माओवाद से मुक्ति की समयसीमा निकट आ जाने के पूर्व बस्तर में 25 लाख के इनामी माओवादी सरगना पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ जिस तरह हथियार डाले, उसे माओवादियों के इस सबसे बड़े गढ़ में माओवादी हिंसा के अंत का एक निर्णायक क्षण मानना स्वाभाविक है, क्योंकि यह इस क्षेत्र का आखिरी बड़ा माओवादी सरगना माना जाता था।

देश का माओवाद से मुक्ति की कगार पर पहुंचना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस उपलब्धि के लिए पूरा श्रेय मोदी सरकार और विशेष रूप से गृहमंत्री अमित शाह को जाता है, जिन्होंने यह संकल्प लिया कि एक निश्चित अवधि में माओवादियों को घुटने टेकने के लिए विवश किया जाएगा। यह संकल्प पूरा होता इसलिए दिखाई दे रहा है, क्योंकि सुरक्षा बलों ने एक व्यापक और कहीं अधिक प्रभावी रणनीति के तहत माओवाद के खात्मे का अभियान छेड़ा।

अच्छी बात यह रही कि इस अभियान में माओवाद ग्रस्त सभी राज्यों और वहां के सुरक्षा बलों ने पूरा सहयोग दिया। यदि माओवाद दशकों से देश के लिए सिरदर्द और आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना रहा तो इसीलिए कि पहले की सरकारों ने उससे निपटने के मामले में वैसी प्रतिबद्धता का परिचय नहीं दिया, जैसी आवश्यक थी।

अब जब माओवाद अंतिम सांसें गिनता दिख रहा है तो यह ध्यान रहे कि ग्रामीण क्षेत्रों में हथियारबंद माओवादी भले ही असहाय-निरुपाय दिख रहे हों, लेकिन अर्बन नक्सल कहे जाने वाले उनके उन समर्थकों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, जो माओवादी संगठनों को वैचारिक खुराक देते रहे हैं। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों को हताश-निराश माओवादियों को फिर से सिर उठाने का अवसर नहीं देना चाहिए।

यह हिंसक विचारधारा किसी भी सूरत में दोबारा नहीं पनपनी चाहिए। माओवाद घोर अतिवादी एवं सभ्य समाज को चुनौती देने वाली एक विषैली और विजातीय विचारधारा है। स्पष्ट है कि इस विचारधारा का सामना विचार के स्तर पर भी करना होगा। ऐसा करते समय यह भी स्मरण रखना होगा कि निर्धन-वंचित ग्रामीणों और विशेष रूप से वनवासियों के हितों की रक्षा की फर्जी आड़ लेकर पनपी इस विचारधारा को समय-समय पर राजनीतिक संरक्षण भी मिला।

चूंकि माओवादी भोले-भाले ग्रामीण लोगों के हितों के बहाने कमीशनखोरी और उगाही करने वाले गिरोह में तब्दील हो गए थे, इसलिए वे अपने को सशक्त करते चले गए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि वे विभिन्न स्रोतों से आधुनिक हथियार एवं विस्फोटक भी हासिल करने में समर्थ रहे।

यह सबको और विशेष रूप से माओवादियों के दबे-छिपे समर्थकों और उनसे हमदर्दी रखने वालों को समझने की आवश्यकता है कि माओवाद सरीखी विनाशकारी विचारधारा के लिए इस देश में कोई स्थान नहीं हो सकता।