तरुण गुप्त। छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े उथल-पुथल भरे माहौल में आखिरकार शांति आई। यह आने वाला समय ही बताएगा कि यह आंदोलन की समाप्ति है या केवल एक अस्थायी ठहराव। वैसे भी हमारे जैसे विविधतापूर्ण और विभिन्न स्तरों पर बंटे राष्ट्र-समाज में विभाजनकारी मुद्दों की कभी कोई कमी नहीं होगी। इन मतभेदों के मोर्चे पर संतुलन साधकर जनहित के मार्ग पर आगे बढ़ना हमेशा एक बड़ी चुनौती होती है। कुछ तीखे तेवरों वाला यह आंदोलन चूंकि अब समाप्त हो गया है, इसलिए इस पर नागरिकों की प्रतिक्रिया एवं शासन की भूमिका जैसे दोनों पहलुओं पर विचार करना समीचीन होगा।

पेपर लीक की शिकायत से शुरू हुआ यह मुद्दा धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन में बदल गया। कार्यकर्ताओं, कलाकारों, किसान संगठनों और विपक्षी दलों जैसे विभिन्न समूह इसके साथ जुड़ते गए, जिसके पीछे व्यक्तिगत सरोकारों से लेकर राजनीतिक हितों की अपनी भूमिका रही। इसमें जनभावनाओं को लामबंद करने में इंटरनेट मीडिया की भूमिका भी दिखाई पड़ी। ऐसा व्यापक जनाक्रोश केवल गुमराह करने वाले तत्वों के जरिये ही नहीं पनप सकता। राजनीतिक अवसरवादी ऐसी आग को भड़का सकते हैं, लेकिन इसकी चिंगारी उन व्यवस्थागत विसंगतियों में निहित होती है, जिन्हें लंबे समय से अनदेखा किया गया हो।

स्मरण रहे कि स्कूली शिक्षा में सुधार की मांग लंबे समय से की जा रही है। छात्रों और शिक्षकों की अनुपस्थिति, अप्रशिक्षित शिक्षक और पुरानी शिक्षण पद्धतियां सरकारी स्कूलों तथा कम लागत वाले निजी संस्थानों को प्रभावित कर रही हैं। चुनिंदा नामी-गिरामी स्कूलों को छोड़कर अधिकांश संस्थान बुनियादी शिक्षा देने में भी संघर्ष कर रहे हैं। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की अनुकूल तैयारी के अभाव में छात्र निजी कोचिंग सेंटरों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जहां बेहतर तैयारी काफी हद तक आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है।

'शिक्षा का अधिकार' मिलने के बाद भी 'सही और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' पाना अभी भी एक अधूरा लक्ष्य ही बना हुआ है। उच्च शिक्षा की एक गंभीर चुनौती सीटों की भारी कमी से जुड़ी है। सीमित सीटों के चलते लाखों छात्र अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और तनाव के शिकार होते हैं। चाहे नीट हो या जेईई या सीयूईटी और यहां तक कि 12वीं बोर्ड परीक्षा, जहां किसी दिन विशेष का प्रदर्शन-परिणाम ही किसी युवा के भविष्य की दिशा तय कर देता है।

प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए कई देशों में कहीं व्यापक प्रणालियां प्रचलित हैं, जो स्कूली प्रदर्शन, मानकीकृत परीक्षाओं, निबंधों, साक्षात्कारों और पठन-पाठन से इतर गतिविधियों के आधार पर अभ्यर्थियों का समग्रता में मूल्यांकन करती हैं। इसके मर्म को तो आत्मसात किया जाना चाहिए कि जीवन कोई टी-20 नहीं, अपितु टेस्ट की तरह है, जहां हर छात्र एक दूसरी पारी रूपी अवसर का हकदार है। केवल एक परीक्षा पर निर्भर रहने के बजाय वर्ष भर के दौरान कई चरणों में आयोजित होने वाली परीक्षाएं तनाव को घटा सकती हैं। पेपर लीक को रोकने के लिए भी कड़े उपाय आवश्यक हैं, लेकिन जब कोई एक विशेष परीक्षा भाग्य-विधाता नहीं रह पाएगी तो उससे जुड़ी समस्याओं की गंभीरता भी स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी।


