संपादकीय: स्तरहीन चर्चा
लोकसभा ने पेपर लीक विरोधी संशोधन विधेयक पारित किया है, जिससे कानून और कठोर होगा। हालांकि, इसकी प्रभावशीलता और परीक्षाओं में सेंधमारी रोकने के लिए समाज के नैतिक पतन पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
HighLights
लोकसभा ने पेपर लीक विरोधी संशोधन विधेयक को मंजूरी दी।
कानून कठोर हुआ, पर लीक रोकने के उपाय भी आवश्यक।
परीक्षाओं में धांधली के लिए समाज का नैतिक पतन जिम्मेदार।
अंततः पेपर लीक विरोधी संशोधन विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। राज्यसभा से भी इस विधेयक के पारित होने के आसार हैं। इस विधेयक पर संसद की मुहर लगने के साथ ही पेपर लीक विरोधी कानून और अधिक कठोर हो जाएगा, लेकिन यह समय बताएगा कि वह परीक्षाओं में सेंध लगाने वाले तत्वों को हतोत्साहित करने में सफल होगा या नहीं?
निःसंदेह परीक्षाओं में सेंध लगने की समस्या को देखते हुए पेपर लीक विरोधी कानून को कठोर किया ही जाना चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि कड़े कानून एक सीमा तक ही प्रभावी होते हैं। आवश्यकता इसके उपाय करने की भी है कि पेपर लीक हो ही न सकें। आशा की जाती है कि नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में गठित समिति की ओर से सुझाए गए उपायों पर अमल करने में भी तत्परता दिखाई जाएगी। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि देश में पेपर लीक कराने वाला एक माफिया पैदा हो गया है।
यह माफिया इसलिए पैदा हुआ है, क्योंकि ऐसे छात्रों की संख्या बढ़ी है, जो छल-छद्म से परीक्षा पास करना चाहते हैं। इसी के साथ स्कूली परीक्षाओं में भी नकल की प्रवृत्ति बढ़ती चली जा रही है। जो छात्र स्कूली परीक्षाओं में नकल करके पास होते हैं, वही आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं को अनुचित तरीके से पास करने के जतन करते हैं। स्पष्ट है कि पेपर लीक की समस्या के पीछे कहीं न कहीं समाज का चारित्रिक पतन भी जिम्मेदार है। इसे इससे समझा जा सकता है कि छात्रों और अभिभावकों के साथ-साथ शिक्षक भी पेपर लीक में लिप्त पाए जा रहे हैं।
यह एक विडंबना रही कि लोकसभा में पेपर लीक विरोधी कानून को और कठोर किए जाने संबंधी विधेयक पर चर्चा के दौरान पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तो खूब हुए, लेकिन पेपर लीक की समस्या के लिए उत्तरदायी नैतिक पतन की ओर ध्यानाकर्षण नहीं किया गया। कहीं इसलिए तो नहीं कि हमारे कई जनप्रतिनिधि भी ऐसे हैं, जिन पर छल-कपट के सहारे पास होने के आरोप लगे हैं? यह निराशाजनक रहा कि लोकसभा में पेपर लीक विधेयक के गुण-दोष पर बहुत कम चर्चा हुई।
पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करता रहा और शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था की कमियों पर गंभीर चर्चा करने के लिए आगे नहीं आया। जो चर्चा हुई भी, वह स्तरहीन ही रही। ऐसा लगा कि पक्ष-विपक्ष की रुचि पेपर लीक के लिए एक-दूसरे को दोषी बताने की रही। कुछ नेता तो ऐसे रहे, जिन्होंने पेपर लीक विधेयक पर कुछ कहा ही नहीं।
इसके बजाय वे इधर-उधर की बातें करते रहे। इनमें नेता विपक्ष राहुल गांधी भी रहे। उनका भाषण एक तरह से इसका परिचायक रहा कि किसी गंभीर मुद्दे पर सार्थक चर्चा कैसे न की जाए। उनके भाषण उन्हें चर्चा में तो ला देते हैं, पर उनसे किसी को कुछ हासिल नहीं होता।










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