विचार: विश्व फुटबॉल में फिसड्डी क्यों हैं हम
फुटबॉल के क्षेत्र में भी प्रतिभाएं खोजने के लिए शुरुआत स्कूलों से करनी चाहिए। खेल का एक पीरियड निर्धारित करके फुटबाल में रुचि रखने वाले खिलाड़ियों का चयन करना चाहिए।
HighLights
भारत की फुटबॉल रैंकिंग वैश्विक स्तर पर 138वीं है।
छोटे देश भी फीफा विश्व कप में भाग लेते हैं।
ग्रासरूट स्तर से प्रतिभाओं को तराशने की आवश्यकता है।
गिरीश पंकज। भारत 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाला देश है, लेकिन जब कभी वैश्विक स्तर पर फुटबाल की बात होती है तो भारत का नाम न देखकर पीड़ा होती है। इस मामले में न केवल पूरे देश को, वरन सरकार को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर हमारे खिलाड़ी और टीम फुटबाल में वैश्विक स्तर पर क्यों नहीं पहुंच पाए? हमारा देश अभी उस लायक क्यों नहीं बना कि फुटबाल की वैश्विक प्रतियोगिता में हिस्सा ले सके? यह देख कर हैरत होती है कि पराग्वे, कुराकाओ और केप वर्दे जैसे कई छोटे-छोटे देश भी फीफा विश्व कप में खेल रहे हैं। पराग्वे की आबादी 70 लाख के आसपास है, केप वर्दे की साढ़े पांच लाख, जबकि कुराकाओ की आबादी डेढ़ लाख है। मतलब भारत जैसे देश के नगर या उपनगर जैसी आबादी वाले देश भी फीफा विश्व कप का हिस्सा हैं। वहीं, हम फुटबाल विश्व कप आयोजन के महज दर्शक बने हुए हैं?
समय आ गया है कि अब हमें फुटबाल के भी वैश्विक स्तर के खिलाड़ी तैयार करने पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस महादेश में से हम भी डिएगो माराडोना, पेले आदि की तरह आगे बढ़ रहे लियोन मेसी, रोनाल्डो, हालैंड, नेमार, एमबापे जैसे खिलाड़ी विकसित कर सकेंगे, लेकिन इसके लिए गांव-गांव और स्कूल-स्कूल सर्वे करना होगा और प्रतिभाशाली खिलाड़ी खोजने होंगे। उन्हें हर तरह की सुविधाएं मुहैया करानी होंगी, तब कहीं जाकर हम अच्छे फुटबाल खिलाड़ी तैयार कर सकेंगे। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत फुटबाल में फिसड्डी क्यों है, जबकि इस देश में फुटबाल को लेकर जुनून कम नहीं है। बंगाल में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल जैसे क्लब वर्षों से फुटबाल का आयोजन कर रहे हैं।
बंगाल में फुटबाल का क्रेज ऐसा है कि वहां फुटबाल को लेकर उपन्यास लिखे गए। मोती नंदी जैसे बड़े लेखक ने फुटबाल केंद्रित उपन्यास 'स्ट्राइकर' और 'स्टापर' लिखे हैं। आज क्रिकेट के महासागर में गोते लगाने वाले इस देश में फुटबाल का समृद्ध इतिहास रहा है, लेकिन जून 2026 की ताजा फीफा रैंकिंग में भारतीय पुरुष फुटबाल टीम विश्व में 138वें स्थान पर है। यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर टिकने के लिए हमें अभी एक लंबी और कठिन यात्रा तय करनी है। भारतीय टीम एशियाई फुटबाल परिसंघ की रैंकिंग में 26वें स्थान के आसपास संघर्ष कर रही है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है कि यदि हम थोड़ा और नीचे खिसके तो विश्व कप 2030 के क्वालीफायर में सीधे प्रवेश के बजाय कठिन नाकआउट दौर से गुजरना पड़ सकता है।
ऐसा नहीं है कि अपने देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के फुटबाल खिलाड़ी नहीं रहे हैं। सुनील छेत्री, बाइचुंग भूटिया, चुन्नी गोस्वामी, आइएम विजयन, पीके बैनर्जी, गुरप्रीत सिंह संधू जैसे खिलाड़ियों के नाम हम सब जानते हैं। सुनील छेत्री भारत के अब तक के सबसे सफल और महान फुटबालर हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फुटबाल में सर्वाधिक गोल किए हैं और सबसे ज्यादा मैच खेले हैं। उन्हें कैप्टन फैंटास्टिक के नाम से भी जाना जाता है। बाइचुंग भूटिया सिक्किमी स्नाइपर के नाम से मशहूर हैं। चुन्नी गोस्वामी ने 1962 के एशियाई खेलों में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था। ऐसे विश्वस्तरीय खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए हमें गंभीर प्रयास करने होंगे। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की तरह फुटबाल की संस्था बनानी चाहिए। फिर यह देश में फुटबाल खिलाड़ी खोजने की मुहिम चलाए और जो प्रतिभाशाली खिलाड़ी नजर आएं उन्हें आगे बढ़ाए। उसके प्रशिक्षण पर रकम खर्च करे, पर यह भी ध्यान रखना होगा कि यह बोर्ड भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाए। फुटबाल जोखिम भरा खेल है। समृद्ध घर के नौजवान इस खेल में ज्यादा नहीं आते हैं, इसलिए खिलाड़ियों को खोजने गांव-गांव जाना होगा। जैसे इस देश में क्रिकेट को लेकर आइपीएल हो रहा है, उसी तर्ज पर फुटबाल को लेकर भी खेल प्रतियोगिताएं होनी चाहिए।
वैसे खेलो इंडिया अभियान के तहत अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ का ध्यान अब आठ से 12 वर्ष की आयु के बच्चों पर केंद्रित हुआ है। देश भर में बने खेलो इंडिया सेंटर्स निचले स्तर से प्रतिभाओं को तराशने का काम कर रहे हैं। इसके परिणाम कब तक आएंगे, कहना मुश्किल है। भारत के बड़े-बड़े उद्योगपतियों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे क्रिकेट के साथ ही फुटबाल को भी प्रमोट करें। अगर ईमानदारी और समर्पण के साथ एक लक्ष्य लेकर हम चलें तो आने वाले समय में देश से भी महान फुटबालर पैदा हो सकते हैं। हम विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाएं खोजने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं।
फुटबाल के क्षेत्र में भी प्रतिभाएं खोजने के लिए शुरुआत स्कूलों से करनी चाहिए। खेल का एक पीरियड निर्धारित करके फुटबाल में रुचि रखने वाले खिलाड़ियों का चयन करना चाहिए। इस नब्बे मिनट के खेल के लिए शरीर में ऊर्जा और चपलता की आवश्यकता होती है, इस दृष्टि से बच्चों का चयन करना चाहिए। निश्चित रूप से ऐसे अनेक बच्चे सामने आएंगे, जो फुटबाल के लिए ही बने होंगे। ऐसे बच्चों का चयन करके उन्हें फुटबाल खिलाड़ी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। सरकार को इन पर खर्च करना चाहिए। न केवल फुटबाल, बल्कि हाकी आदि अन्य खेलों के लिए भी हमें इसी सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
(लेखक ग्रामीण विकास मंत्रालय के सदस्य हैं)












