मुनि शंकर पाण्डेय। स्वतंत्रता के बाद की सरकारों की नीतियों के कारण भारत में आधारभूत संरचना के विकास का दायरा केवल दक्षिण भारत, महानगरों और बड़े शहरों तक सीमित रहा। परिणामस्वरूप कभी बड़े साम्राज्यों के केंद्र रहे उत्तर भारत के प्रमुख राज्यों के लिए 'बीमारू' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। 1980 के दशक में जनसांख्यिकीविद् आशीष बोस ने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को 'बीमारू' कहा।

यह अविकसित अर्थव्यवस्था, कमजोर अवसंरचना विकास, निर्धनता, निरक्षरता के परिणामस्वरूप जनसंख्या-विस्फोट, उच्च शिशु-मृत्यु तथा दुर्बल स्वास्थ्य से ग्रस्त प्रदेशों की संरचनात्मक जड़ता के सांकेतिक बोधक के रूप में रहा। वास्तविकता में इस स्थिति का विस्तार उत्तर भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों तक रहा। जहां भारत की बड़ी आबादी विकास के पैमानों में पीछे रही। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार राज्यों के सहयोग से इन क्षेत्रों की बदहाली को दूर करने में बहुत हद तक सफल रही है।

हवाई संपर्क की बात करें तो 2014 से पहले देश में लगभग 74–75 परिचालन हवाई अड्डे थे। आज यह संख्या बढ़कर 160 से अधिक हो चुकी है। इनमें कई नए या पुनर्जीवित ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे शामिल हैं, जैसे नोएडा (जेवर), मोपा (गोवा), शिवमोग्गा (कर्नाटक), होल्लोंगी (अरुणाचल प्रदेश), राजकोट (हिरासर) और अयोध्या प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में भी हवाई संपर्क का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। एक्सप्रेसवे नेटवर्क में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

2014 तक भारत में लगभग 1,000-1,300 किलोमीटर एक्सप्रेसवे थे, जबकि अब यह नेटवर्क 6,000 किमी से अधिक हो चुका है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, गंगा, दिल्ली-देहरादून और द्वारका एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट उत्तर भारत के आर्थिक परिदृश्य को बदल रहे हैं। पहले जहां आधुनिक एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा पश्चिमी और दक्षिणी भारत में केंद्रित था, वहीं अब उत्तर और पूर्वी भारत भी तेजी से इस नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। केंद्र सरकार ने विकेंद्रित ढांचागत निर्माण की नीति को ऊर्जा क्षेत्र में भी लागू किया।

देश में नई रिफाइनरी परियोजनाओं के साथ-साथ मौजूदा रिफाइनरियों का विस्तार किया गया है। विशेष रूप से जोधपुर में रिफाइनरी का शिलान्यास, बरौनी रिफाइनरी (बिहार) का उन्नयन, पानीपत रिफाइनरी (हरियाणा) का विस्तार और पूर्वोत्तर क्षेत्र में निवेश इस बदलाव के उदाहरण हैं। इसके साथ ही ऊर्जा गंगा गैस पाइपलाइन, जगदीशपुर-हल्दिया-बोकारो-धामरा पाइपलाइन, नार्थ-ईस्ट गैस ग्रिड और अन्य परियोजनाओं ने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा तथा पूर्वोत्तर राज्यों तक प्राकृतिक गैस पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए गेल इंडिया लिमिटेड जैसी भारत सरकार की कंपनियों को आगे किया।

वर्तमान भारत के औद्योगिक राजनीतिक भूगोल में इस समय एक बड़ा परिवर्तन चुपचाप आकार ले रहा है। लंबे समय से देश के आटोमोबाइल उद्योग का केंद्र दक्षिण और पश्चिम भारत रहा है। तमिलनाडु को डेट्रायट आफ इंडिया कहा गया, जबकि गुजरात ने बीते डेढ़ दशक में गतिशील औद्योगिक नीति के बल पर वैश्विक वाहन कंपनियों को आकर्षित कर देश के सबसे बड़े आटो हब में अपनी जगह बना ली, परंतु अब उत्तर भारत में एक नया औद्योगिक भूगोल तेजी से उभर रहा है, जिसके केंद्र में उत्तर एवं मध्य के राज्य और पूर्वोत्तर भारत हैं।

केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से इन कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने जिस प्रकार एक्सप्रेसवे, समर्पित मालवाहक गलियारों, बहुस्तरीय परिवहन केंद्रों, हवाई अड्डों तथा औद्योगिक समूह क्षेत्रों का विस्तार किया है, उसने राज्य की आर्थिक छवि को परिवर्तित करना आरंभ कर दिया है। इस क्रम में उत्तर प्रदेश के जापान सहित अन्य प्रमुख वैश्विक वाहन विनिर्माता देशों के साथ हुए समझौते केवल निवेश आकर्षित करने का प्रयास नहीं हैं।

इनके पीछे उत्तर प्रदेश की वह दीर्घकालिक रणनीति है, जो राज्य को केवल असेंबल इकोनमी से आग ले जाते हुए समेकित निर्माण व्यवस्था में रूपांतरित करना चाहती है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र इस परिवर्तन के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। एक समय यह क्षेत्र केवल आवासीय विस्तार और भू-संपदा के लिए चर्चित था, किंतु आज यहां इलेक्ट्रानिक उपकरण, ऊर्जा संचयन प्रणाली, वाहन कलपुर्जे और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स-ईवी जैसे उद्योग तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं।

इस संपूर्ण परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। औद्योगिक इतिहास साक्षी है कि जिन क्षेत्रों ने परिवहन और आपूर्ति तंत्र पर नियंत्रण स्थापित किया, वही वैश्विक निर्माण शक्ति बने। गुजरात को समुद्री बंदरगाहों का लाभ प्राप्त हुआ, तमिलनाडु को चेन्नई बंदरगाह ने सामर्थ्य प्रदान की।

कुल मिलाकर, पिछले एक दशक में नीति का फोकस अपेक्षाकृत कम विकसित क्षेत्रों उत्तर भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर की ओर बढ़ा है। इससे परिवहन सुविधाएं बढ़ी हैं, क्षेत्रीय असमानताएं कम हुई हैं, निवेश आकर्षित हो रहे हैं और संतुलित आर्थिक विकास सुनिश्चित हुआ है। बड़े बंदरगाह, औद्योगिक गलियारे और ऊर्जा अवसंरचना पश्चिमी और दक्षिणी भारत के साथ उत्तर भारत में दस्तक दे रहे हैं।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार और लोक-नीति विश्लेषक हैं)