विचार: ईंधन में आत्मनिर्भर बनाएगा एथनॉल
भारत के पास विशाल वाहन बाजार, पीएम गति शक्ति जैसा डिजिटल ढांचा और इस बदलाव को आगे बढ़ाने की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति है।
HighLights
कच्चे तेल आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य।
किसानों को लाभ, पर्यावरण में सुधार और आय वृद्धि।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन भविष्य के लिए तैयार समाधान।
डॉ. रोहित यादव। आजादी के बाद भारत में कुछ ऐसे फैसले हुए हैं, जिन्होंने देश की तस्वीर बदल दी। हरित क्रांति ने हमें अनाज में आत्मनिर्भर बनाया। अब सरकार का एथनॉल कार्यक्रम का मकसद है ईंधन में आत्मनिर्भरता। भारत हर साल कच्चे तेल के आयात पर सात लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करता है। यह पैसा विदेश जाता है, हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ता है और हम दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं। जब खाड़ी देशों में तनाव होता है, तब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं और उसकी मार सीधे आम भारतीय की जेब पर पड़ती है। सरकार का एथनॉल मिशन इसी निर्भरता को तोड़ने की कोशिश है। सरल शब्दों में कहें तो अपने गन्ने से, अपने खेतों से, अपना ईंधन बनाओ।
इसी दिशा में हाल में केंद्र सरकार ने 22 प्रतिशत, 25 प्रतिशत, 27 प्रतिशत और 30 प्रतिशत एथनॉल मिले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी हटा दी। इसका सीधा मतलब है कि अब ज्यादा एथनॉल वाला पेट्रोल बनाना सस्ता होगा। इसके साथ सरकार ने 100 प्रतिशत एथनॉल को भी कानूनी मान्यता दे दी है। जब 2018 में यह योजना शुरू हुई थी, तब पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा पांच प्रतिशत से भी कम थी। 2023-24 में यह बढ़कर 15 प्रतिशत से अधिक हो गई। आज पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल (ई-20 ईंधन) मिलाया जा रहा है। ई-20 के राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने से सालाना करीब 30,000 करोड़ रुपये का आयात बिल कम होने का अनुमान है।
एथनॉल बनाने के लिए भारत के पास पर्याप्त संसाधन हैं। आज ज्यादातर एथनॉल गन्ने के शीरे और खराब या अतिरिक्त अनाज से बनाया जाता है, लेकिन भविष्य में इसके लिए और भी कई स्रोत उपलब्ध हैं। बांस, पराली, फसल कटाई के बाद खेतों में बचा हुआ अवशेष और नगरों से निकलने वाले कुछ प्रकार के कचरे से भी एथनॉल बनाया जा सकता है। इसे दूसरी पीढ़ी का एथनॉल कहा जाता है। इसके लिए खाने-पीने की फसलों का उपयोग नहीं होता, इसलिए खाद्य सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ता। सरकार भी ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है, जिससे भविष्य में एथनॉल की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इसका सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिला है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के गन्ना किसान लंबे समय से कम दाम और चीनी मिलों से भुगतान में देरी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे थे। एथनॉल योजना ने इस स्थिति को बदलना शुरू कर दिया है। अब सरकार की गारंटी के साथ डिस्टिलरी एथनॉल खरीदती है, जिससे चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है। इसका लाभ किसानों तक भी पहुंच रहा है और उन्हें समय पर भुगतान मिल रहा है। पर्यावरण की बात करें तो एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से धुआं कम निकलता है। गाड़ियों से निकलने वाले हानिकारक कण और कार्बन मोनोआक्साइड की मात्रा घटती है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां और सोलर पैनल भी जरूरी हैं, लेकिन उनके लिए बहुत पैसा और लंबा इंतजार चाहिए। एथनॉल सम्मिश्रण आज की गाड़ियों, आज के पेट्रोल पंपों और आज की खेती से काम करता है, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
अब सवाल उठता है, अगर एथनॉल की मात्रा बढ़ती जाएगी तो आने वाली गाड़ियां कैसी होंगी? इसका जवाब है फ्लेक्स फ्यूल वाहन। ये गाड़ियां पेट्रोल, एथनॉल या दोनों के किसी भी मिश्रण पर चल सकती हैं। इनमें स्मार्ट इंजन होता है, जो खुद समझ लेता है कि टंकी में कौन सा ईंधन है और उसी हिसाब से काम करता है। यही फ्लेक्स फ्यूल की असली खूबी है। मारुति की वैगन-आर का फ्लेक्स फ्यूल माडल बाजार में आ चुका है। इसमें एथनॉल सेंसर, बेहतर फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम और जंग-रोधी पुर्जे लगे हैं, जो ज्यादा एथनॉल को झेल सकें। ई-20 को लेकर सबसे अधिक चर्चा माइलेज पर होती है। हाल में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी स्वीकार किया कि एथनॉल का कैलोरी मान पेट्रोल से कम होने के कारण ई-20 ईंधन पर माइलेज में मामूली कमी आ सकती है। हालांकि यह प्रभाव सामान्य परिस्थितियों में सीमित रहता है और ई-20 के कारण वाहनों को भी किसी प्रकार की क्षति होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। फ्लेक्स-फ्यूल इंजनों के लिए किए गए परीक्षणों में भी माइलेज दक्षता पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पाया गया। अगर एथनॉल मिश्रित ईंधन पेट्रोल से 20-25 प्रतिशत सस्ता मिले तो क्या उसकी बचत कम माइलेज की कमी को पूरा नहीं कर देगी?
ब्राजील को दुनिया में एथनॉल के सबसे बड़े और सबसे पुराने उपयोगकर्ताओं में गिना जाता है। वहां दशकों से एथनॉल का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। भारत भी अब इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अपनी परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार। भारत के पास विशाल वाहन बाजार, पीएम गति शक्ति जैसा डिजिटल ढांचा और इस बदलाव को आगे बढ़ाने की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति है। आम लोगों को इस बदलाव को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। आने वाले समय में यह न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर होगा, बल्कि ईंधन की लागत कम होने पर जेब के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है। एथनॉल सम्मिश्रण आज की जरूरत है, फ्लेक्स फ्यूल वाहन कल की तैयारी है और दोनों मिलकर भारत को उस मंजिल तक ले जाएंगे, जहां हमारा ईंधन विदेश से नहीं, अपने खेतों से आएगा। यह सिर्फ एक नीति नहीं, यह एक नया सोच है और देश को इसका स्वागत करना चाहिए।
(लेखक नरसी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, मुंबई में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)












