विचार: ध्वस्त हुआ लाल गलियारे का सपना
भारत नेपाल के आर्थिक विकास में सहयोग करे ताकि विदेशी ताकतें भारत विरोध को हवा न दे सकें। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों देशों का मधुर संबंध आज के समय की मांग है।
HighLights
भारत में माओवाद अंतिम सांसें गिन रहा, लाल गलियारा ध्वस्त।
नेपाल में माओवादियों का प्रभाव घटा, युवा नेतृत्व का उदय।
भारत-नेपाल संबंध महत्वपूर्ण, विदेशी हस्तक्षेप से बचना आवश्यक।
हरेंद्र प्रताप। लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह की ओर से दिए गए इस कथन को चुनौती देना कठिन है कि मैं कह सकता हूं कि हम माओवाद से मुक्त हो चुके हैं। माओवाद के अंतिम सांसें गिनने की स्थिति में पहुंचने के साथ ही माओवादियों के लाल गलियारा बनाने का सपना चकनाचूर हो गया। माओवादियों द्वारा भारत में लाल गलियारे की संकल्पना असल में चीनी विस्तारवाद का ही एक हिस्सा था।
यह गलियारा नेपाल से शुरू होकर भारत के बिहार, बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश होते हुए कर्नाटक तक फैला हुआ था। एक समय में माओवादियों ने देश के लगभग 100 जिलों में अपनी समानांतर सरकारें स्थापित कर ली थीं। उस दौर में “मेरे नेता माओ” जैसे नारे दीवारों पर लिखे जाते थे। उस स्थिति के उलट 31 मार्च की समयसीमा के अनुसार भारत में माओवादियों में आत्मसमर्पण की होड़ दिखी।
भारत से इतर नेपाल के परिदृश्य को देखा जाए तो 1994 में माओवादियों ने वहां सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। सरकार को मजबूरन उनके साथ समझौता करना पड़ा। 25 मई 2006 को नेपाल सरकार और माओवादियों के बीच युद्धविराम हुआ। इस युद्धविराम को लेकर उनकी कुछ प्रमुख शर्तें थीं। इनमें नेपाल में राजशाही का अंत, संसदीय लोकतंत्र की स्थापना, नया संविधान, माओवादियों के हिंसक दस्ते पीएलए की सेना में भर्ती और हिंदू राष्ट्र रहे नेपाल को एक सेक्युलर देश बनाने जैसी शर्तें शामिल थीं।। चीन का समर्थन प्राप्त करने के लिए नेपाल के माओवादी भारत विरोध का एजेंडा चलाते थे। उनके साहित्य में भारत को एक अजगर सांप के रूप में दर्शाया गया था, जो सिक्किम और नेपाल को हड़पने की कोशिश कर रहा था।
यह दुष्प्रचार इसलिए प्रभावी था, क्योंकि नेपाल के लोग भारत की तुलना में अपने देश को गरीब और पिछड़ा मानते थे। माओवादी चीन के विकास की प्रशंसा करते हुए नेपाल को चीन के करीब ले गए। इसी क्रम में नेपाल के माओवादी नेता सत्या और भारत के माओवादी नेता आजाद ने 8 अगस्त 2006 को एक बयान जारी किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दोनों का आपसी गठबंधन है।
यानी दोनों चीनी विस्तारवाद के एजेंट हैं। पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आइएसआइ और नेपाल तथा भारत के माओवादियों की बैठक संबंधी समाचार जनवरी 2000 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें कहा गया था कि दोनों मिलकर एक ‘रिवोल्यूशनरी जोन’ बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। नेपाल में मिली सफलता के बाद, 27 जुलाई 2009 को भारत के माओवादियों ने यह घोषित किया कि वे भारत की सत्ता छीनने के लिए अपना ढांचा खड़ा कर रहे हैं।
माओवादियों द्वारा देश के अलगाववादियों का समर्थन और हिंदू संगठनों का विरोध सार्वजनिक था, इसलिए नेपाल को हिंदू राष्ट्र के बजाय सेक्युलर देश बनाया गया। अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों, विशेषकर दिल्ली के जे.एन.यू. में अपनी नर्सरी खोली थी। भारत के माओवादी लेवी वसूली से प्राप्त संपत्ति के मालिक बन गए।
नेपाल में एक ऐसा दौर भी आया जब माओवादी होना गर्व का विषय बन गया था। पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड, बाबूराम भट्टराई, केपी शर्मा ओली जैसे माओवादियों की सभाओं में जन सैलाब उमड़ता था। हालांकि, भारत के बाद नेपाल में इनकी सच्चाई सामने आने पर नेपाली जनता उनके प्रति आक्रोश से भर गई और इन्हें भागने पर मजबूर होना पड़ा। माओवादियों के प्रति घृणा का एक उबाल भी सभी ने देखा।
कुछ ही समय पहले नेपाल के संसदीय चुनाव का परिणाम सामने आए। नेपाल में कुल सात प्रदेश, 77 जिले और 165 सीटों पर हुए चुनाव में माओवादी प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी केवल 4 प्रदेश के 7 जिलों की 7 सीटों पर जीत पाई। केपी शर्मा ओली की एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी 5 प्रदेश के 9 जिलों की 9 सीटों पर ही चुनाव जीत सकी।
प्रचंड किसी तरह चुनाव जीत गए, लेकिन ओली की पराजय चर्चा का विषय बन गई है। नेपाल के चुनाव में जीतने वाले 11 सदस्यों की आयु 30 वर्ष से कम है। 31 से 35 वर्ष के 15 सदस्य और 36 से 40 वर्ष के 31 सदस्य चुनाव जीतकर आए हैं। कुल 108 निर्वाचित सदस्यों की आयु 50 वर्ष से कम है, यानी यह एक युवा संसद होगी। युवा जोश का रचनात्मक प्रयास नेपाल के भाग्य को बदलने की उम्मीद जगाता है। नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह भी युवा आकांक्षाओं के प्रतीक बनकर उभरे हैं।
नेपाल भारत का न केवल एक पड़ोसी देश है, बल्कि दोनों के बीच सांस्कृतिक संबंध भी हैं। नेपाल में अनेक विदेशी ताकतें सक्रिय रही हैं, जो दोनों देशों के रिश्ते को खराब करना चाहती हैं। कभी-कभी ‘वृहद नेपाल’ का नारा उछालकर भारत विरोध को भड़काने का काम किया जाता रहा है। माओवादी घायल सांप हैं। जिस तरह भारत में माओवाद के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाया गया, उसी तरह नेपाल में भी इनका फन कुचलना होगा।
यह भी स्मरण रहे कि नेपाल हिंदू राष्ट्र है और भविष्य में भी रहना चाहिए। इसके लिए नेपाल को बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ पर रोक लगाने के साथ ही तेजी से हो रहे ईसाईकरण को भी रोकना होगा। भारत नेपाल के आर्थिक विकास में सहयोग करे ताकि विदेशी ताकतें भारत विरोध को हवा न दे सकें। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों देशों का मधुर संबंध आज के समय की मांग है।
(लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं)












