विचार: रोजगार बाजार के अनुरूप ढले शिक्षा
अमेरिका, चीन, जापान सहित यूरोप के विश्वविद्यालय इस बदलाव को इतनी गंभीरता से ले रहे हैं कि उन्होंने एआइ के कारण अपने पारंपरिक कार्यक्रमों की घटती मांग को देखते हुए न सिर्फ उनकी फीस कम कर दी है, बल्कि बदलते रोजगार परिदृश्य के अनुरूप अपने विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन भी किया है।
HighLights
केवल 56% स्नातक ही रोजगार योग्य, कौशल अंतर बढ़ा।
एआई और मशीन लर्निंग में रोजगार के अवसर 46% बढ़े।
पारंपरिक पाठ्यक्रम बदलें, उद्यमिता और कौशल पर जोर दें।
प्रो. रसाल सिंह। विकसित भारत के लक्ष्य की सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत सीढ़ी शिक्षा है, लेकिन हाल के आंकड़े इस सीढ़ी की कमजोरी दर्शाते हैं। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार देश में केवल 56 प्रतिशत स्नातक ही आज किसी छोटे-मोटे रोजगार के योग्य माने जा सकते हैं। औसतन हर दो में से एक युवा डिग्री लेकर भी समकालीन रोजगार बाजार की जरूरतों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। दूसरी ओर इंडिया ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स के अनुसार एआइ और मशीन लर्निंग से जुड़ी भूमिकाओं में रोजगार के अवसर पिछले एक साल में 46 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि एचआर, डिजिटल मार्केटिंग और सामान्य प्रशासन जैसी पारंपरिक नौकरियों की मांग लगातार घट रही है।
अमेरिका, चीन, जापान सहित यूरोप के विश्वविद्यालय इस बदलाव को इतनी गंभीरता से ले रहे हैं कि उन्होंने एआइ के कारण अपने पारंपरिक कार्यक्रमों की घटती मांग को देखते हुए न सिर्फ उनकी फीस कम कर दी है, बल्कि बदलते रोजगार परिदृश्य के अनुरूप अपने विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन भी किया है। चीन ने पिछले महीने अपने 12 हजार से अधिक (लगभग एक तिहाई) स्नातक डिग्री कार्यक्रमों को अप्रासंगिक मानते हुए बंद कर दिया। ये वे पाठ्यक्रम थे, जो समकालीन और भविष्य के जाब मार्केट से मेल नहीं खाते। उनकी जगह चीन ने एआइ, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, क्वांटम एप्लीकेशन और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में नए कार्यक्रम शुरू किए हैं। इसकी मूल वजह यह थी कि वहां एक ओर डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या क्रमशः बढ़ती जा रही थी और प्रतिष्ठानों को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कुशल कर्मी नहीं मिल पा रहे थे।
भारत में भी पुराने और परंपरागत कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों को तत्काल समाप्त या संशोधित करने की आवश्यकता है। उभरते हुए रोजगार परिदृश्य और कौशल आवश्यकताओं के अनुरूप अपने शिक्षा-तंत्र को बदलकर ही हम उसे प्रासंगिक बनाए रख सकते हैं। आज फैक्ट्री से लेकर बाजार तक और डिजाइनिंग स्टूडियो से लेकर फाइनेंशियल एनालिसिस तक एआइ साथ-साथ काम कर रही है। इस नए युग को 'स्किल आग्मेंटेशन' की जरूरत है, जहां तकनीक इंसान की जगह नहीं लेती, बल्कि उसकी क्षमता बढ़ाती है।
इसी कारण पिछले केंद्रीय बजट में ‘शिक्षा के लिए एआइ’ उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने हेतु 500 करोड़ रुपये का प्रविधान किया गया है। इसे इंडिया एआइ मिशन के साथ जोड़ा गया है। हमें इस मद में भारी मात्रा में निवेश की आवश्यकता है। साथ ही एआइ को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को पुनर्व्याख्यायित और क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। शिक्षा और शोध में अधिकतम निवेश करने वाले देश ही आर्थिक महाशक्ति बनते हैं।
पाठ्यक्रमों को फिर से डिजाइन करने के क्रम में हमें मानविकी को खत्म नहीं करना है, बल्कि उसे समकालीन आवश्यकताओं के अनुसार बदलना है। इतिहास को डाटा विजुअलाइजेशन के साथ, साहित्य को कंटेंट स्ट्रैटेजी और डिजिटल नैरेटिव के साथ दर्शन को एआइ एथिक्स के साथ और भाषाविज्ञान को कंप्यूटेशनल सिमेंटिक्स के साथ जोड़ना होगा। इसे ही डिजिटल ह्युमैनिटीज और कल्चरल एनालिटिक्स कहा जाता है। इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम को भी लीगेसी तकनीकों से निकालकर सिस्टम थिंकिंग और एनर्जी ट्रांजिशन के इर्द-गिर्द बनाना होगा। हमें लचीलेपन और बहु-विषयकता को बढ़ावा देना चाहिए। एक छात्र बीकाम के साथ डाटा एनालिटिक्स पढ़ सके, बीए के साथ कोडिंग सीख सके, विज्ञान के साथ उद्यमिता का प्रोजेक्ट कर सके।
एनईपी का मेजर-माइनर सिस्टम इसी सोच से आया है। दीवारें तोड़कर वातायन बनाने होंगे। कला, वाणिज्य, विज्ञान के पुराने खांचे अब काम नहीं आएंगे। समाज, उद्योग और बाजार के साथ सहवर्ती संबंध और निरंतर संवाद होना चाहिए। पाठ्यक्रम बंद कमरे में नहीं बनने चाहिए। टीसीएस, इन्फोसिस, एमएसएमई, स्टार्टअप इकोसिस्टम और क्षेत्रीय उद्योगों को बोर्ड आफ स्टडीज में जगह मिलनी चाहिए। इंटर्नशिप दो माह की औपचारिकता न होकर छह माह की परियोजना होनी चाहिए।
छात्र का मूल्यांकन मार्कशीट के आधार पर नहीं होना चाहिए। वह संस्थान से अंकपत्र लेकर नहीं, निपुणता लेकर निकले। इसके लिए शिक्षकों की निरंतर अपस्किलिंग होनी चाहिए और छात्रों के प्लेसमेंट के आधार पर उनका मूल्यांकन होना चाहिए। अधुनातन सूचना-तकनीक का बुनियादी ढांचा बनाना भी आवश्यक है। वर्चुअल लैब, एआइ ट्यूटर, सिमुलेशन आधारित प्रयोगशालाएं अब विलासिता नहीं, आवश्यकता हैं। इन्हें टियर-टू और टियर-थ्री शहरों तक पहुंचाना होगा, ताकि डिजिटल डिवाइड शिक्षा का डिवाइड न बन जाए। उद्यमिता के अनुकूल परिवेश भी विकसित करना होगा। इसे शिक्षा-तंत्र के डीएनए में डालना होगा।
प्रत्येक डिग्री में स्टार्टअप दृष्टि, हरेक कैंपस में इनक्यूबेशन लैब और फंडिंग सुनिश्चित करनी होगी। हमें नौकरी मांगने वाली पीढ़ी नहीं, नौकरी देने वाली पीढ़ी तैयार करनी होगी। यदि हम वाकई विकसित भारत चाहते हैं तो हमें विकसित विश्वविद्यालय तैयार करने होंगे। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन राजनीति और लालफीताशाही से बचकर इस सपने को साकार कर सकते हैं।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैं)










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