आखिरकार जिसकी आशंका थी वही हुआ, अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव के चलते होर्मुज समुद्री मार्ग फिर बंद हो गया। अमेरिका-ईरान पिछले कुछ दिनों से जिस तरह एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले करने में लगे हुए हैं, उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि इन दोनों देशों के बीच युद्धविराम को लेकर जो सहमति बनी थी, वह पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई है। अमेरिका-ईरान के बीच सैन्य संघर्ष इसलिए तेज हुआ, क्योंकि ईरान ने साइप्रस के झंडे वाले जहाज पर हमला किया।

उसने इसके पहले भी यह बहाना बनाकर तीन जहाजों पर हमले किए थे कि वे उसकी ओर से निर्धारित मार्ग से नहीं गुजर रहे थे। स्पष्ट है कि ईरान येन-केन-प्रकारेण होर्मुज पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए प्रयत्नशील है। यह न तो अमेरिका को स्वीकार हो सकता है, न खाड़ी देशों को और न ही विश्व समुदाय को। होर्मुज एक स्वतंत्र समुद्री मार्ग है और उस पर किसी देश का एकाधिकार नहीं हो सकता-न तो ईरान का और न ही खाड़ी देशों का। ईरान अथवा अन्य किसी देश को यह भी अधिकार नहीं कि वह होर्मुज से निकलने वाले जहाजों से किसी तरह का टैक्स वसूले।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को मनचाही शर्तों पर झुकाने के लिए प्रयत्नशील हैं, वैसे ही ईरानी नेतृत्व भी होर्मुज को लेकर मनमानी कर रहा है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि आने वाले दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य संघर्ष और तेज होगा। इसके चलते होर्मुज से जहाजों का आवागमन पूरी तौर पर ठप हो सकता है। इसका दुष्परिणाम तेल एवं गैस के दामों में वृद्धि के रूप में देखने को मिलेगा और उससे सभी देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, क्योंकि होर्मुज से विश्व के पांचवें हिस्से की ऊर्जा आपूर्ति होती है।


ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम इसलिए नहीं टिक सका, क्योंकि एक तो दोनों देश एक-दूसरे के प्रति अविश्वास और घृणा से भरे हुए हैं और दूसरे इन देशों के बीच ऐसा कोई मध्यस्थ नहीं, जिसकी अपनी कोई विश्वसनीयता हो और जो दोनों देशों पर दबाव डाल सकें। एक समस्या यह भी है कि दोनों ही देश युद्धविराम को लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं से बंधे रहने के लिए तैयार नहीं।

ऐसा लगता है कि ईरान इसकी प्रतीक्षा कर रहा था कि उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार हो जाए तो वह नए सिरे से अपनी आक्रामकता दिखाए। जो भी हो, वर्तमान परिस्थितियों में विश्व समुदाय के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह आगे आकर अमेरिका और ईरान पर दबाव बनाए। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि ईरान-अमेरिका नए सिरे से किसी सहमति पर पहुंचने के लिए भरोसेमंद मध्यस्थों की तलाश करें।