जागरण संपादकीय: सड़क की राजनीति
यह शुभ संकेत नहीं कि सड़क और संसद की राजनीति के बीच का अंतर खत्म होता जा रहा है। निःसंदेह नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री की जवाबदेही बनती है, लेकिन उनका त्यागपत्र इसकी गारंटी नहीं कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
HighLights
राहुल गांधी ने नीट पेपर लीक पर धरना दिया।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की।
संसद की बजाय सड़क पर राजनीति पर सवाल।
राहुल गांधी जिस तरह अचानक अपने साथियों के साथ प्रधानमंत्री आवास के पास धरने पर जा बैठे और नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग करने लगे, उससे यही साफ हुआ कि वे काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के साथ खड़े दिखना भी नहीं चाहते थे और इससे चिंतित भी हो गए कि यह कथित राजनीतिक दल अचानक इतनी चर्चा में आ गया। जब कई विपक्षी दलों के नेता सीजेपी के मंच पर जाना पंसद कर रहे थे, तब कांग्रेस ने अलग मोर्चा खोलना आवश्यक समझा तो इसीलिए ताकि सरकार का विरोध करने के मामले में अगुआई करते हुए दिख सके।
इस पर हैरानी नहीं कि कांग्रेस की यह कोशिश आम आदमी पार्टी को रास नहीं आई और उसने राहुल गांधी पर पीएम मोदी से मिले होने का आरोप मढ़ दिया। यह और कुछ नहीं सीजेपी के हिंसा भरे संसद मार्च के बाद नीट पेपर लीक कांड को लेकर सरकार के विरोध में आगे दिखने की होड़ है। यह होड़ तब दिखाई गई, जब संसद चल रही है।
शायद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की दिलचस्पी इसमें नहीं कि संसद चले और उन मुद्दों पर सदन में चर्चा हो, जिन पर बहस की मांग खुद उनकी ओर से की जा रही है। संभवतः इसी कारण राहुल गांधी ने नीट पेपर लीक मामले पर संसद में चर्चा कराने के सरकार के प्रस्ताव को ठुकराना बेहतर समझा। इसके बाद पुलिस के पास उन्हें जबरन हटाने के अलावा और कोई उपाय नहीं था।
यदि राहुल गांधी को नीट पेपर लीक प्रकरण में शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग को लेकर धरने पर ही बैठना था तो अब तक क्यों नहीं बैठे? क्या इसलिए कि सीजेपी इस मांग के साथ जंतर-मंतर पर धरना देकर चर्चा में आ गई? क्या अब कांग्रेस सीजेपी के स्तर की राजनीति करेगी? वह तो मुख्य विपक्षी दल है। आखिर उसने जनप्रतिनिधित्व विहीन सीजेपी के रास्ते पर चलना क्यों पसंद किया?
ये सवाल यही रेखांकित करते हैं कि किस तरह लंबे समय तक केंद्र की सत्ता चलाने का अनुभव रखने वाली कांग्रेस संसद के बजाय सड़क पर अपनी बात कहना पसंद कर रही है? लोकतंत्र में सड़क की भी राजनीति होती है, लेकिन संसद की कीमत पर नहीं। स्थापित राजनीतिक दलों के लिए तो किसी भी मसले पर चर्चा और बहस का सबसे उपयुक्त मंच संसद है, न कि सड़क।
यह शुभ संकेत नहीं कि सड़क और संसद की राजनीति के बीच का अंतर खत्म होता जा रहा है। निःसंदेह नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री की जवाबदेही बनती है, लेकिन उनका त्यागपत्र इसकी गारंटी नहीं कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। इसे सीजेपी और उसके समर्थकों को भी समझना होगा। यदि छात्र हित सचमुच उनकी प्राथमिकता में हैं तो उन्हें सरकार से संवाद को प्राथमिकता देनी होगी। विपक्ष को भी चाहिए कि इस मसले पर संसद में सरकार की जवाबदेही ले।










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