प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण का उद्घाटन करते हुए इसे उचित ही भारत की नई ऊर्जा का प्रतीक कहा। इस एयरपोर्ट की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं बढ़ गई थी, क्योंकि दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दबाव बहुत बढ़ गया था। इसकी आवश्यकता इसलिए भी थी ताकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की कनेक्टिविटी को बल दिया जा सके।

एयरपोर्ट महज आवागमन की सुविधा भर नहीं होते, वे प्रगति को नए पंख भी प्रदान करते हैं। यह एयरपोर्ट एनसीआर के साथ ही उत्तर प्रदेश के एक बड़े क्षेत्र के लिए उपलब्धि भी है और अवसर भी। इसके भरे-पूरे आसार दिख रहे हैं कि नोएडा एयरपोर्ट इस क्षेत्र के विकास को नई गति प्रदान करने के साथ ही यहां के युवाओं एवं कारोबारियों को तरक्की के नए अवसर भी प्रदान करेगा। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ उत्तर प्रदेश पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों वाला देश का पहला राज्य बन गया है।

निःसंदेह यह भी उत्तर प्रदेश के लिए एक उपलब्धि है। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि पिछले कुछ समय से देश में हवाई अड्डों की संख्या तेजी के साथ बढ़ी है। आज से 15 साल पहले देश में लगभग 75 एयरपोर्ट थे, आज उनकी संख्या 160 से अधिक हो चुकी है। इसका सीधा अर्थ है कि देश प्रगति कर रहा है और हवाई संपर्क नए-नए क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। आज के युग में यह धारणा सही नहीं कि हवाई यात्रा सिर्फ धनी वर्ग के लिए ही संभव है। वास्तव में अब यह आम आदमी की भी जरूरत बन गई है।

इसमें संदेह नहीं कि देश में हवाई यात्रा सुविधा का विस्तार हो रहा है, लेकिन अभी उड्डयन क्षेत्र में काफी कुछ करने की आवश्यकता है। इसका संकेत प्रधानमंत्री के इस कथन से मिलता है कि अभी अपने देश में हवाई जहाजों की सर्विसिंग की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। यह आश्चर्यजनक है कि आज भी 85 प्रतिशत हवाई जहाजों को सर्विसिंग के लिए विदेश भेजना पड़ता है। यह अच्छा हुआ कि नोएडा एयरपोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर, ओवरहाल) सुविधा का भी उद्घाटन हुआ।

यह सुविधा देश के अन्य हवाई अड्डों पर भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसी के साथ इस पर भी सभी राजनीतिक दलों को आत्मचिंतन करना चाहिए कि आखिर बुनियादी ढांचे और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं की परिकल्पना एवं उनके क्रियान्वयन में इतना अंतर क्यों हो जाता है? नोएडा में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की स्थापना का प्रस्ताव 2001 में राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर किया था। इसके बाद के मुख्यमंत्रियों ने भी पहल की, लेकिन किन्हीं कारणों से बात आगे नहीं बढ़ सकी और इस तरह 25 वर्ष की देर हुई। यह देर राष्ट्रीय संसाधनों पर भारी ही पड़ी।