अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़े एक माह बीत चुका है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से खुद को शांति का मसीहा बताए जाने के बाद भी पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला यह खतरनाक सैन्य संघर्ष खत्म होने के बजाय और खिंचता ही दिख रहा है। इसका प्रमाण है अमेरिका की ओर से ईरान के परमाणु केंद्र को निशाना बनाना।

ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु केंद्र पर अमेरिका ने एक ऐसे समय बंकर बस्टर बम गिराया, जब ट्रंप ईरानी नेताओं से शांति प्रस्ताव पर कथित तौर पर वार्ता भी कर रहे हैं। या तो वे झूठ बोल रहे हैं अथवा ईरान के साथ-साथ पश्चिम एशियाई देशों और विश्व के साथ भी छल कर रहे हैं। पश्चिम एशिया संकट का समाधान करने के मामले में उनका इरादा कुछ भी हो, वे बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं रह गए हैं।

इसी कारण अमेरिका में तो उनका विरोध बढ़ता ही जा रहा है, उनके मित्र देश और यहां तक कि नाटो राष्ट्र भी ईरान के खिलाफ युद्ध में उनका सहयोग करने को तैयार नहीं। अब यह भी स्पष्ट दिख रहा है कि ट्रंप ने बिना विचारे इजरायल संग ईरान पर हमला बोलकर अमेरिका और यूरोप समेत पूरे विश्व को संकट में डाल दिया। इसके भरे-पूरे आसार हैं कि अभी तक अपनी मनमानी करते चले आ रहे ट्रंप को इस बार अपने अहंकार की कीमत चुकानी पड़ेगी।

पश्चिम एशिया संकट जिस तरह गहराता चला जा रहा है और ट्रंप इस संकट के समक्ष जिस प्रकार असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं, उससे उनकी जगहंसाई तो हो ही रही है, अमेरिका की प्रतिष्ठा को चोट भी पहुंच रही है। यह सही समय है कि अमेरिका के नीति-नियंता और साथ ही वहां की जनता इस पर विचार करे कि उसने ट्रंप सरीखे अस्थिर प्रवृत्ति के व्यक्ति को राष्ट्रपति चुनकर क्या हासिल किया?

इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका के साथ इजरायल की रणनीति सवालों के घेरे में है, लेकिन इसके साथ ही ईरान के रवैये को भी सही नहीं कहा जा सकता। ईरान एक तरह से यही दिखा रहा है कि अमेरिका और इजरायल का सामना करने के क्रम में उसे अपनी बर्बादी की परवाह नहीं और उसकी प्राथमिकता ऊर्जा संकट को चरम पर ले जाना और अपने पड़ोसी देशों की नाक में दम करना है। शायद उसकी इसी नीति के कारण खाड़ी के देश नुकसान उठाने के बावजूद यह चाह रहे हैं कि ईरान किसी तरह पस्त हो जाए।

इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि विश्व के प्रमुख देश अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच के घमासान को रोकने के लिए गंभीरता से कोई ठोस पहल करते नहीं दिख रहे हैं। अब जब सभी देश निष्प्रभावी दिख रहे हैं, तब फिर यह आवश्यक हो जाता है कि कहीं से कोई यह आवाज प्रबलता से उठे कि मानवता के हित में इस युद्ध का पटाक्षेप किया जाए। अच्छा होगा कि ऐसी आवाज उठाने का काम भारत करे।