अंततः 2021 में होने वाली जनगणना अब शुरू होने जा रही है। गोपनीयता के नए नियमों के साथ यह देश की पहली डिजिटल जनगणना होगी। इसके साथ ही एक विशेषता यह भी है कि पहली बार इसे दो चरणों में पूरा किया जाएगा। डिजिटल जनगणना का विशेष महत्व इसलिए और है, क्योंकि यह संसाधनों के साथ समय की भी बचत करेगी।

डिजिटल जनगणना पारंपरिक कागज-पत्रों के स्थान पर मोबाइल एप, वेब पोर्टल और वास्तविक समय की निगरानी का उपयोग करके की जाएगी। इससे एक तो जनगणना का विवरण तेजी के साथ एकत्रित होगा और दूसरे त्रुटियों को भी कम करने में सहायता मिलेगी। डिजिटल जनगणना होने के कारण ब्योरा सीधे सर्वर पर पहुंचेगा, जिससे प्रक्रिया कहीं अधिक तेज एवं सटीक होगी।

इस जनगणना की एक खासियत यह भी होगी कि लोग अपनी जानकारी स्वयं दर्ज कर सकेंगे। लोगों को यह काम नीर-क्षीर ढंग से करना होगा, क्योंकि जनगणना आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि जनगणना के दौरान जुटाए गए विवरण को पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा।

स्वतंत्रता के बाद होने जा रही आठवीं जनगणना की महत्ता केवल इसलिए नहीं है कि यह डिजिटल रूप में होगी, बल्कि इसलिए भी है कि स्वतंत्र भारत में पहली बार जातियों का विवरण भी एकत्र किया जाएगा।

स्पष्ट है कि इस जनगणना के माध्यम से देश की सामाजिक-आर्थिक एवं जातीय स्थिति की अपेक्षाकृत अधिक परिपूर्ण तस्वीर सामने आएगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि जातीय जनगणना एक ओर जहां विभिन्न जातियों के संख्याबल को सामने रखेगी, वहीं दूसरी ओर कई धारणाओं को ध्वस्त करने का भी काम करेगी, क्योंकि अलग-अलग जातीय समूहों ने अपने संख्याबल अथवा अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे कर रखे हैं।

इन दावों पर पूरी तरह इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि देश में 1931 के बाद जातिगत जनगणना हुई ही नहीं। यह मानना सही नहीं होगा कि जातियों की जो संख्या और स्थिति करीब सौ वर्ष पहले थी, वह आज भी है। एक दृष्टि से यह अच्छा ही है कि जनगणना के साथ ही जातियों का ब्योरा भी सामने आ जाएगा, लेकिन इसकी आशंका भी है कि इस ब्योरे के आधार पर कहीं जातिवाद की राजनीति बेलगाम न हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो यह अच्छा नहीं होगा।

इसलिए नहीं होगा, क्योंकि जातिवादी राजनीति विभाजन और वैमनस्य को जन्म देती है। उचित यह होगा कि सरकार ऐसे उपाय करे जिससे जातिगत जनगणना का इस्तेमाल जातिवाद और साथ ही वोट बैंक बनाने वाली आरक्षण की स्वार्थी राजनीति के तौर पर न किया जा सके। यह समझने की जरूरत है कि जनगणना का उद्देश्य किसी के भी संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि शासन की नीतियों को प्रभावशाली तरीके से बनाने और उन्हें लागू करने के लिए होता है।