प्रणय कुमार। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार से प्रश्न पूछने और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देना है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक, जालसाजी या अन्य अनियमितताएं सामने आती हैं, तो विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों का न्याय की मांग करना पूर्णतः उचित है। ऐसे मामलों में सरकार, परीक्षा एजेंसी तथा जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड दिलाएं तथा परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाएं। प्रधानमंत्री का स्पष्ट संदेश है कि नीट हो या कोई अन्य प्रतियोगी परीक्षा, विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति या गिरोह को बख्शा नहीं जाएगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी आंदोलन का उद्देश्य समाधान और व्यवस्था-सुधार होना चाहिए। यदि वह अपने मूल विषय से भटककर राजनीतिक ध्रुवीकरण, वैचारिक संघर्ष या सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनने लगे, तो उसके उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आज जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन के संदर्भ में भी यही प्रश्न उठ रहे हैं। प्रारंभ में इसे परीक्षा सुधार और विद्यार्थियों के भविष्य की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया गया था, किंतु समय के साथ तमाम दलों, वामपंथी छात्र संगठनों और विभिन्न दबाव समूहों की सक्रियता ने इसकी मूल प्रकृति को लेकर संदेह उत्पन्न कर दिया। जिन संगठनों और चेहरों की उपस्थिति पहले भी अनेक आंदोलनों में रही है, वही-वही इस आंदोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाते दिखाई दे रहे हैं।

इससे यह धारणा बलवती हुई है कि आंदोलन का उद्देश्य शिक्षा सुधार अथवा कदाचारमुक्त परीक्षा कम, बल्कि सरकार को अस्थिर करना तथा अराजकता का व्याकरण रचकर देश-दुनिया का ध्यान आकृष्ट करना अधिक है। यदि परीक्षा सुधार के मंच से कश्मीर की आजादी की मांग, अनुच्छेद 370 की बहाली, उमर खालिद की रिहाई, हिंदुत्व विरोधी नारे, हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां, भारत को नेपाल और बांग्लादेश जैसा बनाने के नारे, भारतीय सेना के विरुद्ध आवाजें तथा प्रेमानंद महाराज और शंकराचार्य के विरुद्ध टिप्पणियां सुनाई देने लगें, तो लोगों के मन में आंदोलन की वास्तविकता और उद्देश्य को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसी प्रकार मंच से यदि "बस नाम रहेगा अल्ला का" जैसे तराने तथा अरुंधति राय, कुणाल कामरा जैसे व्यक्तियों के अनर्गल भाषण होंगे तो यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि क्या यह आंदोलन वास्तव में परीक्षा-सुधार तक सीमित है?

किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। जनता का विश्वास तभी तक बना रहता है, जब तक आंदोलन अपने घोषित उद्देश्य तक सीमित रहता है। यदि उसके मंच से हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सुरक्षा बलों पर हमले करने, संसद भवन को घेरने या राष्ट्रीय एकता को आहत करने वाले स्वर उभरने लगें, तो वह लोकतांत्रिक असहमति, विरोध की मर्यादा एवं साधन और साध्य की पवित्रता की परिधि से बाहर चला जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता का व्याकरण रचना अथवा संस्थाओं का अवमूल्यन करना कदापि नहीं होता। सोचने का विषय यह है कि यदि छात्रहित के नाम पर चल रहे आंदोलन को अराजक तत्वों का समर्थन मिलने लगे, तो उसके स्वरूप एवं उद्देश्य पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

यह भी विचारणीय है कि क्या यह विरोध केवल परीक्षा सुधार तक सीमित है या शिक्षा में हो रहे वैचारिक परिवर्तनों के प्रतिरोध का भी माध्यम बन चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में बदलाव, त्रिभाषा नीति और भारतीय ज्ञान-परंपरा जैसे विषय लंबे समय से वामपंथी असहमति के केंद्र रहे हैं। भले ही कारण भिन्न-भिन्न दर्शाए-जताए गए हों, पर मुरली मनोहर जोशी से लेकर भाजपा के लगभग सभी शिक्षा मंत्रियों को ऐसे ही विरोध का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह मान लेना कि केवल शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र से आंदोलन समाप्त हो जाएगा, एक सतही निष्कर्ष होगा। दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की समस्या किसी एक सरकार या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रही। राजस्थान में कांग्रेस शासन के दौरान रीट, एसआई और अन्य भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं। बंगाल में एसएससी भर्ती घोटाला, झारखंड में जेएसएससी, तेलंगाना में टीएसपीएससी तथा हिमाचल में कर्मचारी चयन आयोग की भर्ती परीक्षाओं पर भी गंभीर प्रश्न उठे। इससे स्पष्ट है कि परीक्षा प्रणाली का संकट राष्ट्रीय और संरचनात्मक है। इसलिए यदि राजनीतिक दल वास्तव में परीक्षा सुधार के पक्षधर हैं तो उन्हें अपने-अपने राज्यों में पारदर्शी और तकनीक-सक्षम परीक्षा प्रणाली का आदर्श माडल प्रस्तुत करना चाहिए। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इसकी सफलता या विफलता की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार की नहीं, बल्कि राज्य सरकारों की भी समान रूप से है।

अंततः देश के युवाओं और विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि परीक्षा और शिक्षा सुधार जैसे विषयों को यदि वैचारिक या राजनीतिक सत्ता-संघर्ष का औजार बना दिया गया, तो सबसे बड़ी क्षति उनके भविष्य की होगी। अन्ना हजारे के आंदोलन से लेकर उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम तक का अनुभव बताता है कि जब जनहित के आंदोलनों पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हावी हो जाती हैं, तो उनके मूल उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं। इस आंदोलन का उद्देश्य भी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार था, किंतु अब वह अपनी मूल मांगों से आगे बढ़कर दिशाहीन होता दिखाई देता है। जब सरकार परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शुचिता के लिए सुधारों का आश्वासन दे रही है, संवाद के लिए तत्पर है तथा नीट की पुनर्परीक्षा के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित कर चुकी है, तब आंदोलन को अराजकता की ओर ले जाना नितांत नितांत हठधर्मिता है।

(लेखक शिक्षाविद् हैं)