विचार: सुहाने सपने दिखाते सिविल सेवक
नौकरशाहों के साथ नेताओं के भ्रष्टाचार के मामले सामने आते ही रहते हैं। आम तौर पर नेता तभी भ्रष्टाचार करने में समर्थ होते हैं, जब उन्हें भ्रष्ट नौकरशाहों का साथ मिलता है। अपने देश में भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई मुश्किल से हो पाती है।
HighLights
यूपीएससी सफल अभ्यर्थियों के भव्य स्वागत पर उठे सवाल।
सिविल सेवकों में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार की है आवश्यकता।
ईमानदार अधिकारियों को प्रोत्साहन, भ्रष्टों पर हो कड़ी कार्रवाई।
राजीव सचान। संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा को देश ही नहीं, दुनिया की कठिनतम परीक्षाओं में से एक माना जाता है। इसी कारण इस परीक्षा के सफल अभ्यर्थियों के नाम सबका ध्यान खींचते हैं। सफल अभ्यर्थी और विशेष रूप से शीर्ष स्थान अर्जित करने वाले अपने माता-पिता और शिक्षण संस्थान का नाम रोशन करते हैं। जो साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं, उनकी सफलता पूरे समुदाय में गर्व का भाव जगाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज में आइएएस और विशेष रूप से कलेक्टर यानी डीएम बनना प्रतिष्ठा का परिचायक रहा है। यूपीएससी यानी सिविल सेवा परीक्षा पास करना प्रतिष्ठा का कितना बड़ा विषय है, इसे इससे समझा जा सकता है कि कई जगह सफल अभ्यर्थियों का गाजे-बाजे के साथ स्वागत-सत्कार होता है।
बीते दिनों यूपीएससी परीक्षा में सफल रहे कई अभ्यर्थियों का उनके गांव-घर में कुछ उसी भव्य तरीके से स्वागत किया गया, जैसे किसी नवनिर्वाचित नेता के चुनाव जीत लेने पर होता है। एक अभ्यर्थी ने अपने स्वागत के समय कार में सवार होकर जनता का अभिवादन किया और लोगों ने उन्हें फूल-मालाएं पहनाईं। एक के स्वागत में लोग संगीत की धुन पर नाचते और अभ्यर्थी को नोटों की माला पहनाते दिखे। एक अन्य के काफिले में लैंड रोवर, डिफेंडर जैसी लक्जरी गाड़ियां नजर आईं। कुछ पुराने सिविल सेवकों ने सफल अभ्यर्थियों के नेताओं सरीखे ऐसे भव्य स्वागत पर असहमति और अप्रसन्नता प्रकट की। कुछ ने उन्हें नसीहत दी कि यूपीएससी परीक्षा पास करना मात्र कोई इतनी बड़ी उपलब्धि नहीं कि उनका ढोल बजाकर स्वागत किया जाए। इस असहमति का कुछ मूल्य-महत्व हो सकता है, लेकिन क्या कोई उस पर ध्यान देगा?
आने वाले दिनों में यूपीएससी में सफल अभ्यर्थियों के ऐसे साक्षात्कार पढ़ने-सुनने को मिल सकते हैं, जिनमें वे बताएंगे कि कैसे देश और समाज सेवा के जज्बे ने उन्हें सिविल सेवक बनने को प्रेरित किया। लगभग हर सफल अभ्यर्थी का स्वर यही होता है कि वह समाज के लिए कुछ करना चाहता था और इसका सबसे उत्तम उपाय सिविल सेवा में जाना था। इसमें संदेह नहीं कि आइएएस, आइपीएस जैसे पद सबसे सामर्थ्यवान हैं। इन पर आसीन होने वाले अपने विभाग या क्षेत्र की तस्वीर और लोगों का भाग्य बदल सकने में समर्थ होते हैं, पर क्या औसत सिविल सेवक ऐसा कर पा रहे हैं? यह वह प्रश्न है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सिविल सेवकों को प्रशासनिक सेवा की रीढ़ माना जाता है। प्रशासन में उनके योगदान को रेखांकित करने के लिए प्रति वर्ष 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1947 में इसी तिथि को सरदार पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रथम बैच के अधिकारियों को संबोधित किया था। इसी संबोधन में उन्होंने सिविल सेवकों को इस्पाती ढांचे की संज्ञा दी थी, पर पिछले काफी समय से यह स्वर उभर रहा है कि इस इस्पाती ढांचे को जंग लग चुकी है। इसी के साथ सिविल सेवकों की कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता भी जताई जा रही है। कहना कठिन है कि इस आवश्यकता की पूर्ति होगी या नहीं, क्योंकि मनमोहन सरकार के समय जिस प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था, उसकी सिफारिशों पर आज तक अमल नहीं हुआ। यह अमल मोदी सरकार की ओर से बार-बार यह कहते रहने के बाद भी नहीं हुआ कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाई गई है। इस कथित जीरो टालरेंस नीति के बावजूद नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।
नौकरशाहों के साथ नेताओं के भ्रष्टाचार के मामले सामने आते ही रहते हैं। आम तौर पर नेता तभी भ्रष्टाचार करने में समर्थ होते हैं, जब उन्हें भ्रष्ट नौकरशाहों का साथ मिलता है। अपने देश में भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई मुश्किल से हो पाती है। कई बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप से घिरे नेताओं को तो राजनीतिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन ऐसे ही आरोपों से दो-चार नौकरशाहों का मुश्किल से ही कुछ बिगड़ पाता है। एक तो उनके भ्रष्ट आचरण के खिलाफ जांच बहुत मुश्किल से हो पाती है और दूसरे, जांच में कठिनाई से ही दूध का दूध और पानी का पानी हो पाता है। ऐसे सिविल सेवकों की गिनती करना कठिन है, जिन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास करते समय समाज सेवा करने की बड़ी-बड़ी बातें की थीं, लेकिन बाद में वे भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए।
विडंबना यह कि इनमें से कुछ वे भी रहे, जो अपने बैच के टापर थे या फिर जिनकी ख्याति इसलिए हुई थी कि उन्होंने पहले ही प्रयास में प्रथम 10 या 20 सफल अभ्यर्थियों में स्थान हासिल किया था अथवा सबसे कम उम्र के सफल अभ्यर्थी बने थे। निःसंदेह ईमानदार और कर्मठ सिविल सेवकों की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि वही प्रशासन की इज्जत बचाए हुए हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि भ्रष्ट सिविल सेवक निष्ठावान सिविल सेवकों की बदनामी का कारण बनते हैं। इसलिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि भ्रष्ट सिविल सेवकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और अपना काम सही से करने वालों को प्रोत्साहित किया जाए। महिमामंडन भी उन्हीं का होना चाहिए, न कि केवल सुहाने सपने दिखाने वालों का।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)












