विचार: सफलता को व्यापक स्वरूप देने का समय
22 गज की पट्टी से परे देखें तो एक खेल राष्ट्र के रूप में भारत का उदय अभी अधूरा है। जनसंख्या और अर्थव्यवस्था को देखते हुए हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमताओं से काफी कम प्रदर्शन कर रहे हैं।
HighLights
भारत ने T20 विश्व कप सहित कई सीमित ओवरों के खिताब जीते।
टीम की सफलता सामूहिक प्रयासों और खिलाड़ियों के योगदान का परिणाम।
टेस्ट क्रिकेट में सुधार और व्यापक खेल विकास की आवश्यकता।
तरुण गुप्त। भारत में आज क्रिकेट लेखक एक सुखद दुविधा से गुजर रहे हैं। जैसे-जैसे हमारे क्रिकेटर नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, लेखकों को उनकी जीत और इस ऐतिहासिक निरंतरता के गुणगान के लिए शब्दकोशों में नए विशेषणों, ताजा अभिव्यक्तियों और सटीक मुहावरों की तलाश करनी पड़ रही है। पिछले तीन वर्षों में सीमित ओवरों की भारतीय टीम ने आकाशीय ऊंचाइयों को छुआ है। 2023 के वनडे विश्व कप फाइनल की हृदयविदारक हार के बाद से हमारी सफलता का ग्राफ निरंतर ऊपर ही रहा है। हमने 2024 का टी-20 विश्व कप जीता, मार्च 2025 में चैंपियंस ट्राफी, अक्टूबर 2025 में एशिया कप और अब सफलतापूर्वक अपने टी-20 खिताब का बचाव किया है। इस हालिया जीत से कई उपलब्धियां पहली बार हासिल हुईं।
भारत ने रिकार्ड तीसरा टी-20 विश्व कप खिताब जीता और हम खिताब का बचाव करने वाली और पहली विजेता मेजबान टीम बने। पिछले पांच बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट में से हमने चार जीते और उनमें हमारा जीत-हार का रिकार्ड 37-2 रहा है। यह वास्तव में भारतीय टीम की निरंतरता और प्रभुत्व का ठोस प्रमाण है। हर सफलता कुछ शौर्यगाथाओं को जन्म देती है। सुखद यह है कि इस विजयगाथा में योगदान देने वाले इतने अधिक खिलाड़ी हैं कि सभी को याद रखना या कुछ ही लोगों की प्रशंसा करना कठिन हो जाता है। यह एक बेहतरीन स्थिति है। आखिरकार क्रिकेट एक टीम खेल ही है, जहां व्यक्तिगत उपलब्धियों से अधिक टीम की सफलता मायने रखती है-वह दर्शन जिस पर जोर देने का कोई अवसर कोच गंभीर कभी नहीं छोड़ते।
खेल से जुड़े उतार-चढ़ाव भी इस पूरे टूर्नामेंट में दिखाई दिए। संजू सैमसन, जो मूल टीम का हिस्सा भी नहीं थे, ‘प्लेयर आफ द टूर्नामेंट’ बनकर उभरे। अभिषेक शर्मा, जो हमारे प्रमुख बल्लेबाज के रूप में टूर्नामेंट में गए थे, शुरुआती खराब फार्म के दौर से गुजरे। जब उनकी जगह पर सवाल उठने लगे, तब उन्होंने फाइनल में एक शानदार पारी खेली। इशान किशन ने चिरप्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और व्यक्तिगत दुख के बावजूद फाइनल में हमारे सलामी बल्लेबाजों द्वारा प्रदान की गई लय को आगे बढ़ाया।
हमारी यह जीत कप्तान के महत्वपूर्ण योगदान के बिना भी (सिवाय अमेरिका के विरुद्ध पहले मैच में) संभव हो सकी। इसमें जहां तिलक वर्मा और पांड्या ने कुछ अवसरों पर स्थिति को संभाला, वहीं शिवम दुबे ने एक फिनिशर के रूप में अपने प्रदर्शन से निरंतरता की छाप छोड़ी। बुमराह बेशक एक अभूतपूर्व खिलाड़ी बने हुए हैं। वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ‘आल फार्मेट’ गेंदबाज हैं। भारत के लिए सौभाग्य की बात है कि दुनिया भर के बल्लेबाज अब तक उनकी काट नहीं ढूंढ़ पाए हैं। वहीं, अक्षर पटेल ने गेंद के साथ-साथ मैदान पर अपनी सूझबूझ और फुर्ती से महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रशंसा के लिए