जागरण संपादकीय: समाधान की पहल
सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा, वाराणसी और संभल के धार्मिक विवादों के शांतिपूर्ण हल के लिए विशेष लोक अदालत की पहल की है।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक विवादों के लिए लोक अदालत की पहल।
मथुरा, वाराणसी, संभल विवादों पर आपसी सहमति की उम्मीद।
1991 पूजास्थल कानून व आयोग गठन का सुझाव।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष लोक अदालत के माध्यम से मथुरा, वाराणसी और संभल के धार्मिक स्थल से जुड़े विवादों के सद्भावपूर्ण हल के लिए जो पहल की, वह सराहनीय है। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि समाधान नामक इस पहल के जरिये मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद, वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर और संभल की जामा मस्जिद-कल्कि मंदिर संबंधी विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने की कोई राह निकल सके।
एक समय अयोध्या विवाद का समाधान भी आपसी सहमति से निकालने के लिए कई स्तरों पर प्रयत्न किए गए थे-पहले नेताओं की ओर से, फिर इस मामले से जुड़े दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों की ओर से और अंत में सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी, लेकिन एक पक्ष के अड़ियल रवैये के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। बाद में सदियों पुराने इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय मंदिर के पक्ष में दिया।
यह बात और है कि मस्जिद पक्ष के कुछ लोगों को यह फैसला रास नहीं आया और वे अभी भी उसके विरुद्ध लोगों को बहकाने-बरगलाने का काम करते रहते हैं। ऐसा ही कुछ काम धार के भोजशाला मामले में भी किया जा रहा है। ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल में भोजशाला को हिंदू मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्राचीन केंद्र करार दिया।
मथुरा, वाराणसी और संभल के मामले सुप्रीम कोर्ट की लोक अदालत के माध्यम से तभी सुलझ पाएंगे, जब दोनों पक्ष इसके प्रति प्रतिबद्धता दिखाएंगे। चूंकि इसके बहुत आसार नहीं कि मथुरा, वाराणसी और संभल के धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के मैत्रीपूर्ण समाधान के लिए दोनों पक्ष आगे आएंगे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि इन विवादों का यथाशीघ्र हल उच्चतर न्यायपालिका के स्तर पर हो।
बेहतर होगा कि सुप्रीम कोर्ट 1991 के पूजास्थल कानून को चुनौती देनी वाली याचिकाओं का भी निपटारा करे, क्योंकि यह कानून न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का निरादर करता है। यह विवादों को भूलने की बात करता है, जो संभव नहीं। उचित यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट मथुरा, वाराणसी और संभल के धार्मिक स्थलों के साथ ऐसे ही अन्य विवादों के हल के लिए ऐसे किसी आयोग का गठन करे, जो यह पता लगाए कि किन स्थानों पर किसी धार्मिक स्थल को ध्वस्त कर अन्य धार्मिक स्थल जबरन निर्मित किए गए।
निःसंदेह इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उसकी उन भूलों को सुधारा अवश्य जा सकता है, जो पुराने घावों की तरह टीस देती रहती हैं। विश्व के कई देशों ने ऐतिहासिक अन्याय को उजागर करने और आक्रांताओं के कृत्यों की पहचान करने एवं पीड़ितों को राहत देने के लिए सत्य एवं सुलह आयोग गठित किए हैं। भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए।












