राजीव सचान। कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में हिंसा के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा में सुधार के लिए एक के बाद एक कई फैसले ही नहीं लिए, बल्कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र भी लिया। इस त्यागपत्र से यही संदेश निकला कि यह सीजेपी के दबाव का नतीजा रहा। सीजेपी दबाव बनाने में इसलिए सफल नहीं रही कि उसके डिजिटल मीडिया में करोड़ों फालोअर्स थे। वह इसलिए सफल रही कि उसके धरना-प्रदर्शन में नीट और अन्य परीक्षाओं में सेंध लगने से पीड़ित छात्रों के साथ उनसे सहानुभूति रखने वाले और अन्य अनेक लोग तब उमड़ आए, जब जंतर-मंतर पर अनशनरत पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।

जिस धरने में हजार लोग कठिनाई से जुटते थे, वहां वांगचुक को अस्पताल ले जाते ही कई हजार एकत्रित हो गए। इनमें छात्र, आम लोग, विभिन्न राजनीतिक-गैर राजनीतिक संगठनों के कार्यकर्ता और रील बनाने वालों के साथ कुछ आवारा और अराजक किस्म के तत्व भी थे। शायद ऐसे ही तत्वों के कारण संसद मार्च में हिंसा हुई, जिसके शिकार प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसकर्मी भी बने।

जब सीजेपी के संसद मार्च में हिंसा के बाद भी भीड़ कम नहीं हुई, तब सरकार दबाव में आई। उसकी ओर से तमाम फैसले लेने के साथ ही शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी लिया गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री के वीडियो संदेश भी आए। इसके पहले नीट मामले में उनका कोई बयान भी सीधे तौर पर नहीं आया था। आखिर सरकार यह क्यों नहीं समझ सकी कि नीट पेपर लीक से लाखों छात्र और अभिभावक प्रभावित हुए हैं। उसे वे सारे फैसले ले लेने चाहिए थे, जो 20 जुलाई के बाद लिए गए या ये कहिए कि लेने पड़े।

आखिर ये सारे फैसले पहले क्यों नहीं लिए जा सके? आखिर ऐसा भी नहीं था कि नीट पेपर लीक के बाद शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग न उठी हो। निःसंदेह त्यागपत्र समस्या का कोई सटीक समाधान नहीं होता, लेकिन राजनीतिक जवाबदेही और नैतिकता की राजनीति की भी एक मांग होती है। ऐसे त्यागपत्र लोगों के आक्रोश को कम करते हैं और साथ ही सरकार की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं।

किसी गंभीर समस्या और खासकर ऐसी समस्या पर, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए हों, सरकार को समय रहते हस्तक्षेप ही नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी प्रदर्शित करना चाहिए कि वह पीड़ित-प्रभावित लोगों के प्रति सच्ची संवेदना रखती है। इसकी अनदेखी न की जाए कि शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग विपक्षी दल ही नहीं, सरकार के कुछ समर्थकों की ओर से भी की गई थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों ने तो उनके त्यागपत्र की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन भी किए थे, लेकिन इन आयोजनों में न तो पेपर लीक से पीड़ित छात्र आए और न ही अन्य आम लोग।

सरकार से एक गलती यह भी हुई कि सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके जब पहली बार धरना देने आए तो उसने उन्हें तत्काल उसके आयोजन की अनुमति दे दी, लेकिन जब इस समूह ने जंतर-मंतर पर दूसरी बार धरना देने का फैसला किया, तब उसने उसे कोई भाव नहीं दिया-तब भी नहीं जब सोनम वांगचुक अनशन पर बैठ गए। सरकार यह समझ नहीं सकी कि सीजेपी का इरादा कुछ भी हो, उसने एक सही मुद्दे को पकड़ा है। वह तब चेती, जब सीजेपी के संसद मार्च में हिंसा हो गई। हिंसा की नौबत इसलिए भी आई, क्योंकि संसद सत्र के दौरान सीजेपी समर्थक बिना अनुमति संसद जाने पर अड़े। यदि कोई भीड़ जबरन संसद या विधानसभा जाने की कोशिश करेगी तो यह संभव नहीं कि उसका पुलिस से टकराव न हो। यह टकराव कई बार हिंसा को जन्म देता है।

तब और भी, जब भीड़ अनियंत्रित हो और वह हर हाल में संसद या विधानसभा जाने को आतुर हो। ऐसे में पुलिस के पास आंसू गैस छोड़ने, लाठियां चलाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। ऐसे में वह खुद पिटती है और भीड़ को भी पीटती है। कई बार उसका बल प्रयोग वैसे ही मुद्दा बन जाता है, जैसे इन दिनों बना हुआ है। आखिर सीजेपी समर्थकों की भीड़ संसद जाकर क्या करती? क्या परीक्षा सुधार पर बहस? संभवतः वह वही करती, जो उसने कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर किया था-हिंसा। तब जो दृश्य दिखाई देते वे देश की बदनामी कराते।

धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र को अपनी जीत बता रहे विपक्षी दलों को सोचना चाहिए कि आखिर नीट पेपर लीक मामले में वे सरकार पर कोई प्रभावी दबाव बनाने में सफल क्यों नहीं रहे? क्या यह सच नहीं कि वे प्रधानमंत्री को इस मामले में एक बयान देने के लिए भी बाध्य नहीं कर सके? उन्हें इस पर विचार करना चाहिए कि कहीं वे इसलिए तो विफल नहीं रहे कि जनता के बीच उनकी इतनी विश्वसनीयता नहीं रही कि एक गंभीर मुद्दे पर अपने नेतृत्व में आम लोगों को खड़ा कर पाते।

यदि वे इस मुद्दे पर कोई प्रभाव छोड़ पाते तो शायद सीजेपी को धरने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे बड़ा सच यह भी है कि नीट मामले में किसी को सक्रियता दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती, यदि सरकार पहले दिन से ही सचेत-संवेदनशील दिखती। यह समझा जाए कि सीजेपी ने उस रिक्त स्थान को भरा, जो सरकार और विपक्ष की ओर से अपने हिस्से की जिम्मेदारी न निभाने से रिक्त हुआ। यह कोई शुभ संकेत नहीं-न सरकार और न विपक्ष के लिए।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)