विचार: अस्वीकार्य है आतंकियों का महिमामंडन
एक समय एनसीईआरटी आदि की पुस्तकों में इसी तरह के भ्रामक नैरेटिव से भरी सामग्री होती थी। उनमें औरंगजेब जैसे आततायी का महिमामंडन होता था, जबकि भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों को आतंकी लिखा जाता था।
HighLights
जम्मू-कश्मीर स्कूलों में आतंकियों, अलगाववादियों का महिमामंडन करने वाली पुस्तकें मिलीं।
सरकार ने विवादित पुस्तकें वापस लीं, अधिकारियों को निलंबित किया।
राष्ट्रविरोधी लेखन पर सख्त कार्रवाई, अन्य पुस्तकों की समीक्षा की मांग।
प्रो. निरंजन कुमार। कुख्यात कम्युनिस्ट तानाशाह जोसेफ स्टालिन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जिसका असर इस पर निर्भर करता है कि इसे कौन थामे हुए है और इसका निशाना किस पर है? स्टालिन के ही वैचारिक पूर्वज व्लादिमीर लेनिन कहते थे 'मुझे बच्चों को सिखाने के लिए चार साल दीजिए और मैंने जो बीज बोया है, वह कभी उखाड़ा नहीं जा सकेगा।' ऐसे कथन जिस खतरनाक चीज की ओर इशारा करते हैं, उसका दंश अपना देश सैकड़ों वर्षों से झेल रहा है। शिक्षा के जरिये ऐसा नैरेटिव बनाया गया जो देश-समाज को विध्वंस के रास्ते पर ले जाता रहा। ऐसी भयानक साजिश का ताजा उदाहरण है जम्मू-कश्मीर में चयनित पुस्तकों में ऐसी सामग्री का समावेश, जो युवाओं को गुमराह कर अलगाववाद की ओर धकेलने, आतंकवाद को बढ़ावा देने, सामाजिक अशांति फैलाने तथा भारत की संप्रभुता- अखंडता को खतरे में डालने वाला है।
यह मामला केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित ‘समग्र शिक्षा योजना’ के तहत सरकारी स्कूलों के पुस्तकालयों के लिए चयनित पुस्तकों से जुड़ा है, जिसकी सामग्री अलगाववाद, आतंकवाद और भारत विरोधी सोच को बढ़ावा देने वाली है। विवाद के केंद्र में 'पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स आफ जेएंडके' और 'ग्रेट पर्सनैलिटीज आफ जम्मू एंड कश्मीर' नाम की दो पुस्तकें हैं। ओबेराय बुक्स सर्विस द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों में आतंकी मकबूल भट्ट, अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी, शबीर अहमद शाह, मसरत आलम, मीरवाइज उमर फारूक और मौलवी फारूक जैसे देश विरोधी तत्वों को जम्मू-कश्मीर के महापुरुषों के रूप में चित्रित किया गया है।
जबकि भारत को खतरनाक तरीके से नकरात्मक रूप में चित्रित किया गया है। कुख्यात आतंकवादी मकबूल भट्ट को जहां ‘महान क्रांतिकारी’ बताया गया, वहीं जम्मू-कश्मीर पर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने और उसके पाकिस्तान में विलय की पैरवी करने वालों का महिमामंडन किया गया है। यहां तक कि हाफिज सईद जैसे दुर्दांत अंतरराष्ट्रीय आतंकी को भी प्रशंसा मिली है। यहां तक कि भारत को ‘एक कब्जा जमाने वाला एवं दमनकारी राज्य’ कहा गया है। जबकि वास्तविकता एकदम उलट है कि पाकिस्तान ने ही जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर न केवल अवैध कब्जा किया हुआ है, बल्कि इस गुलाम जम्मू-कश्मीर के लोगों का ऐसा दमन जारी रखा हुआ है कि वहां के लोग सहायता के लिए भारत की ओर निहार रहे हैं।
