प्रकाश सिंह। मंदिर हमारी आस्था का प्रतीक है, परंतु मंदिरों की व्यवस्था के बारे में हमारी उदासीनता एक शर्म का विषय है। हम लोग मंदिर जाते हैं मन की शांति और भगवान के आशीर्वाद के लिए, परंतु होता क्या है? मंदिर जाते समय यही लगता है कि किसी तरह भगवान के दर्शन हो जाएं और धक्कामुक्की से हम सकुशल बाहर निकल आएं। मंदिरों में भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था लचर होती है, जब-तब दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

वैष्णो देवी में 2022 में 12 लोग मर गए, हाथरस सत्संग में 2024 में 121 लोग भीड़ में कुचले गए, तिरुपति में 2025 में छह लोगों की जान चली गई। ऐसे अंतहीन मामले हैं। इसके अलावा मंदिरों से समय-समय पर घपलों-घोटालों की खबरें भी आती रहती हैं।

तिरुपति में वर्षों तक मिलावटी घी के लड्डू बटते रहे, सबरीमाला में सोने की चोरी हो गई और उसके बदले तांबे पर सोने की चादर चढ़ाकर रख दिया गया। कुछ दिनों पहले ही राम मंदिर में दान दी हुई धनराशि और सोने-चांदी के आभूषणों के गायब होने का मामला सतह पर आया। एक तरफ तो हम कहते हैं कि मंदिरों पर नियंत्रण सरकार का नहीं, बल्कि हिंदुओं का होना चाहिए, जो कि होना भी चाहिए, लेकिन धर्म के ठेकेदारों की करतूतें भी सब दिखा रही हैं।

राम मंदिर में चोरी की भनक लगते ही उत्तर प्रदेश सरकार ने एक विशेष जांच दल यानी एसआइटी का गठन कर दिया। समझ नहीं आता कि एसआइटी की कमान किसी कमिश्नर को कैसे सौंप दी? भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत जांच केवल पुलिस अधिकारी कर सकता है, अन्य विभाग का बड़े से बड़ा अधिकारी भी नहीं।

उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए भी यह कहा जा सकता है कि प्रदेश सरकार ने एसआइटी का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट ने विवेचना के लिए दूसरी एसआइटी के गठन का आदेश दिया और स्पष्ट कर दिया कि टीम का नेतृत्व कोई आइपीएस अधिकारी करेगा। उचित यही होगा कि एसआइटी अपनी सहायता के लिए आडिट एंड अकाउंट्स सर्विस से भी कुछ अधिकारियों को अपनी टीम में शामिल करे।

पहली एसआइटी की प्रारंभिक जांच से दान की गिनती और प्रबंधन की प्रक्रिया में गंभीर प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी कमियां मिलीं। सीसीटीवी फुटेज में कुछ कर्मचारियों को नोटों की गड्डियां और नकदी अपने कपड़ों, जेबों या जूतों में छिपाते हुए देखा गया। स्पष्ट है कि सुरक्षा जांच नियमों का प्रभावी ढंग से लागू न होने से चोरी की घटनाएं हुईं।

रिपोर्ट में दान प्रबंधन प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने, योग्यकर्मियों की नियुक्ति तथा सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की सिफारिश की गई है। कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तारियां सही हैं, पर ये सब छुटभैये हैं। बड़ी मछलियां अभी भी आजाद हैं।

श्री रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देवगिरी ने कहा कि ट्रस्ट से संबंधित ब्यूरोक्रेट्स और स्टेट बैंक के अधिकारियों से भी आशा की जाती थी कि वे प्रशासनिक दृष्टि से हिसाब-किताब पर ध्यान रखेंगे और यदि कोई कमी हो तो उसके बारे में जानकारी देंगे। एसआइटी ने भी अपनी रिपोर्ट में केवल पर्यवेक्षण की कमियों की ओर संकेत किया है। इससे ज्यादा लिखा भी नहीं जा सकता था, क्योंकि पर्यवेक्षक ब्यूरोक्रेट्स उनसे सीनियर थे।

उल्लेखनीय है कि ट्रस्ट में प्रधानमंत्री के पूर्व प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा, संजय प्रसाद, प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) प्रशांत लोखंडे, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और अयोध्या के जिलाधिकारी शशांक त्रिपाठी भी सदस्य के रूप में थे। इन अधिकारियों में किसी को दान की गई धनराशि में हेराफेरी की भनक कैसे नहीं लगी?

