विचार: विश्व को संकट में डालने वाला युद्ध, उद्योग-धंधों के बंद होने का सिलसिला होगा तेज
पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा रहा है, जिससे उद्योग-धंधों के बंद होने का खतरा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष को रोकने में ट्रंप का विरोधाभासी रवैया बाधा बन रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से स्थिति और गंभीर है।
HighLights
पश्चिम एशिया संकट से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया, उद्योग प्रभावित।
अमेरिका-ईरान संघर्ष में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद निष्क्रिय साबित हुई।
भारत को सुरक्षा परिषद सुधार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
संजय गुप्त। यदि पश्चिम एशिया संकट के चलते ऊर्जा संकट कायम रहा तो दुनिया भर में उद्योग-धंधों के बंद होने का सिलसिला तेज होने के साथ लोगों की परेशानी अत्यधिक बढ़ जाएगी।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच पिछले लगभग एक माह से जारी युद्ध को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप रोकने की कोशिश करते तो दिख रहे हैं, लेकिन वे इसमें सफल होते नहीं नजर आ रहे हैं। इसका कारण उनका विरोधाभासी और अविश्वसनीय रवैया है। वे ईरान को धमका भी रहे हैं और उसे युद्ध विराम की पेशकश भी कर रहे हैं।
उन्होंने ईरान से बातचीत का हवाला देते हुए पहले उसके बिजली और ऊर्जा ठिकानों पर पांच दिनों तक हमले टालने की घोषणा की, फिर इस अवधि को और आगे बढ़ा दिया। इस बीच उन्होंने ईरान के समक्ष जो 15 सूत्रीय युद्ध विराम प्रस्ताव रखा, उसके जवाब में उसने भी अपनी पांच शर्तें रख दीं। 15 सूत्रीय प्रस्ताव और पांच शर्तों के चलते दोनों पक्षों के बीच किसी सार्थक बातचीत के आसार कम ही हैं, क्योंकि दोनों के बीच भरोसे का अभाव है।
समस्या यह भी है कि ट्रंप की किसी बात का भरोसा नहीं। ईरान ने यह समझ लिया है कि वह समुद्री मार्ग होर्मुज पर अपना दबदबा बनाए रखकर और उसे बाधित कर अमेरिका को झुका सकता है, क्योंकि इस मार्ग के बंद होने से उपजा ऊर्जा संकट विश्वव्यापी रूप ले चुका है।
अमेरिका की मानें तो वह कई मध्यस्थों के जरिये ईरान से बात कर रहा है। इन मध्यस्थों में मिस्र, तुर्किए के साथ पाकिस्तान का भी नाम है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पाकिस्तान अमेरिका के लिए उपयोगी है। अमेरिका उसके जरिये ईरान में दखल देने की स्थिति में है। एक समय अमेरिका ने पाकिस्तान के सहारे ही अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप किया था। माना जाता है कि ईरान को निशाने पर लेने की रणनीति के कारण ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई थी।
जो भी हो, पाकिस्तान भले ही परमाणु हथियारों से संपन्न एक मात्र इस्लामी देश होने के कारण अपने को मुस्लिम देशों के बीच विशिष्ट समझता हो, लेकिन उसकी अंतरराष्ट्रीय साख चौपट है और वह बिल्कुल भी विश्वसनीय देश नहीं, इसीलिए वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर सकने की स्थिति में नहीं। खुद उसके विदेश मंत्री कह रहे हैं कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच केवल संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है। ऐसा करते हुए वह अमेरिका से अपने स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश करे तो हैरानी नहीं। वह अपने फायदे के लिए खुद का इस्तेमाल करने और दोस्ती के नाम पर धोखा देने में माहिर है। इसीलिए भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने उसे दलाल देश की संज्ञा दी। यह एक सही संज्ञा है।
