संपादकीय: खतरे में ट्रंप की साख, युद्ध से निकलने का खोज रहे मौका
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ युद्ध से निकलने का मौका तलाश रहे हैं, लेकिन दोनों पक्षों की शर्तें न मानने के कारण संघर्ष जारी है। ईरान के हमलों से खाड़ी देश परेशान हैं।
HighLights
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के बिजली और ऊर्जा ठिकानों को तबाह करने की धमकी देने के बाद पहले जिस तरह पांच दिन तक इन ठिकानों पर हमले टालने की घोषणा की और अब कहा कि कुछ और दिन की मोहलत दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि वे समझौते के मूड में आ गए हैं।
हालांकि रह-रहकर वे ईरान को धमकाते भी हैं, पर उन्होंने जिस तरह होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने के लिए भी समयसीमा बढ़ा दी, उससे यही लगता है कि वे किसी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहे हैं। उनके ऐसे संकेतों के बाद भी यह कहना कठिन है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध थम जाएगा।
इसका कारण यह है कि ईरान बिना इस भरोसे अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं कि उस पर फिर हमला नहीं किया जाएगा। जिस तरह ईरान अमेरिका की युद्ध विराम संबंधी शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं हो सकता, वैसे ही अमेरिका और इजरायल के लिए भी उसकी शर्तें मानना संभव नहीं।
वास्तव में इसी कारण युद्ध थमता नहीं दिख रहा है। जहां इजरायल ईरान को निशाना बनाने में लगा हुआ है, वहीं ईरान उस पर हमले करने के साथ ही अपने पड़ोसी देशों पर मिसाइलें दाग रहा है। यह स्वाभाविक ही है कि इससे इन देशों का धैर्य जवाब दे रहा है। ये देश इसलिए अधिक परेशान हैं कि ईरान उनके नागरिक और ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बना रहा है।
यदि खाड़ी के देशों ने ईरान पर जवाबी हमले करने शुरू किए तो युद्ध एक नए मोड़ पर पहुंच जाएगा। निःसंदेह ऐसा न तो ट्रंप चाहेंगे और न ही विश्व के अन्य देश, क्योंकि ऊर्जा संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी चपेट में भारत समेत अन्य एशियाई देश ही नहीं, यूरोप और अमेरिका भी आ गए हैं।
इस ऊर्जा संकट के लिए प्रत्यक्ष रूप से तो ईरान जिम्मेदार है, जिसने होर्मुज जल मार्ग बाधित कर रखा है, पर परोक्ष जिम्मेदार अमेरिका ही है, जिसने बिना कुछ सोचे-समझे इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई से न केवल अमेरिका-इजरायल को तंग किया है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी। यदि ईरान और अधिक समय तक जवाबी कार्रवाई करने में समर्थ बना रहता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति को अपना रुख और नरम करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।
इस स्थिति में उनका प्रभाव कम ही होगा-न केवल अमेरिका में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी। ध्यान रहे कि विश्वव्यापी ऊर्जा संकट के लिए वही जिम्मेदार माने जा रहे हैं और घरेलू स्तर पर भी उनका विरोध बढ़ रहा है। ईरान युद्ध के पहले उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला पर हमला किया और अपनी मनमानी टैरिफ नीति से अपने मित्र देशों समेत दुनिया भर को तंग किया, उसके चलते उनकी विश्वसनीयता और साख पहले ही कम हो चुकी है।












