विचार: राम मंदिर ट्रस्ट सीईओ के लिए अनावश्यक शर्त
श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास द्वारा सीईओ पद के लिए 'वैष्णव' होने की शर्त पर सवाल उठे हैं
HighLights
सीईओ पद के लिए 'वैष्णव' होने की शर्त पर सवाल।
यह शर्त हिंदू समाज में विभाजन बढ़ा सकती है।
ट्रस्ट को इस अनावश्यक शर्त पर पुनर्विचार करना चाहिए।
विवेक काटजू। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदकों की बड़ी संख्या को देखते हुए फिलहान नियुक्ति को कुछ समय के लिए आगे बढ़ा दिया है, लेकिन इसे लेकर कुछ सवाल भी उठे हैं। आवेदन से जुड़ी अपेक्षाओं में सीईओ के कर्तव्यों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
ये श्रेणिया हैं-मुख्य परिचालन एवं प्रशासनिक कर्तव्य, तीर्थयात्री प्रबंधन तथा सुरक्षा और सांस्कृतिक एवं संस्थागत संरक्षण। पहली दो श्रेणियां विशुद्ध प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रकृति की हैं। जबकि तीसरी श्रेणी धार्मिक अनुष्ठान पर्यवेक्षण के अंतर्गत यह उल्लेख है कि 'धार्मिक अनुष्ठानों, उत्सवों और मंदिर समारोहों के सुचारु, व्यवस्थित एवं पारंपरिक संचालन को सुगम और सुनिश्चित करना।'
सीईओ से यह भी अपेक्षा होगी कि वह उन पुजारियों-पुरोहितों को वे सभी आवश्यक सुविधाएं एवं सहयोग प्रदान करे, जो ऐसे समारोहों का संचालन करते हैं। ऐसी अपेक्षा इसलिए, क्योंकि इन कार्यक्रमों की प्रकृति पूरी तरह धार्मिक होगी, जिनके लिए उसके पास आवश्यक विशेषज्ञता का संभवत: अभाव होगा।
सीईओ के लिए निकले विज्ञापन में “सक्रिय हिंदू” होना अनिवार्य किया गया है। इस अनिवार्यता में कोई बुराई नहीं कि सीईओ को हिंदू होना ही चाहिए, लेकिन इसका दूसरा पहलू कुछ चिंतित करने वाला है। पिछले पांच सौ वर्षों के दौरान हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों के मतभेदों को दूर करने की दिशा में जो भी प्रगति हुई है, यह प्रविधान उसे पलटने की आशंका लिए हुए है।
यहां तक कि यह भाव श्रीराम के अनन्य भक्तों में से एक गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में व्यक्त भावना के भी विपरीत है। यह बात अब लगभग विस्मृत कर दी गई है कि तुलसीदास के समय में शैव और वैष्णव भक्तों के बीच गहरा मतभेद और वैमनस्य था। यह प्रतिद्वंद्विता आज भी देश के कुछ हिस्सों में मौजूद है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों से यह काफी हद तक समाप्त हो चुकी है। इसलिए इस पर आश्चर्य हुआ कि राम मंदिर में सीईओ के लिए किसी 'वैष्णव' को प्राथमिकता देने का उल्लेख क्यों था?
