मानसून सत्र के तीसरे दिन भी संसद नहीं चल पाई, क्योंकि कांग्रेस इस पर अड़ गई कि पहले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान त्यागपत्र दें, क्योंकि उनके इस्तीफे के बिना संसद में नीट पेपर लीक और इससे जुड़े अन्य विषयों पर सही तरह चर्चा नहीं हो पाएगी। यह विचित्र तर्क है और इसका उद्देश्य जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना है, जिससे संसद में चर्चा ही न हो सके। उसके इस रवैये से उसकी अंगभीरता का ही पता चलता है।

कांग्रेस का व्यवहार यह भी बता रहा है कि उसका उद्देश्य नीट मसले पर संसद में कोई सार्थक चर्चा करना नहीं, बल्कि हंगामा खड़ा करना है। यही भाव भंगिमा कुछ अन्य विपक्षी दलों की भी दिख रही है। यह भी दिख रहा है कि उनमें इसके लिए होड़ मची है कि कौन छात्र हित की अधिक चिंता करता हुआ दिखे।

इस सबकी नौबत इसलिए भी आई, क्योंकि सरकार ने नीट मसले पर जंतर-मंतर पर धरना दे रहे समूह सीजेपी से समय रहते संपर्क-संवाद करने की आवश्यकता नहीं समझी। उसने यह काम उस दिन किया, जिस दिन संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा था और साथ ही सीजेपी का संसद मार्च भी। यदि सरकार समय पर सक्रिय होती तो संभवतः जो कुछ हुआ और हो रहा है, उससे बचा जा सकता था।

नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही बनती है, लेकिन उनका इस्तीफा समस्या का समाधान नहीं। ध्यान रहे परीक्षा में सेंध नीट का आयोजन करने वाली एजेंसी एनटीए की निगरानी में कमी के कारण लगी। इस तथ्य की भी अनदेखी न की जाए कि उन्हीं परीक्षकों ने पेपर लीक कराए, जिन पर इस परीक्षा की शुचिता बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। स्पष्ट है कि यह नैतिक पतन और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा का भी मामला है।

इसके खिलाफ भी आवाज उठनी चाहिए। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र विपक्ष को संतुष्ट भले कर दे, लेकिन इससे परीक्षा व्यवस्था में सुधार सुनिश्चित नहीं होगा। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने वाले तंत्र का सही तरीके से निर्माण करना है। एनटीए ने ऐसे तंत्र के निर्माण के लिए अभी जो कदम उठाए हैं, वे पर्याप्त नहीं।

विपक्ष को परीक्षाओं की शुचिता सुनिश्चित करने वाले ठोस तंत्र के निर्माण में सरकार को जवाबदेह बनाने के साथ उसका सहयोग भी करना चाहिए। यह तब संभव होगा, जब इस पर संसद में गंभीरता से चर्चा होगी।

संसद के भीतर-बाहर जैसी परिस्थितियां बन गई हैं, उन्हें देखते हुए शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की संभावना इसलिए नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर हर छोटे-बड़े मसले पर संबंधित मंत्री के त्यागपत्र की मांग का सिलसिला कायम हो जाएगा। यह सिलसिला सरकार को कमजोर करने के साथ ही उन तत्वों को बल भी देगा, जो अराजकता पर यकीन करते हैं।