प्रधानमंत्री ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में परीक्षा सुधारों के लिए एक कार्य बल गठित करने का जो फैसला लिया, वह एक ठोस कदम जान पड़ता है, क्योंकि बात केवल मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट की ही नहीं थी।

पिछले कुछ वर्षों में न जाने कितनी प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हुए हैं। इन स्थितियों में सभी परीक्षाओं में सुधार के कोई ठोस उपाय किए जाने आवश्यक हो गए थे। यह आशा की जाती है कि नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में गठित कार्य बल परीक्षाओं में सुधार के प्रभावी उपाय कर सकने में सक्षम रहेगा।

यह अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि वे तकनीक के दिग्गज हैं और उन्हें आधार एवं यूपीआइ का जनक माना जाता है। नीलेकणी के नेतृत्व में गठित कार्य बल परीक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी, सुरक्षित एवं तकनीक आधारित बनाने के लिए सुझाव देगा। इन सुझावों पर समय रहते सही ढंग से अमल करना होगा, क्योंकि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नीट में सुधारों के लिए राधाकृष्णन समिति ने जो सुझाव दिए थे, उन सभी का सही तरह से पालन नहीं किया जा सका और संभवत: उसी के नतीजे में इस परीक्षा के प्रश्न पत्र बार-बार लीक हुए।

अच्छा होता कि सरकार ने अब जाकर जो निर्णय लिया, वह और पहले ही ले लेती। उसने पिछले कुछ दिनों में परीक्षा में सुधार के लिए जो अनेक फैसले लिए, उनसे यह प्रतीति हो रही है कि वे कॉकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन से उपजी परिस्थितियों के बाद लिए गए। जो भी हो, कम से कम अब ऐसे प्रबंध किए जाने चाहिए जिससे किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक न हों, क्योंकि जब ऐसा होता है तो परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर तो प्रश्न चिह्न लगता ही है, छात्रों के समय एवं संसाधन की बर्बादी भी होती है। इससे भी बड़ी बात यह कि पूरी व्यवस्था पर से उनका भरोसा डिगता है।

परीक्षाओं में सेंध लगाने वाले तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के साथ यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य था कि परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार किए जाएं। सुधार का यह दायरा केवल केंद्र और राज्यों की संस्थाओं की ओर से आयोजित की जाने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं तक ही नहीं सीमित रहना चाहिए। इसका दायरा स्कूली परीक्षाओं तक भी जाना चाहिए, क्योंकि इन परीक्षाओं में नकल एक सामाजिक बुराई बन गई है।

परीक्षाओं में सेंध लगाने वाला एक माफिया पैदा हो गया है। इसमें कोचिंग चलाने वाले भी शामिल हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि परीक्षा के साथ शिक्षा में भी सुधार के ठोस प्रयत्न किए जाएं। यदि आवश्यक समझा जाए तो नई शिक्षा नीति में भी फेरबदल किया जाना चाहिए, क्योंकि एआइ के बढ़ते हस्तक्षेप के साथ ही परिस्थितियां बहुत बदल गई हैं।