सृजन पाल सिंह। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत सात जुलाई को जकार्ता में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने कुछ ऐसे समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनकी गूंज बीजिंग तक सुनाई पड़ी होगी। पहला समझौता सुमात्रा के उत्तरी छोर पर बसे सबांग बंदरगाह को मिलकर विकसित करने का है। दूसरा, लगभग 5,400 करोड़ रुपये का ब्रह्मोस मिसाइल सौदा, जिसके साथ इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के बाद इस स्वदेशी सुपरसोनिक मिसाइल का तीसरा खरीदार बन गया। बुनियादी रूप से ये व्यापार और रक्षा के समझौते हैं, लेकिन मानचित्र पर देखें तो यह हिंद महासागर की सबसे महत्वपूर्ण शतरंज की बिसात पर भारत की एक सधी हुई चाल है और इस बिसात का केंद्र है-मलक्का स्ट्रेट।

मलक्का स्ट्रेट वस्तुत: मलेशिया और इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के बीच फैली लगभग 900 किलोमीटर लंबी संकरी समुद्री गली है, जो प्रशांत महासागर और हिंद महासागर को जोड़ती है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर इसकी चौड़ाई मात्र ढाई-तीन किलोमीटर रह जाती है। इसी संकरे रास्ते से हर साल 80 हजार से अधिक जहाज गुजरते हैं। यानी रोजाना दो सौ से अधिक जहाजों की आवाजाही इस मार्ग से होती है। इस तरह, दुनिया के समुद्री व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्से में इसी जलमार्ग की भागीदारी है। इस तरह लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ (ट्रिलियन) डालर का माल हर साल यहीं से होकर जाता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो मलक्का से गुजरने वाला सालाना व्यापार लगभग भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था के बराबर है।

इस संकरी समुद्री गली पर सबसे अधिक निर्भरता किसकी है? इसका जवाब है चीन की निर्भरता सर्वाधिक है। चीन का लगभग 80 प्रतिशत आयातित कच्चा तेल और व्यापार का बड़ा हिस्सा मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है। इसे लेकर बीजिंग की चिंता इतनी गहरी है कि 2003 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिंताओ ने इसे 'मलक्का दुविधा' का नाम तक दे दिया था। चीन ने इस दुविधा से निकलने के लिए म्यांमार और पाकिस्तान में पाइपलाइन बिछाईं, बेल्ट एंड रोड के नाम पर अरबों डालर झोंके, परंतु सच्चाई यही है कि मलक्का समुद्री मार्ग का कोई कारगर एवं ठोस विकल्प आज भी उसके पास नहीं है। मलक्का चीनी अर्थव्यवस्था की वह नस है, जिस पर हल्का सा दबाव भी बीजिंग की धड़कनें बढ़ा देता है। ऐसे में यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि जो गली चीन की दुखती रग है, वह भारत के लिए इतनी बड़ी रणनीतिक ताकत कैसे बन सकती है? इसका उत्तर तीन स्तरों पर सामने आता है।

पहला स्तर है संतुलन का। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारत पर दबाव बनाने के कई मोर्चे खोले हैं। जैसे कि गलवन जैसी सीमा पर झड़पें, 100 अरब डालर से अधिक का व्यापार घाटा और दुर्लभ खनिजों तथा दवा उद्योग के कच्चे माल की आपूर्ति रोकने की धमकियां। हिमालय की ऊंचाइयों पर और बाजार के मैदान में चीन का पलड़ा भले ही भारी दिखता है, लेकिन मलक्का के मुहाने पर स्थिति ठीक उलट है। यहां भूगोल भारत के साथ खड़ा है। किसी भी तनाव या संघर्ष की स्थिति में मलक्का के आसपास भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति चीन की ऊर्जा एवं व्यापार की जीवनरेखा पर ग्रहण लगा सकती है। यही अंकुश हिमालय से लेकर व्यापार तक, हर दूसरे मोर्चे पर चीन को संयम बरतने पर मजबूर करता है। रणनीति की भाषा में यही 'प्रतिरोधक क्षमता' है-युद्ध जीतने के लिए नहीं, युद्ध रोकने के लिए।

दूसरा स्तर है भूगोल को अवसर में बदलने का। प्रकृति ने भारत को अंडमान-निकोबार के रूप में मलक्का के दरवाजे की चौकी पहले से दे रखी है। ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का के व्यापारिक मार्ग से करीब 70 से 75 किलोमीटर दूर है। इस मोर्चे पर लगभग 72,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार परियोजना बहुत कारगर हो सकती है। इस परियोजना के अंतर्गत गैलेथिया खाड़ी में देश का 13वां प्रमुख बंदरगाह आकार ले रहा है, जिसे इसी वर्ष फरवरी में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से भी हरी झंडी मिल गई। वर्ष 2028 तक इसके पहले चरण में 40 लाख कंटेनर सालाना संभालने की क्षमता होगी। व्यापक रूप से देखा जाए तो यह केवल सामरिक नहीं, अपितु एक बड़ा आर्थिक अवसर भी है। आज भारत का लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों से होकर जाता है। ऐसे में, गैलेथिया के माध्यम से वह कमाई भारत की झोली में आ सकती है। यहीं देश की एकमात्र त्रि-सेवा कमान भी है, जो हमारी सैन्य निगरानी का आधार है।

तीसरा स्तर है साझेदारियों का और यहीं सबांग की अहमियत समझ आती है। सबांग ग्रेट निकोबार से मात्र 160 किलोमीटर दूर मलक्का के उत्तरी मुहाने पर स्थित है। ग्रेट निकोबार और सबांग को मिलाकर देखें तो मलक्का के प्रवेश द्वार के दोनों किनारों पर भारत की उपस्थिति बनती है। यह उपस्थिति किसी पर थोपी नहीं गई, बल्कि इंडोनेशिया जैसे साझेदार के आमंत्रण से बनी है। ब्रह्मोस सौदे इसी विश्वास की कड़ी हैं। भरोसे की इसी कड़ी के चलते फिलीपींस, वियतनाम और अब इंडोनेशिया यानी दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागीरी झेल रहे तीनों प्रमुख देश आज भारतीय मिसाइलों से अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहे हैं। चीन की घेराबंदी का जवाब भारत गोलबंदी से नहीं, भरोसेमंद मित्रता से दे रहा है।

लगभग एक हजार वर्ष पहले चोल सम्राट राजेंद्र चोल के जहाजी बेड़े इन्हीं समुद्रों को पार कर सुमात्रा तक पहुंचे थे। समुद्र की शक्ति को समझना हमारी सभ्यता की पुरानी सीख है, जिसे हमने बीच की सदियों में भुला दिया था। मलक्का स्ट्रेट आज हमें वही पाठ दोबारा पढ़ा रहा है कि 21वीं सदी में भारत की सुरक्षा की सीमाएं हिमालय से अधिक समुद्र की लहरों पर निर्भर करेंगी। आवश्यकता बस इस बात की है कि निकोबार से सबांग तक शुरू हुए इन प्रयासों को हम राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर पूरी गति से आगे बढ़ाएं।

(लेखक कलाम सेंटर के संस्थापक और पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के सलाहकार रहे हैं)