लगभग पूरी टीम का उल्लेख आवश्यक है। यह हमारी सामूहिक शक्ति और खेल में गहरी पैठ का प्रमाण है। यह सुनिश्चित करता है कि खिलाड़ी निरंतर कड़ी मेहनत और प्रदर्शन के प्रति सचेत रहें। यहां पुरानी उपलब्धियों पर सुकून से बैठने का समय नहीं मिलता, क्योंकि प्रतिभाशाली युवाओं की एक लंबी कतार हमेशा जगह लेने के लिए तैयार रहती है। इससे असुरक्षा या दबाव पैदा हो सकता है, लेकिन यही भाव क्रिकेटरों को शिथिलता से परहेज करने के लिए प्रेरित करता है, जो लंबे करियर के लिए एक आवश्यक तत्व है।
जीत जश्न मनाने का अवसर है, लेकिन निरंतरता के लिए आत्मनिरीक्षण भी जरूरी है। सीमित ओवरों के क्रिकेट में हमने विशेष सफलता हासिल की है, लेकिन खेल के मूल यानी टेस्ट प्रारूप का क्या? 2025 के इंग्लैंड के दौरे को छोड़ दें, तो पिछले डेढ़ साल में टेस्ट प्रारूप में हमारा प्रदर्शन औसत से नीचे रहा है। हम आस्ट्रेलिया में हारे और घर में न्यूजीलैंड के खिलाफ सूपड़ा साफ होने की जिल्लत झेलनी पड़ी। वह शायद भारतीय टेस्ट टीम के लिए सबसे निचला स्तर था।
अतीत की महान टीमें चाहे वह सत्तर और अस्सी के दशक की वेस्टइंडीज हो या 2000 के दशक की आस्ट्रेलिया-हर परिस्थिति में सभी प्रारूपों पर राज करती थीं। यह प्रशासकों के सोचने का विषय है कि जहां आइपीएल सीमित ओवरों की प्रतिभा निखारने का बेहतरीन माध्यम है, वहीं पांच दिवसीय क्रिकेट में इसे दोहराने के लिए हमें घरेलू क्रिकेट-वही पुराने रणजी ट्राफी, दलीप ट्राफी और ईरानी कप-पर अधिक ध्यान देना होगा। हमारी बल्लेबाजी में तो गहराई है, पर गेंदबाजी को और पैना करने की जरूरत है। हम बुमराह पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं और अश्विन की विदाई ने एक ऐसी रिक्तता पैदा की है, जिसे भरना कठिन है।
22 गज की पट्टी से परे देखें तो एक खेल राष्ट्र के रूप में भारत का उदय अभी अधूरा है। जनसंख्या और अर्थव्यवस्था को देखते हुए हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमताओं से काफी कम प्रदर्शन कर रहे हैं। एक ही खेल में उत्कृष्टता-जहां हम सबसे बड़ी वित्तीय शक्ति हैं-और कुछ अन्य खेलों में छिटपुट सफलता समग्र निराशाजनक परिणाम की भरपाई नहीं कर सकती। एक व्यापक रणनीतिक योजना आवश्यक है, ताकि समय के साथ प्रभावी प्रगति और निरंतर सफलता सुनिश्चित हो सके। हमारी जनसांख्यिकी में आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) की जो कमी हो सकती है, उसे प्रशिक्षण, अनुकूलन और पोषण के माध्यम से दूर करना होगा।
बदलाव आने में पीढ़ियां लगती हैं और निरंतर ठोस प्रयासों का कोई विकल्प नहीं होता। कहते हैं कि ‘हजार मील की यात्रा एक छोटे कदम से शुरू होती है।’ लेकिन इससे पहले कि हम इस यात्रा पर निकलें, एक खेल संस्कृति विकसित करना आवश्यक है। एक समाज का खेलों के प्रति केवल ‘उपयोगितावादी’ दृष्टिकोण नहीं हो सकता। हर कोई पेशेवर खिलाड़ी नहीं बनेगा, न ही हर व्यक्ति खेल में श्रेष्ठता के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश या रोजगार नियुक्ति सुनिश्चित कर पाएगा। फिर भी, केवल खेलने के आनंद के लिए खेलना और खेल के आंतरिक लाभों को आत्मसात करना आवश्यक है। जैसा कि कहा गया है, ‘आपके पास जो भी प्रतिभा है, उसका उपयोग करें। याद रहे कि जंगल खामोश हो जाएंगे यदि केवल वही पक्षी गाएंगे, जो सबसे अच्छा गाते हैं।’
(लेखक दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक हैं)












