विचार: समय के अनुरूप बदली विदेश नीति
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है, जो गिरमिटिया समुदाय को केवल प्रवासी नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत शक्ति का विस्तार मानती है
HighLights
पीएम मोदी ने गिरमिटिया समुदाय को सभ्यतागत शक्ति का विस्तार माना।
भारत की विदेश नीति ने प्रवासी भारतीयों के हितों को प्राथमिकता दी।
गिरमिटिया देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंध मजबूत हुए।
प्रो. गौरव वल्लभ। अपनी तीन देशों की यात्रा पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों को संबोधित किया। इसके बाद वे न्यूजीलैंड में भी ऐसा करने वाले हैं। इसके पहले 28 जून को सेशेल्स की नेशनल असेंबली में उन्होंने अपने संबोधन में अगस्त 1770 में सेंट ऐनी द्वीप पहुंचे पांच भारतीयों का उल्लेख किया था।
किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने सेशेल्स की संसद में पहली बार यह संदेश दिया कि भारत और सेशेल्स के संबंध केवल राजनयिक इतिहास से नहीं, बल्कि साझा सभ्यतागत स्मृतियों और भारतवंशियों की पीढ़ियों से निर्मित विश्वास से जुड़े हैं। यह केवल अतीत का स्मरण नहीं, अपितु भारत की बदलती विदेश नीति की उद्घोषणा थी। प्रधानमंत्री के इस संदर्भ को समझने के लिए गिरमिटिया इतिहास को समझना आवश्यक है।
1833 में ब्रिटिश संसद द्वारा दास प्रथा समाप्त किए जाने के बाद ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशों में श्रमिकों का संकट उत्पन्न हुआ। इसका समाधान इंडेंटर्ड लेबर सिस्टम के रूप में निकाला, जिसमें एग्रीमेंट शब्द भोजपुरी-अवधी अपभ्रंश में 'गिरमिट' बन गया और अनुबंधित श्रमिक 'गिरमिटिया' कहलाए।
10 सितंबर, 1834 को पहला जहाज कलकत्ता से मारीशस के लिए रवाना हुआ और 2 नवंबर, 1834 को पोर्ट लुईस पहुंचा। इस मोर्चे पर मार्च 1917 आते-आते भर्तियों पर रोक लगी और 1922 तक यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई। इस दौरान लगभग 11.2 लाख भारतीय मारीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, नटाल और अन्य उपनिवेशों में भेजे गए। आज उनके वंशजों की संख्या लगभग 70–80 लाख है।
देखा जाए तो गिरमिट केवल शोषण का इतिहास न होकर पीड़ा से प्रतिष्ठा और परिश्रम से पराक्रम की यात्रा है। कभी 'कुली' और 'जहाजी' कहे जाने वाले लोगों की संतानों ने आज अनेक देशों की राजनीति, न्यायपालिका, उद्योग, शिक्षा और प्रशासन आदि में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है। लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी ने भी इस प्रश्न को राष्ट्रीय चेतना का विषय बनाया।
स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताएं राष्ट्र निर्माण, गुटनिरपेक्षता और नव स्वतंत्र देशों के साथ संबंधों पर केंद्रित थीं। उस समय यह दृष्टिकोण उभरा कि विदेशों में बस चुके भारतीय जिस देश के नागरिक हैं, उन्हें उसी राष्ट्र के प्रति पूर्ण निष्ठा रखनी चाहिए। नेहरू और बाद में इंदिरा ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। परिणामस्वरूप गिरमिटिया समुदाय लंबे समय तक भारत की विदेश नीति के केंद्र में स्थान नहीं बना सका।
सांस्कृतिक संबंध बने रहे, लेकिन संस्थागत प्राथमिकता सीमित रही। फिजी में 1987 और 2006 के राजनीतिक संकटों ने भारतीय मूल के लोगों की असुरक्षा को उजागर किया। उस दौर ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भारत केवल उनकी स्मृतियों में है या उनके वर्तमान के साथ भी खड़ा है? पिछले एक दशक में इस प्रश्न का उत्तर भारत की विदेश नीति ने नए रूप में दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने गिरमिटिया समुदाय को केवल प्रवासी समाज नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत शक्ति का विस्तार माना।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी से उसकी नागरिकता या राष्ट्रीय निष्ठा बदलने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि इतना चाहता है कि वे अपने देश के आदर्श नागरिक बने रहकर भी अपनी भारतीय सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें। यही भारत की नई विदेश नीति का सबसे बड़ा परिवर्तन है। यही परिवर्तन गिरमिटिया समुदाय के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव लेकर आया है कि भारत ने उन्हें छोड़ा नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सांस्कृतिक पहचान और विरासत का नैतिक गारंटर बनकर उभरा है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में प्रवासी भारतीयों के हितों में कई कदम उठाए गए हैं। प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन जीवंत हुए हैं। ओवरसीज सिटिजन आफ इंडिया यानी ओसीआइ व्यवस्था को अधिक सुगम बनाया गया और गिरमिट देशों के साथ उच्चस्तरीय संवाद बढ़ा।
फोरम फार इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स को-आपरेशन, वैक्सीन मैत्री, मिशन सागर, जल एंबुलेंस, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य सहयोग, क्षमता निर्माण और जलवायु साझेदारी ने छोटे द्वीपीय देशों के साथ भारत के संबंधों को नई ऊंचाई दी है। कोविड-19 के दौरान भारत इन तमाम देशों में सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाले देशों में था। इससे यह संदेश गया कि भारत कठिन समय में भी अपने मित्रों और भारतवंशियों के साथ खड़ा रहता है।
यह परिवर्तन केवल विकास और सहयोग तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक गहरा रणनीतिक सोच भी है। मारीशस, सेशेल्स, फिजी, गुयाना, सूरीनाम और अन्य देश आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, ब्लू इकोनमी, समुद्री संसाधनों का संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं और बहुपक्षीय संस्थाओं में सहयोग के मोर्चे पर इन देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
भारत की वर्तमान विदेश नीति ने समय रहते इस महत्व को पहचाना और इन देशों के साथ अपने संबंधों को केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंचाया। आज कई देशों में भारतीय आगमन दिवस तथा गिरमिट स्मृति दिवस राष्ट्रीय सम्मान के साथ मनाए जाते हैं। जिन लोगों को कभी अपमानित किया गया था, आज उनके सम्मान में राष्ट्रीय समारोह आयोजित होते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और गिरमिटिया समुदाय की असाधारण यात्रा का ही प्रमाण है।
गिरमिट गाथा अंततः भारत के उदय का भी आख्यान है, जिसमें संघर्ष से सफलता, विस्थापन से विश्वास और पीड़ा से प्रतिष्ठा जैसे बिंदुओं का समावेश है। पीएम मोदी की हालिया यात्राएं इस परिवर्तन को ही रेखांकित करती हैं कि उन्होंने गिरमिटिया समुदाय को मात्र इतिहास का विषय नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति, सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक साझेदारी का अभिन्न अंग बनाया है। भारत ने अपने बिछड़े परिवार को केवल याद नहीं किया, अपितु यह विश्वास भी दिलाया है कि विश्व के किसी भी कोने में रहने वाला भारतवंशी अकेला नहीं है।
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य हैं)