जब हिंदुओं को विभाजित करने वाली कोई बात मुझे व्यथित करती है तो स्मृति बचपन के दिनों की ओर लौट जाती है और मुझे दो मित्र-भाई याद आते हैं। इनमें से एक सेवानिवृत्त आइएएस हैं और दूसरे एक वरिष्ठ वकील। दोनों ही श्रीराम के परम भक्त हैं और रामचरितमानस के मर्मज्ञ। जब मैंने सीईओ पद पर नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन में 'रामभक्त वैष्णव' को प्राथमिकता की ओर उनका ध्यान आकर्षित कराया तो उन्होंने जवाब में मुझे रामचरितमानस की कई ऐसी चौपाइयां और दोहे भेजे, जिनमें यह उल्लेख है कि स्वयं प्रभु श्रीराम भगवान शिव के विषय में क्या कहते हैं, “सिव द्रोही मम भगत कहावा।
सो नर सपनेहुं मोहि न पावा॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥ ऐसा ही एक उदाहरण भगवान श्रीराम के अयोध्यावासियों को संबोधन का है, जिसमें वे कहते हैं, "औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं करि जोरि। शंकर भजन बिना नर भगति न पावै मोरि॥" श्रीराम और महादेव के मध्य किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं और इसकी पुष्टि स्वयं दोनों के उद्गार करते हैं। "उमा कहउं मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत् सब सपना॥" जैसे दोहे के रूप में व्यक्त हुआ ऐसा ही एक भाव करोड़ों हिंदुओं के हृदय में बसा हुआ है।
जब स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने भक्ति भाव को लेकर ऐसे किसी विभाजन की राह को इतने प्रभावी ढंग से अवरुद्ध कर दिया कि आज शैव और वैष्णव के बीच अंतर की कोई बात नहीं करता, तब राम मंदिर के सीईओ के लिए 'वैष्णव' को प्राथमिकता देने की शर्त की भला क्या ही आवश्यकता थी? यह संभव है कि देश के कुछ हिस्सों में हिंदू समाज के बीच यह भेद अभी भी कुछ हद तक कायम हो, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्रों में आम हिंदू बिना ऐसे किसी आग्रह के सभी मंदिरों में अपनी आस्था के साथ श्रद्धानवत होते हैं।
एक सामान्य श्रद्धालु प्रभु श्रीराम, देवाधिदेव महादेव और आदिशक्ति देवी के विभिन्न रूपों-स्वरूपों की पूजा-अर्चना समान भाव से करता है और लोग स्वयं को शैव, वैष्णव या शाक्त (देवी-भक्त) कसौटियों पर कसते हुए एक-दूसरे के साथ कोई भेद नहीं करते।
यह दलील दी जा सकती है कि राम मंदिर में पूजा-पाठ करने वाले पुरोहित वैष्णव परंपरा के होने चाहिए, क्योंकि वही सभी रीतियों से भलीभांति परिचित होंगे, लेकिन यही पैमाना सीईओ पर लागू नहीं किया जा सकता। जब सरकार ने आइएएस अधिकारियों को प्रारंभिक ट्रस्ट का सदस्य बनाया और उन्हें इतने महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे तब क्या उनके लिए 'वैष्णव' होने की शर्त को वांछनीय माना गया था? प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से ऐसी किसी धार्मिक निष्ठा की अपेक्षा करना संवैधानिक और प्रशासनिक मर्यादा के भी विपरीत है।
यह स्थिति तब और भी विरोधाभासी लगती है, जब स्वयं प्रभु श्रीराम और महादेव दोनों ने ही अपने-अपने भक्तों को एक-दूसरे का अनादर न करने की स्पष्ट चेतावनी दी है।
हाल के घटनाक्रमों के चलते अयोध्या के राम मंदिर पर देश-दुनिया की निगाहें टिकी हैं। भले ही इसके निर्माण की राह सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय से प्रशस्त हुई हो, लेकिन प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान पर एक भव्य मंदिर करोड़ों हिंदुओं का स्वप्न रहा है और उसके साकार होने के बाद यह उनकी आस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण और भव्य प्रतीक बन चुका है। इसलिए ट्रस्ट को न केवल वित्तीय और प्रशासनिक मामलों में बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, बल्कि उसे इसका भी विशेष ध्यान रखना होगा कि वह जाने-अनजाने ऐसे कोई संकेत न दे, जिससे हिंदुओं के बीच सदियों पहले गिर चुकी विभाजन की कोई दीवार फिर से खड़ी हो जाए।
ट्रस्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि सीईओ पद के लिए किसी व्यक्ति के 'वैष्णव' होने को वांछनीय बताने वाली शर्त वापस ली जाए। वैसे तो आवेदन की अंतिम तिथि बीत चुकी है, फिर भी यदि ट्रस्ट चाहे तो इस शर्त को हटाने का कोई रास्ता निकाल सकता है।
(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)










-1785518677121_v.jpg)

