस क्षेत्र में आए, परंतु इतना निश्चित है कि अंग्रेजी शासन के समय से ही ये इस कार्य से जुड़े रहे हैं।

लंबे समय तक यह समुदाय प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित रहा है। लंबे समय तक उनकी जमीन भी उनकी अपनी नहीं थी। जिन बस्तियों में वे रहते थे, उन्हें वैध मान्यता प्राप्त नहीं थी। उन्हें मतदान का अधिकार भी प्राप्त नहीं था और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ व्यवस्थित रूप से मिल पाता था। जब किसी समुदाय की पहचान और निवास का वैध आधार ही न हो, तब विकास की योजनाएं भी उन तक पहुंच नहीं पातीं। योगी आदित्यनाथ ने संसद से सड़क तक लड़ाई लड़ी तब वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा मिला और उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ। फिर सरकारी आवास योजनाएं, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य कल्याणकारी नीतियां उन तक पहुंचने लगीं। इस प्रकार वे धीरे-धीरे विकास की धारा से जुड़ सके और उन्हें लोकतांत्रिक सम्मान भी प्राप्त होने लगा।

वास्तव में समाज में ऐसे कई समूह हैं, जो दो स्थापित कोटियों के बीच स्थित हैं और जिनकी पहचान पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है। किसी भी संवेदनशील प्रशासन का नैतिक दायित्व है कि ऐसे उपेक्षित और भटके हुए समुदायों की पहचान करे और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़े। इसके लिए आवश्यक है कि हम केवल बनी-बनाई कोटियों के दबाव में न रहें, बल्कि नए सामाजिक अनुसंधानों और अध्ययन के माध्यम से समाज की जटिल वास्तविकताओं को समझने का प्रयास करें। राजनीतिज्ञों को भी आगे आकर ‘उपेक्षितो में भी उपेक्षित’ समूहों के पहचान, विकास एवं सम्मान की लड़ाई लड़नी चाहिए। इसके लिए प्रशासन, नीतियों और ज्ञान की नई दृष्टि विकसित करनी होगी, ताकि समाज के ऐसे अदृश्य या उपेक्षित समूहों को पहचान, सम्मान और विकास के अवसर प्रदान किए जा सकें। नहीं तो ऐसे समूह विकास की धारा में छूटे ही रह जाएंगे और इन समूहों तक विकास एवं जनतांत्रिक चेतना का पहुंचना मुश्किल हो जाएगा।

(लेखिका जन नायक चंद्रशेखर यूनिवर्सिटी, बलिया के समाजशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)