जागरण संपादकीय: सड़कों की डिजाइनिंग
पिछले कुछ समय से यह देखने को मिल रहा है कि विभिन्न मंत्रालय और सरकारी विभाग विशेषज्ञ सलाहकारों की सेवाएं ले रहे हैं। कई बार तो ये सलाहकार ही संबंधित विभाग को निर्देशित और नियंत्रित करने लगते हैं।
HighLights
सड़कों की खराब डिजाइनिंग 60% से अधिक हादसों का कारण।
भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी रोड सेफ्टी ऑडिटर्स को प्रशिक्षित करेगी।
नई व्यवस्था की सफलता और सलाहकारों की भूमिका पर संदेह।
इस निर्णय से बहुत संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि सड़क डिजाइनिंग की खामियों का आडिट करने वाली संस्थाओं से उनकी जिम्मेदारी छिनेगी और अब भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी रोड सेफ्टी आडिटर्स को ट्रेनिंग देगी। ऐसे किसी निर्णय पर तो पहले ही पहुंच जाना चाहिए था, क्योंकि न तो सड़कों की खराब डिजाइनिंग का सिलसिला थम रहा है और न ही इस कारण होने वाले हादसे। सड़कों की खराब डिजाइनिंग को रोकने की व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर की जानी चाहिए थी, क्योंकि एक लंबे अर्से से यही सुनने को मिल रहा है कि बढ़ती मार्ग दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण सड़कों का खराब निर्माण और उनका डिजाइन सही न होना है।
यह सामान्य बात नहीं कि सड़कों की खराब डिजाइनिंग के कारण होने वाली दुर्घटनाओं का प्रतिशत 60 से अधिक है। क्या यह एक त्रासदी नहीं कि भारतीय राजमार्ग प्राधिकरण अभी तक ऐसे उपाय नहीं कर सका कि सड़कों की डिजाइन में कहीं कोई खामी न रहे? कोशिश तो इसकी होनी चाहिए कि किसी भी सड़क के निर्माण में डिजाइनिंग की कमी देखने को न मिले। यदि यह सुनिश्चित किया जा सकता तो फिर सड़कों की डिजाइन की पड़ताल करने की नौबत ही नहीं आती और यदि आती भी तो बहुत कम।
लगता है अपने देश में किसी को इसकी परवाह ही नहीं कि सड़क निर्माण के मानक विश्वस्तरीय हों। यह कहना कठिन है कि सड़कों की सही डिजाइनिंग करने वाले योग्य लोगों की कमी है। आशंका यही है कि योग्य लोगों की पहचान और उन्हें प्रोत्साहित करने की परिपाटी विकसित नहीं हो सकी है। भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी रोड सेफ्टी आडिटर्स को ट्रेनिंग देने का कदम इसलिए उठाने जा रही है, क्योंकि आइआइटी दिल्ली, रुड़की के साथ केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान यानी सीआरआरआइ की ओर से सेफ्टी आडिटर को दिए जाने वाले प्रशिक्षण को अपर्याप्त पाया गया।
देखना है कि नई व्यवस्था अपेक्षित परिणाम दे पाएगी या नहीं, क्योंकि इसे लेकर सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता कि जो काम आइआइटी दिल्ली, रुड़की के साथ सीआरआइआइ नहीं कर सकी, वह भारतीय राजमार्ग अभियंता अकादमी कर लेगी। बहुत संभव है कि वह बाहरी विशेषज्ञों और सलाहकारों की सहायता ले। इससे एक नई व्यवस्था तो आकार ले लेगी, लेकिन यह कहना कठिन है कि इससे समस्या का निदान भी हो जाएगा।
पिछले कुछ समय से यह देखने को मिल रहा है कि विभिन्न मंत्रालय और सरकारी विभाग विशेषज्ञ सलाहकारों की सेवाएं ले रहे हैं। कई बार तो ये सलाहकार ही संबंधित विभाग को निर्देशित और नियंत्रित करने लगते हैं। यदि सब कुछ सलाहकारों के हिसाब से और उनके ही जरिये होने वाला है तो फिर सरकारी अमला किसलिए है? आखिर वह अपने कार्यों के लिए जवाबदेह क्यों नहीं ठहराया जाता? यह वह यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर सामने आना ही चाहिए।










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