विचार: संतुलित विदेश नीति का सुफल
वैसे भी ट्रंप जैसे अस्थिर व्यक्ति का चापलूस बनकर पश्चिम एशिया में मध्यस्थता करना खतरों से खाली नहीं है और भारत ने इस मामले में परहेज करके अपने आप को अनावश्यक उलझनों से बचाने का ही काम किया है।
HighLights
भारत की कूटनीति ने जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की।
ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों का एकसाथ विश्वास बनाए रखा।
भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा की, रणनीतिक तेल भंडार मजबूत किए।
श्रीराम चौलिया। संकट में ही वास्तविक चरित्र का परिचय मिलता है। इस संदर्भ में पश्चिम एशिया में जारी युद्ध एक ताजा पड़ाव बनकर उभरा है। अमेरिका और इजरायल बनाम ईरान युद्ध ने विश्व की सुरक्षा, आर्थिकी और स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। हर देश को इससे उपजी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, पर भारत ने इस संकट में जैसी कूटनीति का प्रदर्शन किया, वह परिपक्व एवं फलदायी साबित हुई है। इसके परिणाम हमारे सामने हैं।
देखा जाए तो पश्चिम एशिया में भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासियों का कल्याण और भूराजनीतिक तथा भूआर्थिकी से जुड़े मुद्दे अहम हैं। भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कुल तेल का लगभग 50 प्रतिशत और कुल गैस का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। जब ईरान ने होर्मुज जलमार्ग से तेल एवं गैस ले जाने वाले जहाजों पर हमले शुरू किए, तो नई दिल्ली ने तेहरान के साथ सीधे बातचीत का विकल्प चुना और अपने जहाजों की उस संकरे समुद्री मार्ग से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित कराई।
भारतीय तेल और गैस वाहक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा इसीलिए संभव हुई, क्योंकि तेहरान ने नई दिल्ली को अपना मित्र और शत्रु खेमे से दूर माना है। ईरान ने भारत को इस श्रेणी में शामिल किया, क्योंकि भारत ने उस पर हमला करने वाले अमेरिकी-इजरायली खेमे की कोई सामरिक सहायता नहीं की। व्यावहारिक कारणों के चलते भारत ने भले ही अमेरिका-इजरायल आक्रमण की प्रत्यक्ष निंदा नहीं की हो, किंतु युद्ध की शुरुआत से ही भारत बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान के समर्थन में खड़ा है।
इतिहास पर दृष्टि डालें तो भारत ने ईरान के साथ 2003 से ही रणनीतिक साझेदारी निभाई है। इसके अंतर्गत तेल खरीदारी के साथ ही चाबहार बंदरगाह के निर्माण में योगदान दिया। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत और ईरान के बीच कारोबार कुछ सिकुड़ा है, लेकिन भारत प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के लिए प्रयासरत रहा है। ऐसे में विपक्षी दलों के वे आरोप आधारहीन ही हैं कि मोदी सरकार ने अमेरिका-इजरायल के दबाव में ईरान को ताक पर रख दिया है।
यह भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि एक ओर ईरान स्वयं भारत को अपना मित्र मान रहा है तो दूसरी ओर युद्ध में ईरानी हमलों से त्रस्त खाड़ी के देशों ने भी भारत को खास दोस्त करार दिया है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन आदि में एक करोड़ से अधिक भारतीय नागरिक रहते हैं। युद्ध में निरंतर बमबारी के बीच इतने विशाल भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा की गारंटी और उनमें से लाखों की घर वापसी तभी संभव हो पाई है, क्योंकि भारत ने खाड़ी देशों की सरकारों के साथ परस्पर विश्वास आधारित संबंध विकसित किए हैं।
