कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कोई नई-अनोखी बात नहीं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। इससे सभी परिचित हैं, लेकिन समस्या यह है कि कई बार शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बहाने अराजकता का सहारा लिया जाता है-कभी खुलकर और कभी दबे-छिपे ढंग से। यही सीजेपी के संसद मार्च के दौरान हुआ। सीजेपी के समर्थक जब तक जंतर-मंतर पर बैठे रहे, तब तक कहीं कुछ नहीं हुआ। बात तब बिगड़ी, जब वे बिना अनुमति संसद की ओर कूच करने पर अड़ गए और पुलिस की ओर से रोके जाने के बाद बैरिकेडिंग तोड़ने और लांघने लगे।

इतना ही नहीं, सीजेपी समर्थकों की भीड़ में शामिल अराजक तत्वों ने पुलिस से धक्का-मुक्की और मारपीट करने के साथ उस पर पथराव भी शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस के पास आंसू गैस के गोले छोड़ने एवं लाठीचार्ज करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि वह भारी भीड़ का अनुमान नहीं लगा सकी और संभवतः उससे निपटने के पर्याप्त प्रबंध भी नहीं कर सकी। इसके ही नतीजे में उसकी ओर से अत्यधिक बल प्रयोग हुआ।

यही बाद में एक मुद्दा बन गया तो इसलिए और भी, क्योंकि कई छात्र-छात्राएं भी उसकी सख्ती की चपेट में आए और रैपिड एक्शन फोर्स की ओर से पैलेट गन का भी इस्तेमाल हुआ। इसके बाद भी इस तथ्य की अनदेखी न की जाए कि संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी घायल हुए।

यह अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट ने जहां पुलिस की सख्ती पर सवाल उठाए, वहीं पुलिसकर्मियों पर हमले का भी संज्ञान लिया। चूंकि अपने समर्थकों की भीड़ में अराजक तत्वों के घुस आने की बात सीजेपी के पदाधिकारियों ने खुद भी मानी थी, इसलिए वे यह नहीं कह सकते कि उनका संसद मार्च पूरी तौर पर शांतिपूर्ण था। उनकी ओर से यह अल्टीमेटम देना विचित्र है कि यदि उनके समर्थकों पर एफआइआर दर्ज करने और उनकी गिरफ्तारी का सिलसिला नहीं थमा तो वे फिर से धरने पर बैठ जाएंगे। यदि वे यह चाहते हैं कि पुलिस हिंसा फैलाने वाले तत्वों को भी बख्श दे तो यह अराजकता के खुले समर्थन के अलावा और कुछ नहीं।

क्या सरकार ने उनसे यह वादा किया था कि वह अराजक तत्वों के खिलाफ भी कुछ नहीं होने देगी? उचित यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित करे कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के नाम पर अराजक तत्व बचने न पाएं। सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का प्रोटोकाल बनाने की जो आवश्यकता जताई, उसकी पूर्ति वह स्वयं ही करे तो बेहतर। उसे यह भी देखना होगा कि इस प्रोटोकाल का पालन भी हो, क्योंकि अब शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान अराजकता का भी परिचय दिया जाने लगा है।