विपक्षी दलों ने संसद के मानसून सत्र के पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का जिस तरह थोड़ी देर के लिए ही सही बहिष्कार किया, उससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि यह सत्र हंगामे से भरा रहने वाला है।

विपक्षी दलों ने सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार इसलिए किया, क्योंकि इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए गुट को भी बुलाया गया था। इससे केवल यही नहीं स्पष्ट होता कि विपक्ष इस बैठक के बहिष्कार का बहाना तलाश कर रहा था, बल्कि यह भी पता चलता है कि वह अपने बिखराव का दोष भी सत्ता पक्ष पर मढ़ना चाहता है।

संसद के पिछले सत्र के मुकाबले इस समय तस्वीर बहुत बदली हुई है। पिछले सत्र में विपक्ष इसलिए उत्साहित था कि उसने महिला आरक्षण से जुड़े परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को दो तिहाई बहुमत से पारित नहीं होने दिया था।

इस विधेयक के पारित न होने से विपक्ष की एकजुटता को बल मिला था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है और इसके लिए विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का दावा करने वाली कांग्रेस भी जिम्मेदार है। उसने तमिलनाडु में जिस तरह सत्ता के लोभ में द्रमुक का साथ छोड़ा, उसका परिणाम यह हुआ कि उसने कांग्रेस से दूरी बना ली और अब वह संसद में उसके साथ बैठने के लिए भी तैयार नहीं है।

यदि यह मान भी लिया जाए कि पश्चिम बंगाल में पराजय के बाद तृणमूल कांग्रेस में बिखराव भाजपा के समर्थन और प्रोत्साहन से हुआ तो इसका जवाब तो कांग्रेस को ही देना होगा कि तमिलनाडु में उसका सबसे करीबी सहयोगी दल उससे क्यों छिटक गया?

पिछले सत्र के मुकाबले इस सत्र के आने तक विपक्ष की कमजोरी का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना में भी विभाजन हो गया और अब इसके कयास लगाए जा रहे हैं कि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए तैयार है।

कुल मिलाकर इस समय विपक्ष न केवल बिखरा हुआ दिख रहा है, बल्कि हताश एवं निराश भी। इस स्थिति में संसद के इस सत्र में आए दिन हंगामा देखने को मिल सकता है। निश्चित रूप से विपक्ष के उन मुद्दों पर संसद में चर्चा होनी ही चाहिए, जिनका उल्लेख उसकी ओर से सर्वदलीय बैठक में किया गया।

बात चाहे राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की हो अथवा नीट पेपर लीक की-इन सब मुद्दों पर संसद में चर्चा होनी ही चाहिए, लेकिन यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि विपक्ष अपनी ओर से उठाए गए मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही को लेकर आग्रही रहेगा अथवा हंगामा करने के लिए? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अब विपक्ष संसद में जनता से जुड़े मुद्दों पर कोई सार्थक चर्चा के स्थान पर हंगामा करना ही सही समझता है।