युद्ध की शुरुआत से अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने लगातार खाड़ी के शीर्ष नेताओं से संवाद बनाए रखा है। खाड़ी देशों ने केवल प्रवासियों के मुद्दे को लेकर ही भारत का साथ नहीं दिया है, अपितु आपात स्थितियों में काम आने वाले भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को भरने में अमीरात और सऊदी की अहम भूमिका भी रही है। ओशियानिया और एशिया से लेकर यूरोप तक जब युद्ध के चलते पेट्रोल और डीजल के दाम आसमानी ऊंचाइयों पर पहुंच गए, तब भारत में कोई वृद्धि नहीं दिखी है। केवल प्रीमियम उत्पादों में मामूली बढ़ोतरी हुई है। संकट में ऐसे चमत्कारिक परिणाम का पूरा श्रेय हमारी बहुआयामी और संतुलित विदेश नीति को जाता है। इस युद्ध में भारत ही संभवत: ऐसा अकेला देश है जो इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों का एकसमान विश्वासपात्र बनकर अपने राष्ट्रीय हितों को साध पा रहा है।
जहां तक मध्यस्थता के मुद्दे की बात है तो पाकिस्तान की सक्रियता के चलते कुछ आलोचकों ने भारत की कूटनीति पर सवाल उठाए हैं, लेकिन यह कसौटी उचित नहीं है। एक तो ईरान ने पाकिस्तानी मध्यस्थता को किसी भी समर्थन से इन्कार कर दिया है और दूसरा इसे लेकर भारत और पाकिस्तान की तुलना अतार्किक है। अमेरिका ने पाकिस्तान को हमेशा एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया है। रिचर्ड निक्सन और रोनाल्ड रीगन से लेकर जार्ज डब्ल्यू बुश एवं बराक ओबामा तक कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने पाकिस्तान का इस्तेमाल करके चीन, अफगानिस्तान और ईरान में अमेरिकी हितों को ही आगे बढ़ाया है।
जबकि इस्लामिक भाईचारे और सहानुभूति का मुखौटा पहनते हुए भी पाकिस्तान ने अमेरिकी आर्थिक और सैन्य सहयोग के लोभ में इस्लामी पड़ोसियों की पीठ में कई बार छुरा भोंका है। ट्रंप पाकिस्तान के इस दोहरे रवैये से बखूबी वाकिफ हैं जिसका उदाहरण उनका यह बयान भी रहा कि उन्हें इसी प्रकार के कमजोर सौदेबाज देश पसंद हैं। ट्रंप ने एक सवाल के जवाब में यही कहा कि ‘मुझे हमेशा हारे हुए लोग अच्छे लगते हैं, क्योंकि वे मेरी सफलता की कहानियां सुनते हैं और गुणगान करते हैं।’ उनका इशारा पाकिस्तान की ओर ही था।
इससे पहले पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करके, उन्हें भारत के साथ परमाणु युद्ध रोकने वाले मसीहा के रूप में सम्मानित करके और रियल एस्टेट, क्रिप्टोकरेंसी तथा खनिजों में संदिग्ध सौदों की पेशकश करके उनके अहं की भरसक तुष्टि का प्रयास किया है। पाकिस्तान के जैसे पैंतरे भारत सरीखे स्वाभिमानी और उभरती महाशक्ति को शोभा नहीं देते। जिन तौर-तरीकों से पाकिस्तान पश्चिम एशिया के युद्ध में समाधान प्रदाता के रूप में पेश आ रहा है, उनसे स्वायत्तता और संप्रभुता का नुकसान होता है। वैसे भी ट्रंप जैसे अस्थिर व्यक्ति का चापलूस बनकर पश्चिम एशिया में मध्यस्थता करना खतरों से खाली नहीं है और भारत ने इस मामले में परहेज करके अपने आप को अनावश्यक उलझनों से बचाने का ही काम किया है।
वस्तुत:, इस युद्ध में भारत की कारगर रणनीति ने पश्चिम एशिया और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की संभावनाओं को खुला रखा है। किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में विकल्प सरल नहीं होते हैं और भारत ने सबसे तर्कसंगत मार्ग चुना है, जिससे दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होंगे।
(लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर एवं डीन हैं)












