शिवकांत शर्मा। जिस ईरान युद्ध को छेड़ने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा होगा कि महज चार दिनों में ही जंग का फैसला हो जाएगा, वह टकराव महीने भर से ज्यादा लंबा खिंच गया है और उस पर जल्द विराम के भी कोई आसार नहीं दिख रहे। इस दौरान अमेरिका के लगभग 40 अरब डालर खर्च हो चुके हैं। रणभूमि पर सैनिक नहीं उतारने की बारंबार दुहाई देने के बावजूद ट्रंप को लगभग सात हजार मरीन और पैराशूट सैनिक भेजने पड़ रहे हैं, लेकिन ईरान न किसी तरह की हार मानने को तैयार है और न सीधी बातचीत को।

अमेरिकी कांग्रेस और संयुक्त राष्ट्र से अनुमति लिए बिना ईरान के परमाणु और मिसाइल खतरे से रक्षा के बहाने छेड़े इस युद्ध ने पूरी दुनिया को गंभीर आर्थिक संकट में झोंक दिया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अपने व्यापक विनाश से तिलमिलाया ईरान अब अपने 454 किलो संवर्धित यूरेनियम को सौंपना और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करना तो दूर, होर्मुज जलमार्ग पर कब्जा करने पर तुल गया है।

ईरान की निगरानी में गुजरे कुछ जहाजों के अलावा यह जलमार्ग पिछले महीने भर से बंद है। इसकी वजह से तेल, गैस, उर्वरक, हीलियम और प्लास्टिक के कच्चे माल की तंगी हो गई है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया समेत एशिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं की निर्भरता खाड़ी पर सर्वाधिक है। इसलिए वहां तो महंगाई और मंदी का खतरा है ही यूरोप और अमेरिका में भी महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की बातें होने लगी हैं। इसे 1970 के दशक में इजरायल-मिस्र-सीरिया युद्ध और इस्लामी क्रांति के तेल संकटों से भी बड़ा ऊर्जा संकट माना जा रहा है।

होर्मुज बंद रहने से उपजे आर्थिक संकट की तपिश एशिया, अफ्रीका और यूरोप के साथ-साथ अमेरिका भी पहुंच चुकी है। अमेरिका में डीजल की कीमतें 25 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। डीजल और उर्वरक की महंगाई का सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। रोजमर्रा का सामान महंगा होने से ट्रंप के मागा समर्थकों में भी नाराजगी है। युद्ध का विरोध करने वालों का आंकड़ा 61 प्रतिशत से ऊपर चला गया है। ट्रंप का अपना जनसमर्थन इतिहास के न्यूनतम बिंदु पर है।

सीनेट में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर युद्धमंत्री हेगसेथ और विदेशमंत्री रूबियो को समितियों में तलब करने पर अड़े हैं। नवंबर में होने जा रहे संसदीय चुनाव में यदि ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने कांग्रेस में अपना बहुमत खो दिया तो ट्रंप पर महाभियोग की तलवार भी लटकने लगेगी। इसलिए वे अब इस युद्ध को किसी ऐसे समझौते के साथ समाप्त करने के लिए छटपटा रहे हैं, जिसमें उनकी जीत का ढोल पीटने की गुंजाइश हो।

इसलिए वे किसी भी मध्यस्थ के जरिये संदेश भेज कर बातचीत की हवा बांधने की कोशिश कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि मध्यस्थता के लिए उन्हें चीन या रूस जैसा कोई देश नहीं मिला जिसके ईरान के साथ सामरिक रिश्ते हों। ओमान और कतर जैसे पुराने मध्यस्थ भी तैयार नहीं हुए। बस एक पाकिस्तान मिला।

फारस और ओमान की खाड़ियों को मिलाने वाले होर्मुज जलमार्ग की चौड़ाई उसके मोड़ पर मात्र 21 समुद्री मील है जिसमें से 12 समुद्री मील तक ईरान की जलसीमा है और 12 समुद्री मील ओमान की। दोनों की जलसीमाएं एक-दूसरे से सटी हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के जलमार्ग कानून के अनुसार ये दोनों देश अपनी जलसीमाओं से होकर गुजरने वाले जहाजों को रोक नहीं सकते।

जैसे विमानों को दूसरे देशों की वायुसीमा से होकर उड़ान भरने का अधिकार है, वैसे ही जहाजों को जलसीमा से होकर गुजरने का। यहां समस्या अधिकारों की न होकर अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन की है। ईरान पर हमले के समय तो अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र के नियमों का ध्यान नहीं रखा। न ही ईरान के चीन और रूस जैसे मित्रों ने या दूसरे देशों ने हमले रोकने के लिए कोई आवाज उठाई। अब ईरान से उसके होर्मुज जलमार्ग से होकर गुजरने के अधिकार की मांग किस मुंह से करेंगे।

इसे खुलवाने के लिए ट्रंप ने नाटो और दूसरे मित्र देशों को दुत्कारा और फटकारा, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। पिछले सप्ताह नाटो के महासचिव मार्क रूटर ने होर्मुज खुलवाने के लिए नाटो देशों समेत तीस देशों का संगठन खड़ा करने की बात जरूर की, मगर ईरान का कहना है कि होर्मुज जलमार्ग बंद कहां है? मित्र देशों के जहाजों के लिए तो खुला है। बस अमेरिका, इजरायल और उनके समर्थक देशों के जहाजों के लिए बंद है। उन्हें जाने के लिए भारी चुंगी अदा करनी होगी।

कहां तो अमेरिका ने ईरान की मुल्लाशाही को गिराने के लिए उसके तेल पर प्रतिबंध लगा रखे थे। कहां अब ईरान ने अमेरिका और उसके मित्र देशों के जहाजों के होर्मुज से गुजरने पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। उसे खुलवाने के लिए ट्रंप एक तरफ ईरान के बिजलीघर उड़ाने और कहर बरपाने की धमकी दे रहे हैं और त्वरित हमलों में दक्ष मरीन और पैराशूट सैनिकों को खाड़ी में तैनात कर रहे हैं।

दूसरी तरफ धमकी की समयसीमा बढ़ाते जा रहे हैं। जहां ट्रंप ईरान की लड़ाई को होर्मुज खुला रखने की लड़ाई में बदल कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का खोया साथ हासिल करने की चाल चल रहे हैं, वहीं ईरान यमन के हूती संगठन को भी लड़ाई में उतार कर उस बाब-अल-मंदाब जलमार्ग को रोकने की तैयारी कर रहा है जो लाल सागर से होते हुए स्वेज नहर तक ले जाता है।

ट्रंप सारे पत्ते अपने हाथ में होने के चाहे जितने दावे करें, पर लगता यही है कि वे फंस चुके हैं। यदि वे ईरान के बिजलीघरों को उड़ाते हैं तो ईरान के जवाबी हमलों की आशंका से तेल और शेयर बाजारों में और हड़कंप मचेगा। यदि सेना को ईरान के खार्ग या किसी और द्वीप पर उतारते हैं तो बाजारों में हड़कंप के साथ-साथ अमेरिका में भी उनका मुखर विरोध होगा। यदि होर्मुज खुलवाए बिना लौट जाते हैं तो उन्हें मागा राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि वियतनाम से हारकर लौटे निक्सन और इराक से हारकर लौटे बुश की तरह ईरान से हार कर लौटे राष्ट्रपति के रूप में याद किया जाएगा।

(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)