विकास सारस्वत। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों द्वारा चुनावी राजनीति के दृष्टिगत मुफ्त सुविधाएं बांटने वाली प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की। ऐसी राजनीति को देश के आर्थिक विकास में बाधक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि समर्थ लोगों को भी मुफ्त सुविधाएं देना गलत है और ऐसी सुविधाएं बांटने की बजाय सरकारों को रोजगार पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें विद्युत संशोधन नियम 2024 के उस नियम 23 को रद करने की मांग की गई थी, जो राज्य सरकार द्वारा गरीब-अमीर, सभी को मुफ्त बिजली आवंटन के उसके प्रस्ताव में बाधा बन रहा था। सुनवाई के दौरान करदाताओं के पैसे का मुफ्त सुविधाओं और कैश ट्रांसफर के लिए अंधाधुंध उपयोग करने पर भी कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की। उसने इस पर हैरानी जताई कि वित्तीय घाटे के बावजूद राज्य सरकारें मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे रही हैं और इन योजनाओं के लाभार्थियों में संपन्न लोग भी शामिल हैं।

चुनाव पूर्व इस वित्त वर्ष के लिए पेश तमिलनाडु के बजट में लगभग 99,000 करोड़ की राशि कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं के लिए आवंटित की गई है। यह राशि समूचे बजट की एक तिहाई बनती है, जबकि विकास कार्यों में खर्च होने वाली राशि इस व्यय की आधी यानी करीब 47,000 करोड़ है। बजट राशि का ऐसा बेपरवाह आवंटन एक राजनीतिक प्रवृत्ति बन गया है और इसके दुष्परिणाम अनेक राज्यों में देखे जा सकते हैं। यह विडंबना ही है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से रेवड़ी संस्कृति पर चिंता जताए जाने के बीच ही अभिनेता से नेता बने विजय ने घोषणा की कि उनके दल टीवीके की सरकार बनने पर 60 साल की उम्र तक की महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की आर्थिक सहायता, हर परिवार को साल में छह मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, दिए जाएंगे।

उन्होंने अन्य लोकलुभावन घोषणाएं करते हुए युवतियों की शादी के समय आठ ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी देने का भी वादा किया। ऐसी योजनाओं ने कई राज्यों के राजकोष पर भारी दबाव बनाया है। पंजाब की स्थिति विशेषकर खराब है। यहां कुल राजस्व प्राप्ति का 18 प्रतिशत बिजली की सब्सिडी में ही व्यय हो रहा है। राज्य के बजट का 10 प्रतिशत से भी कम आवंटन विकास परियोजनाओं की मद में हो रहा है। बिजली सब्सिडी के अलावा अन्य लाभार्थी योजनाओं के चलते पंजाब का वित्तीय प्रबंधन इतना खराब हो चला है कि ऋण से राज्य सकल घरेलू उत्पाद यानि डेट टू एसजीडीपी रेशियो 45 से 46 प्रतिशत के करीब आ पहुंचा है। जबकि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन यानी एफआरबीएम समिति इसे 20 प्रतिशत पर रखने का सुझाव देती है। इसके बाद भी पंजाब सरकार ने महिलाओं को हर माह 1,000 रुपये देने की घोषणा की है।

वर्ष 2025-26 के अंत तक कर्नाटक पर कुल देनदारियां 7.64 लाख करोड़ तक पहुंच गई थीं, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 27 प्रतिशत है। कर्नाटक का डेट टू एसजीडीपी रेशियो अभी ठीक है, पर यह 10 वर्ष पूर्व की स्थिति से काफी खराब है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रवृत्ति को रेवड़ी संस्कृति बताते हुए इसकी आलोचना की थी, पर दुखद यह है कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी वित्त प्रबंधन बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। मध्य प्रदेश के 2026-27 के 4.38 लाख करोड़ रुपये के बजट में लगभग 80,000 करोड़ रुपये राशि का आवंटन कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया गया है। यह राशि लाड़ली बहना, लाड़ली लक्ष्मी, किसान कल्याण, तीर्थ यात्रा, साइकिल एवं दुग्ध वितरण और बिजली सब्सिडी जैसे प्रयोजनों पर खर्च की गई है।

रेवड़ी संस्कृति के चलते पंजाब, बंगाल, आंध्र और राजस्थान ऐसे राज्य बन गए हैं, जहां ढांचागत विकास कार्यों पर पूंजीगत व्यय कुल बजट के 10 प्रतिशत से भी कम हो गया है। इस परिपाटी का दुखद पहलू यह है कि सामाजिक कल्याण और मुफ्तखोरी में भेद खत्म हो गया है। पार्टियां स्कूटी, टीवी, मिक्सर ग्राइंडर और सोना तक बांटने की घोषणा करती हैं। मुफ्तखोरी पर खर्च प्रत्येक रुपया शिक्षा, स्वास्थ्य एवं ढांचागत विकास जैसे आवश्यक निवेश की कीमत पर हो रहा है, जिनसे गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन का दीर्घकालिक समाधान संभव है। ऐसा नहीं है कि पार्टियां यह सब समझती नहीं। उन्हें पता है कि उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि के बिना मुफ्तखोरी पर भारी खर्च मुद्रा का अवमूल्यन भी करेगा, फिर भी राजनीतिक हित राष्ट्र हित पर भारी पड़ रहे हैं।

रेवड़ी आवंटन विकास कार्यों में तो बाधा बन ही रहा है, यह ऐसी राजनीतिक संस्कृति को भी जन्म दे रहा है, जहां नागरिकों का ध्यान सरकारों के शासकीय दायित्व से हटकर व्यक्तिगत लोभ और लालच पर अटका दिया गया है। जन अपेक्षा सरकारों की कार्यकुशलता और पारदर्शिता की बजाय इस ओर मुड़ रही है कि अगले चुनाव में कौन पार्टी कितनी लुभावनी योजनाएं घोषित करेगी। चुनावों में छिपकर नोट, शराब और साड़ी वितरण जैसे प्रयत्नों से परे रेवड़ी संस्कृति ने राजनीतिक भ्रष्टाचार को ऐसा संस्थागत रूप दे दिया है, जहां मतदाता को एलानिया घूस दी जा रही है।

मूल संसाधन एकत्रित करने से लेकर शिक्षा और विवाह जैसे गृहस्थ दायित्वों का भार अपने ऊपर ले रही सरकारें शासन को ऐसी धारा में ले जा रही हैं, जहां व्यक्तिगत पुरुषार्थ का महत्व क्षीण हो रहा है। इसका सीधा असर उत्पादकता पर भी पड़ रहा है। दक्षिण के कई राज्यों में हो रहे प्रवासन का बड़ा कारण ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के चलते स्थानीय श्रम शक्ति की बढ़ती अनुपलब्धता है। कुछ शोध यह दर्शा रहे हैं कि ऐसी योजनाएं अवैध बांग्लादेशी आप्रवासन को भी बढ़ावा दे रही हैं। नीति निर्धारण, विधायिका के हाथ में होने के कारण न्यायालय भी टिप्पणी के अतिरिक्त ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। वहीं नेताओं में मुफ्त सुविधाएं देने की होड़ लगी हुई है। रेवड़ी संस्कृति का विरोध करने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने भी अब इस रुझान से समझौता कर लिया है। ऐसे में प्रबुद्ध जनों को ही राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप पर लोगों को जागरूक करना होगा।

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)