विचार: बिहार में सामाजिक बदलाव के संकेत
उम्मीद की जा सकती है कि भरत तिवारी की हत्या के बाद उभरा जनाक्रोश प्राचीन भारतीय सामाजिक सोच को उभारने का प्रस्थान बिंदु बनेगा, जिसमें समायोजन होगा और मेलजोल भी।
HighLights
भरत तिवारी की कथित हत्या पर जातिगत एकता दिखी।
दलित, पिछड़े समुदाय भी न्याय को सड़कों पर उतरे।
जांच आयोग गठित, आरोपित पुलिस अधिकारियों पर FIR दर्ज।
उमेश चतुर्वेदी। जाति और पंथ के बिना आज देश में राजनीति की कल्पना बेमानी है। बिहार में जातिवाद का असर कुछ ज्यादा ही दिखता है, लेकिन इसी बिहार में हाल में हुई एक घटना की प्रतिक्रिया में उभरा जनाक्रोश इसके ठीक उलट है। इसमें जाति और पंथ की सीमाएं टूट गई हैं। भोजपुर जिले में पुलिस के कथित एनकाउंटर में मारे गए युवक भरत तिवारी के लिए न्याय की खातिर उतरे लोगों के बीच कोई जातीय दीवार नजर नहीं आ रही। इससे इन्कार नहीं कि भारतीय समाज में ऊंच-नीच का भाव रहा है। फिर भी समाज में सद्भाव, सहयोग और मेलजोल की गहरी परंपरा है। सामाजिक मामलों में कई बार जाति की दीवारें टूटती भी नजर आती हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव और राजनीति का मसला सामने आता है, जातीय सोच पूरी ताकत से उभर आता है। बिहार इस मामले में कुछ ज्यादा ही बदनाम है। ऐसे माहौल में अगर अगड़े समुदाय के भरत तिवारी की पुलिस के हाथों हुई कथित हत्या के खिलाफ सड़कों पर दलित और पिछड़े समुदाय तक के लोग उतर आएं तो मानना पड़ेगा कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था अब भी देश की रगों में बह रही है। बस उसे जगाने की जरूरत है।
हालांकि भरत तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ को जातीय रंग देने की कोशिश भी हुई। हैरत की बात है कि इसके पीछे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी नजर आए। जातिवादी चश्मे से इस घटना को देखते हुए उन्होंने कह दिया कि भरत तिवारी चूंकि ब्राह्मण था, इसीलिए अगड़ा समाज आक्रोशित है। उसकी जगह कोई दलित और पिछड़ा होता तो इस मामले को इतना तूल नहीं दिया जाता। मांझी के इस बयान ने जातिवादी खोल से बाहर निकले जनाक्रोश की आग में घी का काम किया। विरोध में भरत के गांव बिलौटी ही नहीं, आस-पड़ोस के दलित और पिछड़े परिवार भी गुस्से से भर उठे। गंगा के कटान से प्रभावित ये लोग मांझी की लानत-मलानत में उतर आए।
उन्होंने उलटे मांझी से ही पूछ लिया कि हमारा नेता होने के बावजूद उन्होंने उनकी हालत जानने की कोशिश क्यों नहीं की। लोगों का कहना था कि जिसके खिलाफ वे बोल रहे हैं, साधनहीन होने के बजाय वही व्यक्ति उनके साथ खड़ा रहा। बिहार में 21 साल पहले इसी तरह जाति और पंथ का बंधन टूटा था। 2005 में पटना से पंद्रह वर्षीय किसलय का अपहरण कर लिया गया। उस अपहरण के खिलाफ तब बिहार का पूरा समाज मुखर होकर आज उठा रहा था। बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार में उतरे अटल बिहारी वाजपेयी का बयान तब जन-जन की जुबान पर चढ़ गया था। उन्होंने कहा था, मेरा किसलय लौटा दो। भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के भरत तिवारी की कथित मुठभेड़ में हत्या के बाद एक बार फिर बिहार का समाज ठीक उसी तरह जाति और समुदाय के खांचों को तोड़ सत्य और न्याय के लिए साथ खड़ा नजर आ रहा है।
भोजपुर जिले का जवानिया गांव गंगा के ठीक किनारे है। इस गांव को पिछले साल गंगा की लहरों ने तकरीबन लील लिया। कटान से प्रभावित लोगों को अपने घर-खेत गंवाने पड़े, तब से ज्यादातर लोगों की स्थिति बदहाल है। सरकार की ओर से प्रभावितों को घर के लिए जमीन और पैसे तो दिए गए, लेकिन जो जगह उन्हें मिली, वह गड्ढे वाली है। बाकी सहूलियतें भी न के बराबर मिली हैं। इनकी बस्ती में हाल के दिनों तक चापाकल तक नहीं थे, कुछ थे भी तो उनमें पानी नहीं आ रहा था। इन्हीं बदहाल लोगों की आवाज बनकर भरत तिवारी सक्रिय थे। बिलौटी और जवानिया के उजड़े लोगों का कहना है कि उन्हें भरत तिवारी की ही वजह से थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिली हैं। इनके लिए वे ही प्रशासन से लड़ते रहे। कटान पीड़ित जवानिया गांव वालों का दर्द है कि उन्हें पानी से निकालकर फिर से पानी में ही बसा दिया गया है। उन्हें डर है कि फिर बारिश और बाढ़ आई तो उन्हें उजड़ना पड़ सकता है। भरत तिवारी इन्हीं मुद्दों को उठा रहे थे। गांव वाले मानते हैं कि प्रशासन के प्रति भरत के मन में गुस्सा था।
गत दिनों भरत की शव यात्रा में उमड़ी भीड़ बिहार के नए समाज का आईना कही जा सकती है। हालांकि बिहार सरकार का रवैया पारंपरिक रहा। वह प्रशासन के ही बचाव में नजर आई, लेकिन जनाक्रोश देखते हुए उसे झुकना पड़ा। भरत की हत्या की जांच के लिए पटना हाई कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश विनोद कुमार सिन्हा की अगुआई में जांच आयोग गठित किया गया है। इस बीच आरोपित पुलिस वालों के खिलाफ भी एफआइआर दर्ज कर ली गई है, जिनमें डीएसपी और शाहपुर के थानेदार भी शामिल हैं। स्थानीय स्तर पर अगड़े के पक्ष में दलित और पिछड़ों के उतरने से जाति के आधार पर चाल चलने वाली राजनीति को परेशानी जरूर महसूस हो रही होगी, लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि समाज का सोया हुआ सकारात्मक आत्मा ऐसे ही जागता है और बदलाव की बुनियाद बनती है। बस उसके लिए एक चिंगारी की जरूरत होती है। उम्मीद की जा सकती है कि भरत तिवारी की हत्या के बाद उभरा जनाक्रोश प्राचीन भारतीय सामाजिक सोच को उभारने का प्रस्थान बिंदु बनेगा, जिसमें समायोजन होगा और मेलजोल भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)












