विचार: बरसात में बेहाल होते शहर
मानसून आने के बावजूद भारतीय शहर जलभराव और वर्षा जनित समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिससे जान-माल का नुकसान हो रहा है। अनियोजित शहरीकरण, खराब बुनियादी ढांचा और नगर निकायों की लापरवाही इन समस्याओं का मुख्य कारण है, जिसके समाधान के लिए ठोस नीति और जवाबदेही आवश्यक है।
HighLights
शहरों में मानसून से जलभराव, दुर्घटनाएं और जानमाल का नुकसान।
अनियोजित शहरीकरण, खराब सीवेज व्यवस्था मुख्य कारण बन रहे।
नगर निकायों की जवाबदेही और सुनियोजित विकास की आवश्यकता।
संजय गुप्त। एल नीनो के असर के बावजूद मानसून ने देश के हर कोने में दस्तक दे दी है। इससे किसान कुछ हद तक राहत महसूस कर रहे हैं, फिर भी कई क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण फसल की बोआई देरी से चल रही है। फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि आगे मानसून अपनी गति बरकरार रखेगा और पर्याप्त बारिश होगी।
इस कारण खेती को लेकर चिंता बरकरार है और सरकार भी इसे लेकर सजग दिख रही है। मानसून के आगमन ने जहां भारत के अनेक हिस्सों में भीषण गर्मी से राहत दी है, वहीं हर वर्ष की तरह उसने नगर निकायों की पोल खोल दी है, क्योंकि देश के अनेक छोटे-बड़े शहर वर्षा जनित समस्याओं और खासकर जल भराव से त्रस्त हैं। यह कोई नई बात नहीं।
दशकों से भारत के शहरों में लोग बरसात में जल भराव और उससे जुड़ी समस्याओं से जूझते हैं। इसके बाद भी नगर निकायों के काम करने के तौर-तरीके बदल नहीं रहे हैं।
हमारे नगर निकाय न तो जल भराव से निपट पा रहे हैं और न ही सीवर, नालियों और नालों को उफनने से रोक पा रहे हैं। इसी कारण बरसात होते ही जल भराव के कारण कई तरह की दुर्घटनाएं होती हैं। कहीं ट्रैफिक जाम हो जाता है, कहीं सड़कें धंस जाती हैं, कहीं करेंट उतर आता है तो कहीं लोग गड्ढों में भरे पानी या खुले मैनहोल में गिर जाते हैं।
हर बारिश में न जाने कितने लोग अपनी जान गंवा देते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। बीते दिनों अकेले दिल्ली-एनसीआर में मानसून की पहली बारिश में अलग-अलग दुर्घटनाओं में छह लोग मारे गए। यह बरसात की शुरुआत का हाल है। आने वाले दिनों में जलभराव के साथ कहीं-कहीं बाढ़ की भी स्थिति देखने को मिल सकती है। इसके अलावा भारी बरसात, भूस्खलन या फिर बादल फटने की घटनाओं से भी जान-माल को नुकसान हो सकता है।
केरल के जिस वायनाड में कुछ साल पहले भारी बरसात में कई लोग मारे गए थे, वहां बीते दिनों एक कंस्ट्रक्शन साइट के पास भूस्खलन से तबाही मची। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई और कई लोग लापता बताए जा रहे हैं। इस तरह की घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं के लिए चिंता का कारण बननी चाहिए, क्योंकि वर्षा जनित समस्याओं के चलते लोगों की जान जाने के साथ शहरी ढांचे को अच्छा-खासा नुकसान भी होता है।
आखिर क्या कारण है कि जो मानसून देश की आर्थिकी के लिए अत्यधिक जरूरी है, वही ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों में तमाम समस्याओं को भी जन्म देता है? छोटे शहरों की बात तो दूर रही, देश के प्रमुख महानगर तक बारिश में गंभीर समस्याओं से घिर जाते हैं और उनमें जनजीवन बाधित हो जाता है। पिछले दिनों मुंबई में तीन दिन की भारी बरसात से आफत सी आ गई।
