विचार: इतिहास के सच्चे नायकों की सुध
ऐसे में 'सुहरावर्दी एवेन्यू रोड' का 'गोपाल मुखर्जी रोड' में परिवर्तन इतिहास के नायकों और खलनायकों की सही पहचान स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
HighLights
सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम गोपाल मुखर्जी रोड हुआ।
गोपाल पाठा ने दंगों में हिंदुओं की रक्षा की।
सुहरावर्दी परिवार विभाजनकारी राजनीति का समर्थक था।
प्रणय कुमार। बीत दिनों कोलकाता नगर निगम ने 'सुहरावर्दी एवेन्यू रोड' का नाम बदलकर 'गोपाल मुखर्जी रोड' कर दिया। इस बदलाव को लेकर जहां कांग्रेस, टीएमसी एवं वामपंथी बुद्धिजीवी यह तर्क दे रहे हैं कि इस सड़क का नाम हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर नहीं, बल्कि उनके चाचा सर हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था, जो अंग्रेजों के जमाने के जाने-माने शिक्षाविद्, चिकित्सक एवं 1930-34 के बीच कलकत्ता विश्ववविद्यालय के वाइस-चांसलर थे। वहीं बंगाल की बहुसंख्यक आबादी इस परिवर्तन को षड्यंत्रपूर्वक विस्मृत कर दिए गए एक महान नायक 'गोपाल पाठा' (प्रचलित नाम) को उचित सम्मान दिलाने के लिए एक आवश्यक कार्रवाई के रूप में देख रही है।
वस्तुतः नाम परिवर्तन के विरोध में खड़े दल एवं बुद्धिजीवी इस मुद्दे को भी अपनी सुविधा से प्रस्तुत कर रहे हैं और तस्वीर के स्याह पहलुओं को जान-बूझकर छुपा रहे हैं। जिस हसन सुहरावर्दी को वे एक महान शिक्षाविद्, चिकित्सक, समाजसेवी बताते नहीं थक रहे, दरअसल उनकी विरासत एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि उनके भतीजे हुसैन शहीद सुहरावर्दी से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। दोनों न केवल एक ही कुल-खानदान के वारिस थे, बल्कि मुस्लिम लीग के नेता भी थे। दोनों ने विभाजनकारी राजनीति का पोषण किया। दोनों जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रबल समर्थक थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा हसन सुहरावर्दी को 'नाइटहुड' की उपाधि इसलिए प्रदान की गई थी, क्योंकि उन्होंने छह फरवरी, 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षा समारोह में तत्कालीन गवर्नर स्टैनली जैक्सन पर गोली चलाने से महान क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता-सेनानी बीना दास को बलपूर्वक रोका था।
इस कदम के लिए जिस दिन बीना दास को जेल भेजा गया, उसी दिन औपनिवेशिक सत्ता के प्रति राजभक्ति प्रदर्शित करने के लिए हसन सुहरावर्दी को 'नाइटहुड' की उपाधि प्रदान की गई। इसके बाद अप्रैल, 1933 में ब्रिटिश सरकार ने उनके नाम पर कोलकाता के एक सड़क का नाम 'सुहरावर्दी एवेन्यू' रखा। यह भी कहा जा रहा है कि हसन सुहरावर्दी ने ब्रिटिश सरकार का विरोध जताने के लिए 1946 में "नाइटहुड" की उपाधि लौटा दी थी। यह भी आधा सच है। पूरा सच यह है कि मुस्लिम लीग के आह्वान पर भारत विभाजन की मांग को व्यापक स्वीकृति दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने 'नाइटहुड' की उपाधि लौटाई थी। हसन सुहरावर्दी की बेटी आगे चलकर पाकिस्तान की पहली महिला सिविल सेवक बनीं, संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल की सदस्य रहीं और पाकिस्तान ने उन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज' से सम्मानित किया। एक ऐसा व्यक्ति, जो अंग्रेजों का अनन्य भक्त हो, एक महान क्रांतिकारी को जेल भिजवाने का दोषी हो, मुस्लिम लीग के नेता के रूप में भारत के विभाजन का समर्थक हो, पृथक पहचान के आधार पर बने एक अलग मुल्क में अपना और अपने वारिसों का भविष्य देखता हो, उसके नाम पर भारत के किसी भी शहर, सड़क, इमारत का नाम क्यों होना चाहिए? आखिर भारत विभाजन के जिम्मेदार लोगों का महिमामंडन क्यों?
जहां तक उनके भतीजे हुसैन शहीद सुहरावर्दी की बात है, तो इतिहास में उसके नाम पर हिंदुओं के दो-दो नरसंहार दर्ज हैं। तब बंगाल में मुस्लिम लीग की अंतरिम सरकार थी। हुसैन शहीद सुहरावर्दी उसका प्रधानमंत्री था। जिन्ना के आह्वान पर 'डायरेक्ट एक्शन डे' का बंगाल में वह नेतृत्व कर रहा था। उसने योजना बनाकर हिंदुओं का नरसंहार सुनिश्चित किया। डायरेक्ट एक्शन डे यानी 16 अगस्त, 1946 से पहले उसने कलकत्ता के 24 थानों में से 22 में मुस्लिम और दो में एंग्लो-इंडियन थाना प्रभारी नियुक्त कर दिए। पुलिसकर्मियों एवं सरकारी कर्मचारियों को तीन दिन का अकारण अवकाश दे दिया। डायरेक्ट एक्शन डे के दिन वह स्वयं पुलिस मुख्यालय के नियंत्रण-कक्ष में बैठकर पुलिसकर्मियों को दंगाइयों के विरुद्ध कार्रवाई से रोक रहा था।
इसका परिणाम यह हुआ कि अकेले कलकत्ता में 6,000 से अधिक हिंदुओं का केवल 72 घंटे में संहार हुआ, 17 हजार से अधिक घायल हुए और एक लाख से अधिक हिंदू बेघर हुए। इस दंगे के बाद नोआखली में हुए दंगों में हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ, बहुसंख्यकों की जान-माल की व्यापक क्षति हुई और माताओं-बहनों को अमानुषिक यातनाओं का शिकार होना पड़ा। यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी आगे चलकर 1956-57 में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना। इस पर देश के आयकर-विभाग ने 1945-46 एवं 1946-47 के लिए 50 लाख रुपये का कर लगाया था, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उदारता दिखाते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री जान मथाई एवं बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र राय को पत्र लिखकर कार्रवाई से उसे मुक्ति दिलवा दी और वह अंततः 1948 में स्थायी रूप से पाकिस्तान चला गया। इसके विपरीत गोपाल पाठा ने न केवल दंगाइयों से हिंदुओं की रक्षा की, बल्कि कलकत्ता को पाकिस्तान में मिलाने की जिन्ना, सुहरावर्दी एवं मुस्लिम लीग की साजिश पर पानी फेर दिया। ऐसे में 'सुहरावर्दी एवेन्यू रोड' का 'गोपाल मुखर्जी रोड' में परिवर्तन इतिहास के नायकों और खलनायकों की सही पहचान स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
(लेखक शिक्षाविद् एवं सामाजिक संस्था 'शिक्षा-सोपान' के संस्थापक हैं)












