दीपक कोहली। मानसून आते ही देश के मानचित्र पर दो बेहद विरोधी और दर्दनाक तस्वीरें एक साथ उभरती हैं। उत्तर और पूर्वोत्तर के मैदानी एवं पहाड़ी इलाकों में उफनती नदियां, बहते मकान, जलमग्न खेत और राहत शिविरों में अपनी जिंदगी की भीख मांगते बेबस लोग दिखाई देते हैं, जबकि उसी समय देश के मध्य और दक्षिणी भागों के भूभाग सूखे की चपेट में होते हैं, जहां किसान दरकती मिट्टी को देखकर निराश होता है और महिलाएं कई किमी पैदल चलकर मटके में पानी ढोने को मजबूर होती हैं।

इस विडंबना का सबसे दुखद पहलू यह है कि भारत को प्रकृति से उपहारस्वरूप औसतन हर साल पर्याप्त मात्रा में वर्षा जल प्राप्त होता है, लेकिन हमारी नासमझी और आधुनिकता के अंधेपन ने इस वरदान को भी एक अभिशाप में बदल दिया है। आसमान से बरसने वाली यह बहुमूल्य संपदा जब धरती पर गिरती है, तो हम इसे सहेजने के बजाय जल्द से जल्द बहा देने की होड़ में लग जाते हैं।

कंक्रीट के बनते जंगलों ने जमीन की सोखने की प्राकृतिक क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। सड़कें, फुटपाथ और पक्के आंगन पानी को जमीन के भीतर जाने से रोकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बारिश का पानी नालों में मिलकर दूषित हो जाता है और नदियों के रास्ते बहकर अंततः समुद्र में विलीन हो जाता है।

एक अनुमान के अनुसार हम अपने वार्षिक वर्षा जल का मात्र दस से पंद्रह प्रतिशत हिस्सा ही संचित कर पाते हैं। यदि इस विशाल जलराशि का एक छोटा सा हिस्सा भी सही ढंग से रोक लिया जाए तो देश के किसी भी कोने को न तो बाढ़ का खौफ सताएगा और न ही सूखे की मार झेलनी पड़ेगी। जब धरातल पर बहने वाला वर्षा जल हमारी लापरवाही के कारण व्यर्थ चला जाता है, तो हमारी निर्भरता जमीन के नीचे छिपे जल भंडार पर बढ़ती चली जाती है।

आज भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन चुका है, जहां अमेरिका और चीन के सम्मिलित उपयोग से भी अधिक पानी जमीन के पेट से निकाला जा रहा है। कृषि में अत्यधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा देने, अनियंत्रित शहरीकरण और उद्योगों की असीमित मांग को पूरा करने के लिए बोरवेल और सबमर्सिबल पंपों के जरिये पाताल तक गहराई नापी जा रही है। इसके कई जिले 'डार्क जोन' में तब्दील हो चुके हैं, जहां जल स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि अब कुएं और सूख चुके हैं।

भूजल के अंधाधुंध दोहन से भी बड़ी और भयानक समस्या है इसका तेजी से होता प्रदूषण। जो पानी जमीन के नीचे बचा भी है, वह अब शुद्ध नहीं रह गया है। कृषि में अंधाधुंध इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक बारिश के पानी के साथ रिसकर भूजल में मिल रहे हैं। इसके साथ ही औद्योगिक कचरा और सीवेज का गंदा पानी भी जमीन के भीतर जहर घोल रहा है। कुछ क्षेत्रों में आर्सेनिक युक्त पानी पीने से लोग कैंसर और त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।

हमारे पूर्वज जानते थे कि बारिश के हर कतरे का क्या मूल्य है। यही कारण था कि देश के हर गांव और शहर में तालाब, पोखरे, बावड़ियां, जोहड़ और बंधे बनाए गए थे। ये पारंपरिक जल निकाय न केवल बारिश के पानी को सहेजते थे, बल्कि पूरे इलाके के भूजल स्तर को रीचार्ज करने का प्राकृतिक माध्यम भी हुआ करते थे, लेकिन आधुनिकता के नाम पर हमने इन तालाबों और कुओं को कचरा डालने का स्थान बना दिया या फिर उन पर अतिक्रमण करके बहुमंजिला इमारतें, माल और बस अड्डे खड़े कर दिए। जिन आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक नम भूमियों को प्रकृति ने पानी को सोखने और शुद्ध करने के लिए बनाया था, उन्हें कंक्रीट से पाट दिया गया। यही वजह है कि जब थोड़ी सी भी तेज बारिश होती है, तो हमारे आधुनिक शहर जलभराव की चपेट में आ जाते हैं और नदियां तबाही मचाने लगती हैं।

यद्यपि वर्षा जल संचयन को नए भवनों के लिए अनिवार्य तो बना दिया गया है, लेकिन इसका पालन केवल कागजों पर एनओसी प्राप्त करने तक ही सीमित रहता है। जब तक जल संरक्षण को जनांदोलन का रूप नहीं दिया जाएगा, तब तक कोई भी नियम या कानून इस महासंकट को टाल नहीं सकता। इस विकराल समस्या का अंतिम और सबसे प्रभावी हल वैज्ञानिक जल-प्रबंधन और वर्षा जल संचयन में ही निहित है। हम छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइपों के माध्यम से रीचार्ज वेल या भूमिगत टैंकों तक पहुंचाना अनिवार्य करें, जिससे गिरता भूजल स्तर पुनः ऊपर उठ सके।

इसके साथ ही 'कैच द रेन' जैसे सिद्धांतों को अपनाकर चेक डैम, खेत-तालाब और छोटे-छोटे बंधों का निर्माण बड़े पैमाने पर करना होगा। औद्योगिक और सीवेज के पानी का आधुनिक तकनीकों से शत-प्रतिशत शोधन कर दोबारा उपयोग के योग्य बनाना होगा, ताकि स्वच्छ जल स्रोतों पर दबाव घटे और भूजल में जहरीले तत्वों का रिसाव रोका जा सके।

हमें वर्षा जल संचयन को अपनी जीवनशैली और नगर नियोजन का अंग बनाना होगा। हर घर, हर इमारत और हर सार्वजनिक परिसर में वर्षा जल संचयन प्रणालियों को सक्रिय और क्रियाशील करना होगा। जल केवल एक भौतिक संसाधन या रासायनिक यौगिक नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता, वन्य जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र का मूल आधार है।

(लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)