संपादकीय: भाजपा का प्रत्याशी चयन
भाजपा को बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है। यह घटनाक्रम पार्टी की अनुशासन और लोकतांत्रिक चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
HighLights
बांकीपुर में भाजपा को प्रत्याशी बदलना पड़ा, उठे सवाल।
दतिया में नरोत्तम मिश्रा समर्थकों का विद्रोह, पार्टी असहज।
प्रत्याशी चयन प्रक्रिया पर भाजपा की छवि को नुकसान।
बिहार में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को जिस तरह प्रत्याशी बदलना पड़ा और मध्य प्रदेश में दतिया विधानसभा उपचुनाव में खुद को संभावित प्रत्याशी मान रहे पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के विद्रोह का सामना करना पड़ा, उससे उभरे सवाल पार्टी को असहज करने वाले हैं।
चूंकि बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने से रिक्त हुई है, इसलिए यहां होने वाले विधानसभा उपचुनाव की महत्ता बढ़ गई है। पहले भाजपा ने यहां से अभिषेक कुमार को प्रत्याशी बनाया, लेकिन उन्होंने यकायक यह कहकर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली कि पारिवारिक कारणों से वे चुनाव लड़ने में असमर्थ हैं। इसके बाद यहां से नीरज कुमार सिन्हा को प्रत्याशी घोषित किया गया।
क्या यह विचित्र नहीं कि मात्र एक विधानसभा सीट के लिए भाजपा अपने प्रत्याशी का चयन सही तरह नहीं कर सकी? यह समझना कठिन है कि अभिषेक कुमार के सामने अचानक ऐसी क्या पारिवारिक परिस्थिति आ गई कि वे चुनाव लड़ने से पीछे हट गए?
यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर इसी सीट से चुनाव लड़ रहे जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी प्रशांत किशोर एक प्रेस कांफ्रेंस करने की तैयारी कर रहे थे और इसकी भनक लगते ही भाजपा ने प्रत्याशी बदलने का फैसला कर लिया।
पता नहीं सच क्या है, लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर जो बात प्रशांत किशोर को ज्ञात थी, क्या वह भाजपा नेतृत्व और विशेष रूप से इसी सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन को पता नहीं थी?
मध्य प्रदेश में दतिया विधानसभा क्षेत्र का मामला बांकीपुर से अलग है। यहां से पिछले चुनाव में पराजित भाजपा नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा यह मानकर चल रहे थे कि उन्हें ही उम्मीदवार बनाया जाएगा। उन्होंने अपना प्रचार भी शुरू कर दिया था, लेकिन जब उनके नाम की घोषणा नहीं हुई तो उनके समर्थक विद्रोह पर उतर आए।
उन्होंने सड़क जाम करने के साथ धरना-प्रदर्शन भी किया और पत्थरबाजी भी की। नरोत्तम मिश्रा के समर्थन में कई भाजपा पदाधिकारियों ने त्यागपत्र भी दे दिए। हालांकि हंगामा शांत होने के बाद नरोत्तम मिश्रा अपने समर्थकों के रवैये को सही नहीं ठहरा रहे हैं, लेकिन जो कुछ हुआ, उससे पार्टी की फजीहत तो हुई ही।
यह ठीक है कि भाजपा का तेजी से विस्तार हो रहा है और जहां वह सशक्त है, वहां चुनाव लड़ने वालों की कतार लग जाती है, लेकिन दतिया का मामला औरों से अलग होने के उसके दावे पर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। यदि भाजपा औरों से अलग एवं अनुशासित दल की अपनी छवि बनाए रखना चाहती है तो उसे प्रत्याशी चयन की कोई लोकतांत्रिक एवं नीर-क्षीर व्यवस्था बनानी ही होगी।












