विचार: समाज में समानता लाने की पहल
लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह विविधताओं का सम्मान करते हुए प्रत्येक नागरिक के लिए समान न्याय सुनिश्चित कर सके।
HighLights
मध्य प्रदेश ने समान नागरिक संहिता विधेयक को मंजूरी दी।
यह विधेयक महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सशक्त करेगा।
समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता और न्याय का आधार।
डॉ. ऋतु सारस्वत। हाल में मध्य प्रदेश विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को मंजूरी दी। इसके साथ ही मध्य प्रदेश भी उत्तराखंड, गुजरात और असम की उस श्रेणी में शामिल हो गया, जिन्होंने समान नागरिक संहिता की दिशा में ठोस पहल की है। इन पहलों ने समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रीय विमर्श को नई गति प्रदान की है। इसी क्रम में बंगाल ने भी समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करने के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित कर इस विषय पर अपनी पहल का संकेत दिया है। दूसरी ओर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘आर एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य’ मामले में स्पष्ट किया है कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पाक्सो अधिनियम) के समक्ष कोई भी व्यक्तिगत विधि अपवाद का आधार नहीं बन सकती। ये घटनाक्रम इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि समान नागरिक संहिता का प्रश्न अब केवल वैचारिक बहस का विषय नहीं रहा, बल्कि विधायी, राजनीतिक और न्यायिक, तीनों स्तरों पर गंभीर विचार का विषय बन चुका है। इसने व्यक्तिगत विधियों, संवैधानिक समानता तथा नागरिक अधिकारों से जुड़े इस प्रश्न को पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि 1995 में सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, 'भारत एक पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और धार्मिक स्वतंत्रता उसकी मूल सांस्कृतिक विशेषता है। किंतु ऐसी धार्मिक प्रथाएं, जो मानवाधिकारों तथा मानवीय गरिमा का उल्लंघन करती हैं, स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दमन का स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं। इसलिए उत्पीड़ित वर्गों की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने के लिए समान नागरिक संहिता आवश्यक है।' सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के लगभग तीन दशक बाद भी समान नागरिक संहिता पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं हो सकी है। समान नागरिक संहिता पर बहस नई नहीं है। संविधान सभा की बहस के दौरान अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने ध्यान आकर्षित किया कि ब्रिटिश राज में दंड विधि, संविदा विधि तथा संपत्ति के हस्तांतरण सहित अनेक नागरिक विधियां सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू थीं। उनके अनुसार यदि व्यापक नागरिक जीवन में विधिक एकरूपता स्वीकार की जा सकती है तो विवाह, उत्तराधिकार तथा पारिवारिक विधियों पर भी समान विधिक व्यवस्था पर विचार करना अस्वाभाविक नहीं माना जाना चाहिए।
संविधान सभा के विमर्श से लेकर आज तक समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि समान नागरिक संहिता सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती है। समान नागरिक संहिता पर होने वाले सार्वजनिक विमर्श में इसका मूल उद्देश्य अनेक बार पीछे छूट गया और चर्चा का केंद्र धार्मिक विवाद बन गया। परिणामस्वरूप महिलाओं के समान अधिकार, बाल अधिकार तथा समान नागरिक संरक्षण जैसे मूल प्रश्न अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहे। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अधूरा सत्य अनेक बार असत्य से भी अधिक घातक सिद्ध होता है, क्योंकि वह वास्तविक प्रश्नों को पीछे धकेल देता है। समान नागरिक संहिता के संदर्भ में भी यही स्थिति दिखाई देती है। विश्व का कोई भी पंथ अपने मूल दार्शनिक स्वरूप में महिलाओं की गरिमा का विरोध नहीं करता। हालांकि सामाजिक, सांस्कृतिक तथा विधिक व्याख्याओं के कारण अनेक बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिनका प्रभाव महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर पड़ता है। किंचित समस्या किसी पंथ की मूल शिक्षाओं से अधिक उन सामाजिक संरचनाओं और व्यवहारों में दिखाई देती है, जो परंपरा के नाम पर स्वीकार कर लिए जाते हैं। इसलिए समानता का प्रश्न किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि प्रत्येक लोकतांत्रिक समाज का प्रश्न है।
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि समान नागरिक व्यवस्था किसी धर्म विशेष के विरोध का पर्याय नहीं है। तुर्किये इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। लगभग 99 प्रतिशत मुस्लिम पंथावलंबी जनसंख्या वाले इस देश ने 17 फरवरी, 1926 को नागरिक संहिता स्वीकार की, जो चार अक्टूबर, 1926 से लागू हुई। इसका उद्देश्य किसी धार्मिक परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि आधुनिक राष्ट्र-निर्माण तथा समान नागरिक अधिकारों की स्थापना था। तुर्किये का अनुभव दर्शाता है कि लोकतांत्रिक समाजों में वैधानिक व्यवस्था का समय-समय पर परिष्कृत होना अपरिहार्य है।
जो व्यवस्थाएं समाज की बदलती आवश्यकताओं और समानता के आदर्शों के अनुरूप स्वयं को परिष्कृत नहीं कर पातीं, वे अपने सभी नागरिकों के साथ समान न्याय सुनिश्चित करने में कठिनाई का सामना करती हैं। भारत के संदर्भ में भी समान नागरिक संहिता पर चर्चा का केंद्र किसी पंथ-संप्रदाय की पहचान नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता, गरिमा और न्याय के मूल्यों का संरक्षण होना चाहिए। किसी भी विधिक सुधार का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के समान अधिकारों और गरिमा को किस सीमा तक सुदृढ़ करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह विविधताओं का सम्मान करते हुए प्रत्येक नागरिक के लिए समान न्याय सुनिश्चित कर सके।
(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)










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