विचार: प्रकृति से सामंजस्य बैठाने का समय
वर्षा ऋतु का मौसम जहां खुशहाली और नवजीवन लेकर आता है, वहीं यह अपने साथ स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी कई बड़ी चुनौतियां भी लेकर आता है।
HighLights
'एक पेड़ मां के नाम' अभियान से वृक्षारोपण को बढ़ावा दें।
वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करें।
जैविक खेती अपनाकर मिट्टी और स्वास्थ्य में सुधार लाएं।
डॉ. दीपक कोहली। वर्षा ऋतु केवल मौसम का एक बदलाव ही नहीं, बल्कि इस धरती पर नवसृजन और संवर्धन का साक्षात आगमन है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में प्रकृति को कभी भी मनुष्य से अलग नहीं देखा गया, बल्कि उसे एक परिवार के रूप में स्वीकार किया गया है, लेकिन आज पर्यावरण संकट, ग्लोबल वार्मिंग और जल संकट जैसी चुनौतियां हमारे दरवाजे पर खड़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ मूलभूत सुधार करने होंगे। यदि समाज कुछ विशेष आग्रहों और संकल्पों को अपनी जीवनशैली और कार्यशैली का हिस्सा बना ले, तो हम एक बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
वर्तमान में 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान पूरे देश में एक आंदोलन का रूप ले रहा है। इस अभियान के अंतर्गत समाज के प्रत्येक परिवार को यह जिम्मेदारी उठानी चाहिए कि वे कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और उसके संरक्षण, पोषण और सुरक्षा का एक पवित्र संकल्प भी लें। जंगलों का जो कटान हुआ है और कंक्रीट के जैसे जंगल खड़े हुए हैं, उसके कारण भी तापमान में भारी वृद्धि हो रही है।
वृक्षों के साथ ही जीवन का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण तत्व जल है। जल के बिना इस सृष्टि की गति रुक जाएगी, इसीलिए हमारे समाज में यह गहरा भाव हमेशा से रहा है कि 'जल है तो कल है', लेकिन आधुनिक सुख-सुविधाओं और लापरवाही के कारण हमने अपने जल स्रोतों की घोर उपेक्षा की है। आज हमारे पारंपरिक तालाब सूख चुके हैं, कुएं कचरे से भर गए हैं और नदियों का जलस्तर घट रहा है। भूजल का अत्यधिक दोहन होने के कारण पानी का संकट गहराता जा रहा है। इस गंभीर समस्या का समाधान केवल सरकारी नीतियों से नहीं हो सकता, इसके लिए व्यापक जनभागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है। हमें आगे आकर अपने तालाबों, पोखरों, अमृत सरोवरों, प्राचीन कुओं और अन्य सभी पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और उनकी स्वच्छता पर ध्यान देना होगा।
इसके साथ ही, वर्षा ऋतु में जो असीमित जल आसमान से गिरता है और बहकर व्यर्थ चला जाता है, उसे सहेजना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। हमें घरों, विद्यालयों, ग्राम पंचायतों और विभिन्न व्यापारिक एवं सामाजिक संस्थानों में वर्षा जल संचयन यानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की प्रणालियों को स्थापित करना होगा और इसे एक जन अभियान का रूप देना होगा। जब वर्षा का जल सहेजा और सीधे जमीन के भीतर जाएगा, तो भूगर्भ जल का स्तर फिर ऊपर आएगा और आने वाली पीढ़ियों को पानी के संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
पिछले कुछ दशकों में रासायनिक खादों, यूरिया और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण हमारी उपजाऊ भूमि की सेहत बुरी तरह से खराब हुई है। मिट्टी की प्राकृतिक जीवन शक्ति नष्ट हो रही है और दूषित अन्न खाकर हम तरह-तरह की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। हमें जैविक और प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा। जैविक खेती का सीधा अर्थ है प्रकृति के नियमों के अनुसार खेती करना। जब किसान इस पारंपरिक और वैज्ञानिक पद्धति को अपनाएगा, तो इससे न केवल हमारी मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, बल्कि अनाज भी शुद्ध और पौष्टिक होगा। यह बदलाव हमारे परिवार, हमारे समाज और पूरे देश को एक स्वस्थ जीवन प्रदान करेगा तथा हमारी कृषि व्यवस्था को अधिक समृद्ध, टिकाऊ और नई मजबूती प्रदान करेगा।
वर्षा ऋतु का मौसम जहां खुशहाली और नवजीवन लेकर आता है, वहीं यह अपने साथ स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी कई बड़ी चुनौतियां भी लेकर आता है। इन दिनों में थोड़ी सी भी लापरवाही जलजनित और संक्रामक रोगों को जन्म देती है। इसलिए हमें सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद करना होगा और नालियों की नियमित सफाई सुनिश्चित करनी होगी ताकि जल प्रवाह सुचारु रूप से चलता रहे। बिजली गिरने से सैकड़ों बेगुनाह लोगों और बेजुबान पशुओं की असामयिक मृत्यु हो जाती है। हमें वज्रपात की घटनाओं का पूर्वानुमान तो नहीं मिल पाता, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण लोग दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।
इसी प्रकार, भारी बारिश या अतिवृष्टि के कारण नदियों, नहरों, बांधों और अन्य स्थानीय जलाशयों का जलस्तर अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाता है। हालांकि, शासन और प्रशासन ने इन सभी प्राकृतिक चुनौतियों और आपदाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक और पुख्ता तैयारियां की हैं, लेकिन हमें यह सदैव स्मरण रखना होगा कि कोई भी प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकती, जब तक उस समाज का प्रत्येक नागरिक स्वयं सतर्क, सजग और अनुशासित न हो।
जब हम अपनी धरती को केवल उपभोग की एक वस्तु मान लेते हैं, तो प्रकृति का संतुलन पूरी तरह से डगमगा जाता है। आज हम दुनिया भर में जो बेमौसम बारिश, अत्यधिक सूखा, भयानक बाढ़ और असहनीय गर्मी का प्रकोप देख रहे हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा संतुलन बहाल करने का एक कठोर प्रयास है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, सुंदर और जीवंत पृथ्वी मिले, तो हमें अपनी आदतों और सोच को बदलना ही होगा।
(लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी हैं)












