जगमोहन सिंह राजपूत। गत दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की कक्षा आठ की एक पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि उसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ था। न्यायालय ने इसे लापरवाह और तिरस्कारपूर्ण माना। उसने और भी बहुत कुछ कहा, जैसे कि इसके पीछे गहरी साजिश है। यह सही प्रश्न पूछा जा रहा है कि केवल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर ही अलग पाठ क्यों? हालांकि बाद में पता चला कि इसके पहले राजनीति तथा नौकरशाही में कदाचरण पर चर्चा हो चुकी है।

अभी सुप्रीम कोर्ट में एनसीईआरटी को इस पूरे प्रकरण पर अपना पक्ष रखना है। संभवत: अध्यापकों और एनसीईआरटी ने केवल न्याय-व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर अलग से पाठ लिखकर भूल की है और भूल करना अपराध नहीं है। भूलें अज्ञान या अनुभवहीनता के कारण हो सकती हैं और अधिकांश अवसरों पर सुधारी जा सकती हैं। इसके लिए उस संस्था को अपमानित करना आवश्यक नहीं। उस पुस्तक के पाठ में जो लिखा है, वह कितना सही या गलत है, यह तो लोग नहीं जानते, लेकिन न्यायपालिका के रुख पर देशव्यापी चर्चा हो रही है।

एनसीईआरटी की स्थापना 1961 में हुई। तब से यह संस्था शिक्षा के क्षेत्र में एक थिंकटैंक बनकर उभरी और उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी साख बनाई है। देश की हर व्यवस्था को चलाने वाले अधिकांश लोग तथा विद्वत वर्ग एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़कर जीवन में आगे बढ़े हैं और संस्था के प्रति आदरभाव रखते हैं। देश की उच्चतम प्रशासनिक सेवा में प्रवेश के लिए तैयारी करने वाले युवा एनसीईआरटी की पुस्तकों का पूर्ण विश्वास से अध्ययन करते हैं। एनसीईआरटी ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ का निर्माण करती है और नैतिकता, आचारनीति तथा मूल्य-आधारित जीवन जीने के लिए देश के भविष्य को संवारने में संलग्न है। देश की शिक्षा की समय के साथ गतिशीलता और उपयोगिता बनाए रखने के लिए समय-समय पर एनसीईआरटी नए पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या और पुस्तकें बनाती है।

इस प्रक्रिया में सारे देश से आमंत्रित विशेषज्ञ भाग लेते हैं और प्रत्येक पांडुलिपि अनेक स्तरों पर पूरी तरह परखी जाती है। एनसीईआरटी की आलोचना भी अनेक अवसरों पर होती है, जिसके पीछे प्रायः वैचारिक/राजनीतिक प्रतिबद्धताएं ही हावी होती हैं। एनसीईआरटी से गलतियां भी होती रही हैं, लेकिन सामने आते ही सुधारी जाती हैं। खेद व्यक्त किए जाते हैं। जैसे कि एक बार एक किताब में कुछ पैराग्राफ लेखक ने नकल कर लिखे थे। मामला सामने आने पर त्वरित सुधार किए गए। एक अन्य पुस्तक में मेडागास्कर को अरब सागर में दिखाया गया था। उसे भी पुनः सुधार कर हिंद महासागर किया गया। जाहिर है एनसीईआरटी ने अपनी गलती मानी और पुस्तकों में परिवर्तन किए, लेकिन किसी ने किसी भी स्तर पर इसके पीछे किसी सोची-समझी साजिश की बात नहीं कही। यह संस्था सभी की है, देश की है। एनसीईआरटी की हर पुस्तक के प्रकाशन के लिए अंतिम स्वीकृति निदेशक की ही होती है। नैतिक जिम्मेदारी भी उसी की होती है। वर्तमान प्रकरण में भी ऐसा ही माना जाना चाहिए।

2002-03 में इतिहास की एक पांडुलिपि तत्कालीन निदेशक के समक्ष प्रस्तुत की गई। उसमें एक वाक्य था, ‘राजीव गांधी की हत्या तमिल क्रिश्चियन व्यक्ति द्वारा की गई।’ एक पाठ का शीर्षक था, ‘इस्लामिक कट्टरवाद।’ यह सही है कि निदेशक एक शब्द भी लेखक की अनुमति के बिना बदल नहीं सकते, लेकिन वह पांडुलिपि को अस्वीकृत कर सकते हैं। तब भी ऐसा ही किया गया और नई पांडुलिपि तैयार की गई। एनसीईआरटी की पुस्तकों में परिवर्तन के सुझाव साल भर अध्यापकों, छात्रों, लेखकों तथा विद्वानों की ओर से आते रहते हैं। संस्था के विद्वान विशेषज्ञ उनका अध्ययन करते हैं, और जहां आवश्यक होता है परिवर्तन करते हैं।

एनसीईआरटी की किताबें प्रति वर्ष मुद्रित होती हैं। 2001 में कक्षा तीन के एक विद्यार्थी ने पत्र लिख एक पुस्तक में प्रकाशित चित्र के शीर्षक पर सवाल उठाया। वह शीर्षक था-‘किसान हल जोत रहा है’, जबकि किसान कंधे पर हल रखे हुए था। उसका संज्ञान लेते हुए अगले वर्ष पुस्तक में आवश्यक सुधार किए गए और उस छात्र को पत्र लिख गलती के लिए क्षमा मांगी गई। इससे साफ होता है कि एनसीईआरटी ने समय के साथ अपनी गलतियां सुधारी हैं, लेकिन हर संस्था के समक्ष यह संभावना नहीं रहती। जब एक स्तर पर न्यायालय से दोषी पाया गया युवक 15-20 साल बाद ऊंचे स्तर के न्यायालय से अपराध मुक्त कर दिया जाता है, तब उसके जीवन के साथ न्याय करना सर्वोच्च न्यायालय के बस में नहीं रह जाता।

यह भारतीय संस्कृति की सर्वमान्य अवधारणा है कि अध्यापक को सदा ही संवेदनशील, अहंकार विहीन और ज्ञान अर्जन के प्रति समर्पित होना चाहिए। उसे जीवनपर्यंत सीखते रहने के सिद्धांत का अनुपालन करना चाहिए। इन्हीं मूलभूत सिद्धांतों पर एनसीईआरटी को पिछले छह दशकों से विकसित किया जाता रहा है। यह सिद्धांत हर स्तर के न्यायालयों पर भी लागू होता है और होने चाहिए। देश के विकास के लिए संस्थाओं के बीच पारस्परिक सहयोग और सम्मान ऐसे मूलभूत मानवीय मूल्य हैं, जिन्हें कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता।

(लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)