ट्रंप ईरान को लेकर तरह-तरह के बयान देने के साथ ऐसे संकेत भी दे रहे हैं कि वे इस युद्ध को रोकना चाह रहे हैं। उनके ऐसे संकेतों का असर शेयर मार्केट में देखने को मिल रहा है, लेकिन यह कहना कठिन है कि युद्ध खत्म होने के करीब है, क्योंकि ईरान और इजरायल के हमले जारी हैं। होर्मुज मार्ग भी खुलने के आसार नहीं दिख रहे हैं। इस युद्ध को लेकर अनिश्चितता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री से वार्ता की। कहना कठिन है कि इस वार्ता में क्या बात हुई। जो भी हो, भारत यह चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट जल्द खुले, ताकि ऊर्जा संकट खत्म हो। भारत अपनी ओर से अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश कर सकता है, लेकिन शायद वह फिलहाल इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है कि उसके जहाज होर्मुज से निकलते रहें और ईरान से संबंध सामान्य बने रहें।
अमेरिका और ईरान के बीच कोई सार्थक बात हो या नहीं, इस युद्ध का रुकना आवश्यक है, क्योंकि पश्चिम एशिया में छाए संकट के कारण पैदा ऊर्जा संकट पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। यदि युद्ध के चलते अगले कुछ दिनों में ऊर्जा संकट में कमी नहीं आई तो उद्योगों के बंद होने का सिलसिला तेज होने के साथ दुनिया भर में लोगों की परेशानी अत्यधिक बढ़ जाएगी।
अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध में आश्चर्यजनक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अब तक जो भूमिका रही है, वह एक असहाय संगठन की सी रही है। सुरक्षा परिषद एक निष्क्रिय और निष्प्रभावी संस्था बनकर रह गई है। वह विश्व के किसी भी संकट को सुलझा पाने में नाकाम है। सुरक्षा परिषद के पांच देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन हैं। चीन को इस युद्ध से कोई खास नुकसान नहीं। वह अमेरिका को परेशान होता देख प्रसन्न है। रूस तो एक तरह से फायदे में है, क्योंकि उसे तेल बेचने की छूट मिल गई है। अमेरिका अपने अहं से ग्रस्त है। चूंकि ब्रिटेन एवं फ्रांस की अंतरराष्ट्रीय अहमियत कम हो गई है, इसलिए वे कुछ करने की स्थिति में नहीं।
यह देखने में आ रहा है कि जब भी सुरक्षा परिषद के सदस्यों में से कोई देश किसी युद्ध में शामिल हो जाता है तो यह संस्था और नाकाम हो जाती है। यूक्रेन युद्ध में भी वह नाकाम रही, क्योंकि हमला रूस ने किया। ईरान युद्ध में अमेरिका के कारण सुरक्षा परिषद असहाय है, इसे सभी प्रमुख देश महसूस कर रहे हैं, लेकिन वे सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। यदि सुरक्षा परिषद वैश्विक संकटों को हल करने में इसी तरह नाकाम बनी रही तो इसका महत्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य इस संस्था में सुधार की जरूरत तो जताते हैं, लेकिन कुछ ठोस करते नहीं।
इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि भारत सुरक्षा परिषद में ऐसे किसी सुधार की पैरवी करे कि उसके काम करने के तरीके बदलें और युद्ध में शामिल स्थायी सदस्य देश अपने वीटो पावर का इस्तेमाल न कर सकें। आज जब भारत का अंतरराष्ट्रीय कद बढ़ रहा है, तब उसे अपनी सक्रियता बढ़ानी चाहिए और सुरक्षा परिषद में विस्तार एवं सुधार के अपने प्रयासों को गति देनी चाहिए। भारत की सक्रियता ऐसी होनी चाहिए कि प्रमुख राष्ट्र इस पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाएं कि आखिर भारत इस संस्था का सदस्य क्यों नहीं है? बेहतर हो कि भारत को इस संस्था का सदस्य बनाने के लिए रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस सक्रियता दिखाएं। यह उनके अपने हित में होगा।
[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]












