उमेश चतुर्वेदी। मोदी सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को माओवाद से मुक्त करने का वादा किया था। यह तारीख आज एक इतिहास बनने जा रही है, क्योंकि तमाम संकेत यही बताते हैं कि मोदी सरकार ने अपना यह वादा करीब-करीब पूरा कर दिया है। करीब-करीब इसलिए, क्योंकि कोई भी समस्या अंकगणित का सवाल नहीं होती, जिसे हल करके उसका आखिरी जवाब निकाला जा सकता है। माओवाद के रूप में सरकारी तंत्र जिसे वामपंथी उग्रवाद कहता रहा है, दरअसल वह एक ऐसी विचारधारा से प्रेरित है जो मानती आई है कि कि सत्ता की राह बारूद से निकलती है।

कुछ साल पहले तक माओवादी हिंसा का आतंक ऐसा था कि उसके सामने सरकारें लाचार दिखती थीं। दिनदहाड़े रेल पटरियां उड़ा देना, झीरन घाटी में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के पूरे नेतृत्व का सफाया, बस्तर में 72 सीआरपीएफ जवानों को उड़ा देना मामूली घटनाएं नहीं कही जा सकतीं। उस दौर में देश के करीब एक तिहाई जिलों तक लाल आतंक का असर था। इस वजह से इन जिलों को आम प्रशासनिक भाषा में लाल गलियारा कहा जाता था। उसके लिए आंध्र के तिरुपति से लेकर नेपाल के पशुपति तक के क्षेत्र को प्रतीक के रूप में रेखांकित तक किया जाता था।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जब मार्च 2026 तक देश को माओवाद से मुक्ति दिलाने की समयसीमा तय की तो इसे लेकर संदेह भी जताए गए, पर केंद्र की दृढ़ इच्छाशक्ति और जीरो टालरेंस वाली नीति के परिणाम सबके सामने हैं। इस सफलता में राज्यों के सहयोग एवं समन्वय को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। केंद्र और राज्यों के बीच खुफिया जानकारियों को साझा करने के अलावा विभिन्न मोर्चों पर सहयोग ने सुरक्षा बलों को अधिक सक्षम बनाया। इसके जरिये माओवादियों से जुड़ी सटीक सूचनाएं हासिल कर उन्हें सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया। इस कार्रवाई ने खूंखार समझे जाने वाले माओवादी नेतृत्व को जहां आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया, वहीं नई भर्तियों को हतोत्साहित किया। माओवादियों की मुख्यधारा में वापसी के बाद पुनर्वास के लिए अनुकूल नीतियां भी तैयार कीं। पुनर्वास योजनाओं से भविष्य के प्रति आश्वस्ति भाव ने भी माओवादियों के बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण में अहम भूमिका निभाई।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के चुनाव में ही भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में माओवाद के खात्मे का वादा किया था। सत्ता संभालने के बाद इस दिशा में प्रयास भी आरंभ हुए, लेकिन उसमें निर्णायक तेजी अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद आई। इसका ही परिणाम रहा कि वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या जहां साल 2014 में 126 थी, जो 2025 में घटकर 11 ही रह गई। एक दशक पहले जहां माओवाद से ‘सर्वाधिक प्रभावित’ जिलों की संख्या 36 थी, वह घटकर केवल तीन रह गई है। वर्ष 2004-14 की तुलना में 2014-24 के दौरान माओवादी हिंसा के मामलों में लगभग 53 प्रतिशत की कमी आई। इस दौरान सुरक्षा कर्मियों की मौतें भी करीब 73 प्रतिशत और आम नागरिकों की मौतों की संख्या में करीब 70 प्रतिशत कमी हुई हैं।

सिर्फ 2024–25 में ही लगभग 2,900 माओवादियों ने समर्पण किया। जबकि सुरक्षा बलों ने 1,900 से ज्यादा माओवादियों को गिरफ्तार किया। इसी साल सुरक्षा बलों के अभियान में 600 से अधिक माओवादी मारे गए। खूंखार माओवादी रहे 28 शीर्ष नेताओं को भी सुरक्षा बलों ने मार गिराया। इनमें सीपीआइ-माओवादी के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू, इसी पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य पतिराम मांझी और गणेश उइके जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम शामिल हैं। माना जाता है माओवादी कमांडरों के मारे जाने के बाद कैडर का मनोबल टूट गया। कभी लाल झंडे तले माओवादी शासन स्थापित करने की उम्मीद रखने वाली वैचारिक धारा के समर्थकों को समर्पण में ही भला नजर लगने लगा। सुरक्षा बलों के हाथों माओवादी कमांड नेटवर्क की कमर टूटने के बाद नई भर्तियां बंद हुईं और सक्रिय माओवादियों ने हथियार डाल दिए। कई राज्यों में समूचे माओवादी नेटवर्क का सफाया हो गया। यहां तक कि कभी छत्तीसगढ़ में खुलेआम सुरक्षा बलों और नेताओं को निशाना बना चुका माओवाद भी वहां पूरी तरह पस्त पड़ गया।

राज्य सरकारें भी मानती हैं कि अगर अमित शाह की मजबूत इच्छाशक्ति नहीं होती तो माओवाद के किले को ध्वस्त करना इतना आसान नहीं होता। शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने माओवाद विरोधी कार्रवाई के लिए विशेष तौर पर ‘आक्टोपस’, ‘डबल बुल’, ‘चक्रबंधा’ और ‘आपरेशन ब्लैक फारेस्ट’ जैसे आपरेशन चलाए। ये आपरेशन मुख्यत: खुफिया जानकारी पर आधारित थे। इससे सुरक्षा बलों ने अपने प्रयास तेज किए और उसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आए। मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही माओवाद प्रभावित इलाकों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के विस्तार की नीति पर चलते हुए सुदूरवर्ती इलाकों और जंगलों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती पर जोर दिया गया। साथ ही ‘समाधान’ जैसी नीतियों को केंद्र ने लागू किया।

इसके समानांतर माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास का पहिया तेज गति से दौड़ाया गया। इसके तहत माओवाद प्रभावित इलाकों में करीब 12,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया। इसी तरह इन इलाकों में संचार नेटवर्क को बढ़ाने के लिए 6,500 से ज्यादा मोबाइल टावर लगाए गए। आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए बैंकों की 1,800 से अधिक शाखाएं स्थापित की गईं। हजारों एक्सेस पाइंट्स के जरिये बैंकिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भी किया गया। इसके लिए केंद्रीय स्तर पर सुरक्षा संबंधी व्यय खर्च, विशेष केंद्रीय सहायता, विशेष इन्फ्रास्ट्रक्चर योजना, नागरिक कार्यक्रम, मीडिया योजना, सड़क जरूरत योजना और सड़क कनेक्टिविटी परियोजना जैसी योजनाएं लागू करने में तेजी लाई गईं। इस क्रम को इसी प्रकार जारी रखना होगा, क्योंकि यदि जरा भी ढील मिली तो यह चुनौती फिर से खड़ी हो सकती है। याद रहे कि विचारधाराओं की एक विशेषता यह भी है कि उनके अनुयायी कम तो हो सकते हैं, लेकिन वे कभी मरती नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)