जवाहर लाल कौल। अमेरिका-ईरान युद्ध में शामिल न होते हुए भी हम इस जंग के भुक्तभोगी बने हुए हैं और न मालूम इसकी तपिश हमें कब तक झेलनी पड़ेगी। इससे आर्थिक क्षति तो उठानी पड़ रही है, लेकिन राजनीतिक दुविधाएं भी कम नहीं बढ़ीं। संयोग से प्रधानमंत्री मोदी व्यावहारिक होने के साथ ही राजनीतिक दूरदर्शिता से संपन्न भी हैं। देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच का युद्ध बहुआयामी है। बहुआयामी इसलिए, क्योंकि ईरान को अपने तेल स्रोतों और व्यापारिक मार्गों से जुड़े हितों की पूर्ति करनी है।

ईरान के निकटवर्ती कई तेल संपन्न देशों पर अमेरिका ने अपना सैन्य स्थापत्य बनाया हुआ है। ईरान को लगता है इन्हीं अरब देशों के माध्यम से अमेरिका उसकी तेल संपदा को खतरे में डाल सकता है। इसलिए अमेरिका के साथ-साथ ये अरब देश भी उसके दुश्मनों की ही श्रेणी में हैं। तमाम प्रयासों के बाद कुछ शांति बनी तो वह भी टिकाऊ नहीं रही। स्पष्ट है कि स्विट्जरलैंड में हुआ वादा भरोसे की कसौटी पर टिक नहीं पाया। दोनों ही पक्ष होर्मुज को हथियार बनाकर एक दूसरे पर बढ़त बनाने के प्रयासों में जुटे हैं।

न केवल खाड़ी के तेल उत्पादक देशों, बल्कि दुनिया भर के उपभोक्ताओं के लिए होर्मुज की महत्ता किसी से छिपी नहीं। यह जलमार्ग बंद रहे तो थोड़े ही समय में खाड़ी के मुख्य तेल व्यापार पर संकट मंडराने लगेगा। ईरान इसमें एक प्रमुख खिलाड़ी है तो इजरायल भी। इजरायल को लगता है कि जब तक अरबों में एकता रहेगी, तब तक यहूदी राष्ट्र खतरे में रहेगा। फलस्तीन उसकी सीमा पर लगातार खतरे की घंटी बजाता रहता है, जबकि तेल निर्यातकों का बेताज बादशाह बनने की दशकों से हसरत पाले अमेरिका को लगता है कि अरबों के पास काफी तेल संपदा है, लेकिन न तो उनके पास उसके प्रबंधन का हुनर है और न ही वे अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हैं। राष्ट्रपति ट्रंप का विचार है कि अमेरिका को आर्थिक और राजनीतिक रूप से महान बनाने के लिए अरब तेल पर जागीरदारी स्थापित करनी ही होगी। इसमें कुछ अरब देश बाधा बन रहे थे। ट्रंप के सोच में अरबों के अतिरिक्त ईरान भी एक बडी बाधा है। ट्रंप को संदेह था कि ईरान परमाणु बम बनाने में एक बड़ी हद तक सफलता के करीब है।

खाड़ी युद्ध के बहुआयामी द्वंद्वों का अंतिम समाधान ईरानी नेताओं या ट्रंप के बूते से बाहर दिख रहा है, क्योंकि दोनों पक्षों ने अपने हिमायतियों और शत्रुओं की बड़ी संख्या तैयार कर ली है। अगर हम हर एक मुद्दे को परखना आरंभ करें तो पता चलेगा कि हर मुद्दे का अपना इतिहास है और वह इतिहास टकराव और हिंसा का ही है। खाड़ी क्षेत्र में ईरान एक ऐसा देश है, जो इतिहास के विभिन्न चरणों में कभी साहित्य, दर्शन और भाषा का देश रहा तो कभी हिंसा और पौरुष का। इस्लाम के उदय के दौर में इस पर इस्लामी आक्रमणकारियों का आधिपत्य हो गया।

