विचार: संस्थागत बीमारी है पेपर लीक
नीट पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध प्रदर्शन और सोनम वांगचुक के अनशन ने राजनीतिक दलों को सक्रिय किया। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद भी लेखक का मानना है कि पेपर लीक एक संस्थागत बीमारी है, जिसका समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि तकनीक और नैतिक मूल्यों से होगा।
HighLights
नीट पेपर लीक पर सीजेपी विरोध, सोनम वांगचुक का अनशन।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, सरकार ने कठोर कानून बनाने का फैसला किया।
पेपर लीक संस्थागत बीमारी, नैतिक पतन और तकनीक से समाधान संभव।
संजय गुप्त। संसद का मानसून सत्र शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे समूह काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी को कुछ अहमियत तब मिली, जब लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अनशन प्रारंभ किया।
18 जुलाई को जब दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाकर भर्ती किया तो जंतर-मंतर पर भीड़ कुछ बढ़नी शुरू हुई। 20 जुलाई को संसद शुरू होने के दिन सीजेपी के संसद मार्च के पहले जंतर-मंतर पर अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई। पुलिस ने जब भीड़ को संसद की ओर जाने से रोका तो कुछ शरारती तत्वों ने उस पर पथराव करना और बैरिकेडिंग लांघना शुरू कर दिया।
पुलिस ने भीड़ को संसद की ओर जाने से रोकने के लिए जो सख्ती दिखाई, उसने यह बताया कि वह न तो भीड़ का अनुमान लगा सकी और न ही उससे निपटने के लिए ठोस रणनीति बना सकी। इस पर हैरानी नहीं कि उसकी सख्ती एक मुद्दा बन गई, लेकिन सच यह भी है कि भीड़ में कुछ तत्व पुलिस को निशाना बनाने की तैयारी से आए थे।
यह माहौल बनाना सही नहीं कि भीड़ ने कुछ नहीं किया और पुलिस ने बेवजह बल प्रयोग किया। आखिर घायलों में प्रदर्शनकारियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस कर्मी भी हैं। इसकी भी अनदेखी न की जाए कि अपने समर्थकों में कुछ अराजक तत्वों के घुस आने की बात सीजेपी प्रमुख ने भी मानी।
सीजेपी के संसद मार्च में हिंसा के बाद राजनीतिक दलों को सरकार के खिलाफ एक मुद्दा मिल गया और वे उसे भुनाने के लिए एक-दूसरे से होड़ में लग गए। कांग्रेस ने जब यह देखा कि सीजेपी को महत्ता मिल रही है तो राहुल गांधी अचानक प्रधानमंत्री आवास के निकट धरना देने पहुंच गए। आम आदमी पार्टी को यह रास नहीं आया और उसने आपत्ति जताते हुए भाजपा-कांग्रेस में मिलीभगत का आरोप लगा दिया। साफ है विपक्ष का रवैया छात्र हित के बहाने अपनी राजनीति चमकाने वाला अधिक रहा।
अनशन तोड़ चुके सोनम वांगचुक को खारिज कर रही कांग्रेस इससे चिंतित दिखी कि कहीं सीजेपी को समर्थन देना उसके लिए राजनीतिक रूप से हानिकारक न हो जाए। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की चिंता का एक कारण यह भी रहा कि नीट पेपर लीक मामले में उसके विरोध से अधिक महत्ता एक नए बने संगठन को मिल गई। यह उनकी चिंता का कारण बनना भी चाहिए, क्योंकि यह स्थिति जनता में उनके प्रति भरोसे की कमी को दिखाती है। विपक्षी दल धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की घोषणा को अपनी जीत बता सकते हैं, लेकिन यह सीजेपी के बैनर तले आए छात्रों के दबाव का नतीजा अधिक है।
शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के पहले प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने के साथ ही सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम को और कठोर बनाने का फैसला किया। सरकार नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के स्वजनों को मुआवजा देने समेत संसद मार्च में हिंसा के आरोपितों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने की सीजेपी की मांग पर भी सहमत हो गई।
इसके बाद सीजेपी प्रदर्शन खत्म करने को तैयार हो गई, लेकिन यदि यह समझा जा रहा है कि शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र से परीक्षा के मोर्चे पर सब कुछ ठीक हो जाएगा तो यह सही नहीं, क्योंकि पेपर लीक एक संस्थागत बीमारी है। यह बीमारी केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं। अब तो शिक्षक ही पेपर लीक कराने में शामिल पाए जा रहे हैं। सब जानते हैं कि स्कूली परीक्षाओं में भी नकल होती है और इन परीक्षाओं के भी पेपर लीक किए और कराए जाते हैं।
नकल एक सामाजिक बुराई बन गई है। आज जो छात्र पेपर लीक मसले पर उग्र हैं, उनमें से अनेक यह जानते होंगे कि उनके कई साथी नकल करके पास होते रहे हैं। क्या सीजेपी यह मांग करेगी कि सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम के दायरे में परीक्षाओं में नकल करने और कराने वाले भी लिए जाएं या फिर इसके लिए कोई नया कानून बनाया जाए?
सीजेपी के सदस्य और उनके समर्थक इससे अनजान नहीं हो सकते कि नकल कर पास होने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है? जो छात्र शुरू से धोखाधड़ी का सहारा लेकर पास होने का आदी रहा हो, वह प्रतियोगी परीक्षाओं में भी छल-कपट के सहारे पास होने की कोशिश करता है। कई बार तो अभिभावक और शिक्षक भी उनका साथ देते हैं। इसी कारण पेपर लीक का एक बाजार बन गया है। इसी बाजार के कारण पेपर लीक माफिया पैदा हो गया है, जिसमें कोचिंग चलाने वाले भी शामिल हैं। पेपर लीक माफिया परीक्षाओं के आयोजन से जुड़े लोगों को पैसे देकर अपने साथ मिला लेता है।
इस बार तो उन शिक्षकों ने ही नीट के पेपर लीक कराए, जिनकी जिम्मेदारी इस परीक्षा की शुचिता बनाए रखने की थी। ऐसे में कहना कठिन है कि पेपर लीक संबंधी कानून को और कठोर करने भर से समस्या का समाधान हो जाएगा। समाधान के लिए तकनीक को अपनाया जाना चाहिए। आज के युग में पुराने तौर-तरीकों से परीक्षा कराने का औचित्य नहीं। तब तो और भी नहीं, जब तकनीक सुलभ है और वह कारगर भी साबित हो रही है।
पिछले कुछ वर्षों में इतनी अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं कि उनकी गिनती करना कठिन है। चूंकि कई केंद्रीय परीक्षाओं के साथ करीब-करीब सभी राज्यों की अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं, इसलिए राजनीतिक दल एक-दूसरे को कठघरे में खड़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकते। उन्हें यह समझना होगा कि पेपर लीक समस्या का समाधान मिलकर करना होगा। उन्हें इस पर भी ध्यान देना होगा कि पेपर लीक का एक बड़ा कारण समाज का नैतिक पतन है और इस चारित्रिक पतन के लिए वे भी जिम्मेदार हैं।
यह नैतिक पतन ही परीक्षाओं में नकल और पेपर लीक जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है। क्या किसी सरकार या फिर राजनीतिक दलों अथवा सीजेपी के पास इस नैतिक पतन को रोकने का कोई उपाय है? यदि पेपर लीक मामले में संसद में बहस होती है तो क्या इस नैतिक पतन पर भी कोई बहस होगी? जब तक नैतिक मूल्यों के ह्रास की तरफ ध्यान नहीं जाएगा, तब तक परीक्षाओं में नकल होती रहेगी और प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर भी लीक होते रहेंगे।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)










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