मुंबईवासियों को उन्हीं समस्याओं से फिर दो-चार होना पड़ा, जिनका सामना वे वर्षों से करते चले आ रहे हैं। इन समस्याओं से आजिज कुछ लोगों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने मामले की सुनवाई करते हुए यह कहा कि जब लोग फुटपाथ, नदी-नालों, सड़कों पर अतिक्रमण कर लेंगे तो यह नौबत तो आएगी ही। उसके अनुसार मुंबई के हालात सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के दुरुपयोग के चलते खराब हुए।
अपने देश के बड़े शहर इसलिए और अधिक समस्याओं से घिर गए हैं, क्योंकि उनके बीच स्थित गांव और पुरानी बस्तियां अनियोजित विकास का पर्याय बन गई हैं। उनमें जल निकासी की कोई उचित व्यवस्था नहीं होती और सीवेज सिस्टम भी दोयम दर्जे का होता है।
कभी इन गांवों की आबादी सीमित थी, लेकिन शहरीकरण के क्रम में उनकी आबादी हजारों और लाखों में हो गई है। आज दिल्ली-एनसीआर के कुछ गांवों में लाखों लोग रह रहे हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों से जो पलायन होता है, वह इन्हीं शहरी गांवों में आकर बसता है। नगर निकायों ने इन गांवों के आधारभूत ढांचे को ठीक करने के लिए जो कुछ किया है, वह ऊंट के मुंह में जीरे के सामान ही है।
नगर निकाय और राज्य सरकारें इन शहरीकृत गांवों में अनियोजित विकास को रोक नहीं पा रही हैं। इसका एक कारण यह है कि सभासदों यानी पार्षदों के एजेंडे में सुनियोजित विकास है ही नहीं। एक विडंबना यह भी है कि लोग शहरीकरण की चुनौतियों के समाधान के इरादे से सभासदों का चुनाव मुश्किल से ही करते हैं। यही स्थिति विधायकों और सांसदों के मामले में भी है। इसके चलते शहरों की रोजमर्रा की तकलीफें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अपने देश में अभी भी वोट जाति-पंथ या अन्य आधार पर दिए जाते हैं, न कि प्रत्याशी की योग्यता को देखकर।
शहरों की समस्याएं बढ़ते चले जाने के कारण न केवल लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी। जो शहर जीवन को सुगम-सुविधाजनक बनाने में सक्षम होने चाहिए, वे तनाव और आपाधापी को जन्म दे रहे हैं। देश के नेता शहरीकरण के मामले में विकसित देशों के तरीके अपनाने की बातें तो खूब करते हैं, पर वैसे तरीके अपनाने की प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।
विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए मजबूत शहरी ढांचा और नियोजित शहरीकरण अत्यधिक जरूरी है, पर हमारे शहर बेतरतीब विकास का पर्याय बन गए हैं। शहरों की नींव उनका बुनियादी ढांचा होता है, लेकिन वही विकृत हो चुका है।
अब जब नींव ही विकृत हो चुकी हो तो सुनियोजित विकास कैसे हो सकता है? अपने यहां यह भी देखने को मिल रहा है कि बेहतर नगर नियोजन के नाम पर जो आधारभूत ढांचा निर्मित हो रहा है, वह या तो बहुत जल्दी नाकाफी सिद्ध होता है या दोयम दर्जे का साबित होता है।
अब यह जरूरी हो गया है कि संसद में एक विशेष सत्र बुलाकर बिगड़ते शहरीकरण को संवारने के लिए कोई सार्थक बहस की जाए। इसके अतिरिक्त उन तौर-तरीकों को अपनाने की कोई ठोस रूपरेखा बनाई जाए, जिससे शहरीकरण संबंधी जो भी नियम-कानून हैं, उन पर सही तरह अमल हो।
इसी के साथ नगर निकायों के प्रतिनिधियों और अधिकारियों को जवाबदेह भी बनाना होगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो शहरी आबादी की समस्याएं तो बढ़ेंगी, विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में कठिनाई भी होगी। यह ध्यान रहे कि शहरों का चरमराता बुनियादी ढांचा देश की छवि को भी खराब करने का काम कर रहा है।