इस क्रम में जहां अधिकतर अरब सुन्नी हो गए, वहीं ईरान शिया विचारधारा की राह पर निकल पड़ा। असल में एक प्रकार के दुराव ने ही ईरान को पड़ोसी सऊदी अरब के विपरीत वैचारिक-राजनीतिक राह पकड़ने पर मजबूर कर दिया। वर्तमान परिस्थितियों में भी ईरान और सऊदी अरब नदी के दो अलग-अलग किनारे हो गए हैं। तेल के ही कारण सऊदी अरब अमेरिका के साथ और ईरान खुद अपनी राह पर चल पड़ा। अपनी अलग पहचान ने ईरानी नेतृत्व में इस्लामी अधिनायकवादी शासन व्यस्वस्था को स्थापित किया। ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी परंपरागत है, जिसे ईरानी जन्मजात मानते हैं और इजरायली जातिगत।

मौजूदा हालात में इतना तो कहा जा सकता है कि अमेरिका से ईरान का टकराव मात्र होर्मुज पर फैसला होने से तय नहीं हो सकता। जब तक अमेरिका हजारों मील दूर देशों को अपनी सैन्य छत्रछाया के तले रखने की लालसा नहीं छोड़ता, तब तक एशिया के इस संपन्न क्षेत्र को अपने राजनीतिक अधिकार में लाने की योजनाएं बनाता ही रहेगा। आज भले ही लग रहा हो कि दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति हो गई है, लेकिन दोनों पक्षों की भाषा यह बताती है कि तेल मार्ग ही विवाद का कारण बना हुआ है। जबकि परमाणु सामग्री पर अधिकार और परमाणु अनुसंधान के प्रश्न अभी कायम ही रहेंगे।

इजरायल भी अपने विस्तार का मामला अमेरिका के कहने पर कभी नहीं छोड़ेगा। इसीलिए फलस्तीन ही नहीं कई और अरब देश भी इस यहूदी राष्ट्र का अंत ही चाहेंगे। बढ़ते अनिश्चय और टकराव की इस स्थिति में भारत अपनी तैयारी की प्रक्रिया को अधूरा नहीं छोड़ सकता। हम विश्व के ऐसे बिंदु पर स्थित हैं, जहां किसी 'राजनीतिक' और 'रणनीतिक कोण' पर हमें तत्पर रहना ही होगा। कश्मीर के एक रणकुशल राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ ने अपने राज्य की सुरक्षा के रहस्य के बारे में कहा था, 'कश्मीर को घेरने वाले इन पर्वतों का बचाव तो सीमित ही है। मेरे राज्य की वास्तविक सुरक्षा यहां से सैकड़ों मील दूर गांधार दर्रों पर टिकी है। जो आक्रमणकारी इन दर्रों पर अधिकार करेगा, वही कश्मीर को और फिर भारत को जीत सकेगा।'

अपनी रणनीतिक तैयारी के संदर्भ में अपने साथियों के चयन का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है। रूस दशकों से हमारा मित्र रहा है, लेकिन वह खुद वर्षों से यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। खाड़ी युद्ध ने महाशक्ति अमेरिका के कथित अभिमान को भी तगड़ी चोट पहुंचाई है। हमें यह जानना होगा कि एशिया में चीन को महाशक्ति का ओहदा देना हमारे लिए हानिकारक होगा। भले ही सैन्य शक्ति में हम चीन को फिलहाल न पछाड़ सकें, लेकिन उसे मनमानी करने की हैसियत तो हासिल न ही करने दें।

ईरान से अमेरिका को मिल रही चुनौती को देखते हुए यह भी लगता है कि किसी पड़ाव पर यूक्रेन भी रूस को थका सकता है। इसलिए हमें कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर खोजना ही होगा। इजरायल के साथ हमारी निकटता वर्षों से है, लेकिन ईरान के साथ भी मित्रता समय के साथ परवान चढ़ती रही है। ऐसे में यदि इन दोनों देशों के बीच टकराव जारी रहा तो हमारे लिए दुविधा बढ़ना तय है। हमें इस दुविधा में अपने लिए कोई अनुकूल स्थिति खोजनी होगी। दीर्घकालिक हितों की पूर्ति के लिए यह आवश्यक हो गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)