भले इनकी जिम्मेदारी हिसाब रखने की न रही हो, परंतु जब इस तरह के गबन होते हैं तो उसकी चर्चा हवा में फैल जाती है और संबंधित अधिकारियों को मालूम हो जाता है। ऐसा तो नहीं कि इन लोगों को या इनमें से कुछ को जानकारी थी, परंतु उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा? यह पड़ताल भी जरूरी है कि क्या राज्य के खुफिया विभाग को इसकी कोई जानकारी थी? यदि थी तो क्या कार्रवाई हुई और यदि नहीं तो उनकी जवाबदेही भी बनती है।

खुफिया ब्यूरो की अयोध्या में भी इकाई तो अवश्य होगी। आश्चर्य की बात है कि इतने बड़े-बड़े अधिकारी राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े हैं, प्रदेश और केंद्र सरकार की प्रभावी इकाइयां अयोध्या में मौजूद हैं और राम मंदिर में हेराफेरी की जानकारी हमें विपक्षी नेता की पोस्ट से मिली।

प्रथमदृष्टया अगर यह कहा जाए कि प्रधानमंत्री को उनके पूर्व प्रधान सचिव और प्रदेश के मुख्यमंत्री को उनके अपर मुख्य सचिव (गृह) ने निराश किया तो यह गलत नहीं होगा। इस मामले की विवेचना का दायरा भी दान में मिली धनराशि एवं अन्य सामग्री तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मंदिर से संबंधित किसी अन्य क्षेत्र में सामने आने वाली अनियमितताओं या अवैधानिक कार्य को भी इसमें शामिल करना चाहिए, क्योंकि बाद में किसी और मामले का भंडाफोड़ होना मंदिर की प्रतिष्ठा के लिए अच्छा नहीं होगा। आशा की जाती है कि जिम्मेदार लोगों का पर्दाफाश होगा और उन्हें उचित दंड भी मिलेगा, लेकिन इस बीच केंद्र और प्रदेश सरकार, दोनों को ही कुछ आवश्यक कार्रवाई भी करनी होगी।

मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था के लिए तीन स्तर पर लोगों की तैनाती होनी चाहिए। सबसे पहले तो ट्रस्ट का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। अच्छा होगा सभी सदस्य बदल दिए जाएं। इसका आशय यह नहीं कि सबको दोषी समझा जा रहा है, परंतु ट्रस्ट ठीक से काम करे, यह सबकी सामूहिक जिम्मेदारी थी। नए सदस्यों में ऐसा कोई भी नहीं होना चाहिए, जिसके ऊपर कोई राजनीतिक ठप्पा लगा हो। हां, हिंदू और राम भक्त अवश्य होना चाहिए।

ट्रस्ट का मुख्य कार्य मंदिर में पूजा-पाठ, आरती एवं अन्य धार्मिक कार्यों को देखना होगा। दूसरे स्तर पर वे लोग हों जो मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था को संभालें। विशेष तौर से दान में प्राप्त धनराशि और अन्य सामान का लेखा-जोखा रखें। तीसरे स्तर पर पुलिस और केंद्रीय बलों के ऐसे अधिकारी हों, जिनकी जिम्मेदारी मंदिर परिसर की सुरक्षा और दर्शनार्थियों के आवागमन का प्रबंध एवं उनका नियंत्रण हो। राम मंदिर को व्यवस्थित ढंग से चलाना हम सभी भारतीयों का पुनीत कर्तव्य है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक है)