रोजगार केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वाभिमान, जीवन उद्देश्य और निजी विकास का आधार भी है। इसके बावजूद, कामकाजी आबादी की तुलना में नौकरियों का विस्तार पर्याप्त गति से नहीं हो पाया है। भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ निरंतर उद्योगीकरण और विनिर्माण-आधारित विकास के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में सक्षम हो।
कोई विचारधारा भले कितनी ही भली क्यों न हो, उसे आम जनजीवन को ठप करने की गुंजाइश नहीं मिलनी चाहिए।

विरोध-प्रतिरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन कानून-व्यवस्था और शांतिपूर्ण नागरिक जीवन का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक समाजों को असहमति व्यक्त करने के ऐसे तौर-तरीके अपनाने चाहिए जो कोई अवरोध पैदा न करें, जबकि शासन-प्रशासन को भी संयम और अहिंसक उपायों के साथ ही स्थिति को संभालना चाहिए। जहां हिंसा नितांत निंदनीय है, वहीं राज्य द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग से विरोध-प्रदर्शन का दमन भी उतना ही अनुचित है। आमरण अनशन, सड़क जाम और भड़काऊ बयानबाजी भी टकराव को बढ़ाते हुए तार्किक लोकतांत्रिक संवाद को पटरी से उतारती है।

जेन-जी की अभिव्यक्तियां भी इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू रहीं। हास्य-व्यंग्य की सार्वजनिक जीवन में सदैव अपनी भूमिका रही है और नई पीढ़ी ने इसे आत्मसात करते हुए अपने गंभीर राजनीतिक संदेशों को व्यंग्य की चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत भी किया। यह संवाद में शिष्टाचार को लेकर पारंपरिक परिपाटी में परिवर्तन का प्रतीक है। इस संदर्भ में जेन एक्स का परंपरावादी दृष्टिकोण बदलाव से जुड़े इस बेपरवाह रवैये को लेकर कुछ असहज हो सकता है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता की सराहना भी करनी होगी। कहा जाता है कि ‘संशयी बनो, नकारात्मक नहीं।’ व्यंग्य और हास-परिहास के साथ भाषा की मर्यादा को लांघे बिना किया गया संवाद संभवतः कहीं अधिक प्रभावी संदेश दे सकता है। सभ्य समाज में अभद्रता एवं अशिष्टता के लिए कोई स्थान नहीं। जेन-जी को अभिव्यक्ति और अनादर में अंतर समझना होगा।

प्रशासन ने आखिरकार प्रतिक्रिया दी, भले ही दबाव में आकर। फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना, कड़े कानूनों के वादे और शिक्षा मंत्री का बहुचर्चित इस्तीफा हुआ। ऐसे इस्तीफे के प्रतीकात्मक महत्व को समझा जा सकता है, लेकिन केवल प्रतीकात्मकता पर्याप्त नहीं है। ध्यान संस्थागत सुधार की ओर स्थानांतरित होना चाहिए।

इस आंदोलन से न केवल जेन-जी, बल्कि सभी पीढ़ियों के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवतरित होता है। क्या किसी पक्ष के लिए यह जीत के जश्न का अवसर है या सभी के लिए गंभीर आत्मचिंतन का? इसमें यह विस्मृत न किया जाए कि शांतिपूर्ण असहमति तभी तक स्वीकार्य हो सकती है, जब वह कानून के शासन, संस्थानों के संचालन और दैनिक जीवन की मुश्किलें न बढ़ाए। लोकतंत्र के लिए असहमति अनिवार्य है, अराजकता नहीं।

(लेखक दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक हैं)