यह अच्छा है कि विवाद सामने आते ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने तत्काल प्रभाव से दोनों पुस्तकों को वापस लेने का आदेश दे दिया है। आठ अधिकारियों का निलंबन और दोनों पुस्तकों के लेखकों व प्रकाशकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। मामले की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय जांच शुरू की गई है, लेकिन घटनाक्रम ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। एक तो यही कि विशेषज्ञों की समिति के कौन से सदस्य हैं, जिन्होंने ऐसी पुस्तकों की खरीद के लिए सिफारिश की? यह भी कि पुस्तकों की स्वीकृति के लिए विशेषज्ञों की समिति का गठन किसने और किस आधार पर किया? इन सबके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। याद रहे कि ये पुस्तकें, स्कूल के पुस्तकालयों तक दुर्घटनावश या किसी गलत खरीद के कारण नहीं पहुंची थीं। इसे एक आधिकारिक प्रक्रिया के माध्यम से विशेषज्ञ समिति की सुनियोजित सिफारिश पर खरीदा गया। क्या यह भी चिंतनीय नहीं कि भारत सरकार की ही एक शिक्षा योजना का जम्मू-कश्मीर सरकार के निर्देश पर ऐसी किताबों पढ़ाने के लिए उपयोग किया जा रहा है, जो एक तरफ आतंकवादी और अलगाववादियों का महिमामंडन करती है तो दूसरी तरफ भारतीय राजसत्ता को नकारात्मक रूप से चित्रित करते हुए हमारी संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने का काम करती है।
इस मामले में पुस्तक के लेखकों और प्रकाशकों को ब्लैकलिस्ट कर देना ही काफी नहीं है। उनके खिलाफ राष्ट्र-विरोधी लेखन प्रचारित करने के लिए मामले दर्ज किए जाने चाहिए, जो खुले तौर पर आतंकवाद और अलगाववाद का महिमामंडन करते हैं। यह भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा है। भारतीय कानूनी व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, अखंडता, देशद्रोह, अलगाववाद और आतंकवाद से जुड़े विषयों के लिए संविधान के विशिष्ट अनुच्छेद और दंडात्मक कानून प्रविधान हैं। पुस्तक की सामग्री अनुच्छेद 19 (2) का स्पष्ट उल्लंघन है। इसके अतिरिक्त भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152 और 197 के साथ-साथ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम 1967 के धारा 2(1)(ओ) जैसे प्रविधानों का भी उल्लंघन करती हैं। ‘जम्मू कश्मीर पीपुल्स फोरम' जैसे संगठनों ने इनकी निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज आतंक या अलगाववादी विचारधारा के प्रचार को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
एक समय एनसीईआरटी आदि की पुस्तकों में इसी तरह के भ्रामक नैरेटिव से भरी सामग्री होती थी। उनमें औरंगजेब जैसे आततायी का महिमामंडन होता था, जबकि भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों को आतंकी लिखा जाता था। खून की नदियां बहाने वाला सिकंदर 'महान' कहलाता था, तो प्रशासनिक सुधारों और जनकल्याण के लिए विख्यात छत्रपति शिवाजी को 'लुटेरा' बताया जाता था? हालांकि पिछले वर्षों में इन विसंगतियों के परिमार्जन का कुछ हद तक प्रयास किया गया है, किंतु इस दिशा में गति और बढ़ानी होगी। स्मरण रहे कि स्कूल या शिक्षा, राष्ट्र एवं समाज निर्माण के लिए होते हैं, आतंकवाद, अलगाववाद या देश-विरोधी प्रचार के लिए नहीं।
जब यह सामने आया है कि कुछ किताबें संविधान, देश की एकता और अखंडता एवं संप्रभुता को कमजोर कर रही हैं तो इस कड़ी में समग्र शिक्षा योजना के तहत अनुमोदित अन्य पुस्तकों की फिर से समीक्षा की जानी चाहिए। अब हमारी शिक्षा, साम्यवाद के पुरोधा लेनिन-स्टालिन या विदेशी विचारों मैकाले के माडल पर नहीं, भारतीय संविधान और अपनी भारतीय चिंतन-परंपरा के अनुरूप चलेगी। नकारात्मक नैरेटिव बनाने वालों को यह समझ लेना चाहिए।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में डीन प्लानिंग और सीनियर प्रोफेसर हैं)












