आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा। यह त्यागपत्र यह भी ध्वनित कर रहा है कि सरकार काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के बैनर तले जंतर-मंतर पर प्रदर्शनरत छात्रों के दबाव में आ गई। लोकतंत्र में जनमत और विशेष रूप से छात्रों की इच्छा का पालन करने में कोई बुराई नहीं।

यह ध्यान रहे कि नीट पेपर लीक से लाखों छात्र प्रभावित हुए थे और उनके साथ अन्य अनेक लोग भी आक्रोशित थे। यह आक्रोश सहज था और सरकार को इसकी चिंता भी करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा करते हुए उसे यह संदेश भी नहीं देना चाहिए था कि जंतर-मंतर पर छात्रों के बीच घुसे अराजक तत्वों की हिंसा से बचने के लिए उसने शिक्षा मंत्री से त्यागपत्र लेना आवश्यक समझा।

ध्यान रहे धर्मेंद्र प्रधान ने यह कहा कि जंतर-मंतर पर पैदा हुई स्थिति का लाभ राष्ट्रविरोधी ताकतें न उठा लें, इसलिए वे इस्तीफा सौंप रहे हैं। वैसे यदि शिक्षा मंत्री को त्यागपत्र देना ही था तो नीट पेपर लीक के बाद ही क्यों नहीं दिया? इसकी तो मांग भी हुई थी।

इसी तरह सरकार ने सीजेपी के धरने और खासकर उसके संसद मार्च के दौरान हिंसा के बाद पेपर लीक के दोषियों को दंडित करने और परीक्षाओं में सेंध लगने की समस्या से निपटने के लिए जो अनेक कदम उठाए, वे पहले क्यों नहीं उठाए जा सके? यदि ऐसा किया गया होता तो शायद सीजेपी के धरना देने की नौबत ही नहीं आती।

यह स्वाभाविक है कि शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र का श्रेय लेने के लिए विपक्ष आगे आ गया है, लेकिन सच यह है कि इस इस्तीफे के साथ ही सीजेपी के सौजन्य से उसके हाथ आया मुद्दा केवल फिसल ही नहीं गया, बल्कि उसके सामने यह प्रश्न भी खड़ा हो गया है कि वह अपने शासित राज्यों और खासकर कर्नाटक, पंजाब आदि में पेपर लीक के मामलों में वहां के शिक्षा मंत्रियों से त्यागपत्र देने की मांग कब करेगा? क्या ऐसी कोई मांग सीजेपी भी करेगी?

ऐसे प्रश्नों के बीच यह समझा जाए कि त्यागपत्र राजनीतिक जवाबदेही की पूर्ति के साथ लोगों के गुस्से को शांत भले कर दें, लेकिन वे समस्या का समाधान नहीं करते। पेपर लीक समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता, जब तक शिक्षा और परीक्षा की पूरी व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किए जाते। ऐसे परिवर्तन अभी भी वांछित हैं। देखना है कि धर्मेंद्र प्रधान की जगह लेने वाले नए शिक्षा मंत्री शिक्षा और परीक्षा में अपेक्षित सुधार कर पाते हैं या नहीं?

धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही सरकार जिस तरह सीजेपी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ दर्ज एफआइआर वापस लेने पर सहमत हुई, उससे यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या उत्पात मचाने वाले अराजक तत्वों को भी बख्श दिया जाएगा?