विचार: विचारधारा की बलि लेता दलबदल
बेशक शेष देश की तरह उत्तर प्रदेश में भी जनहित के मुद्दों पर विपक्ष सरकार के विरुद्ध बड़ा आंदोलन करने में विफल रहा है, लेकिन राम मंदिर के चढ़ावे में उजागर चोरी भाजपा के लिए ‘सेल्फ गोल’ साबित हो सकती है।
HighLights
मोदी सरकार दलबदल से दो-तिहाई बहुमत जुटा रही है।
तृणमूल, शिवसेना, राकांपा में बड़े पैमाने पर दलबदल।
सत्ता और संविधान संशोधन हेतु विचारधारा की बलि।
राजकुमार सिंह। पिछले लोकसभा चुनाव में 240 सीटों पर ठिठक कर जरूरी बहुमत के लिए तेलुगु देसम पार्टी और जदयू जैसे सहयोगियों पर निर्भर मोदी सरकार दलबदल की बदौलत संसद में दो-तिहाई बहुमत के निकट पहुंचती दिख रही है। बेशक नरसिंह राव सरकार ने भी 1993 में अल्पमत से बहुमत पाने के लिए हरसंभव कवायद की थी, लेकिन दो-तिहाई बहुमत के लिए दूसरे दलों में ऐसी तोड़फोड़ चौंकाने वाली है। इसके मूल में प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक देश, एक चुनाव’ और परिसीमन विधेयक पारित करवाने की महत्वाकांक्षा बताई जा रही है, लेकिन दलबदलुओं के मूल दल और उसकी विचारधारा के प्रति निष्ठा पर सवाल भी उठ रहे हैं।
निःसंदेह 15 साल की सत्ता के बाद तृणमूल कांग्रेस बंगाल की सत्ता से बेदखल हो गई, लेकिन बुरे वक्त में भी 80 विधायक ममता बनर्जी के नाम पर ही जीत कर आए थे, जिनमें से 58 ने यह कहकर अलग गुट बना लिया कि पार्टी अपने रास्ते से भटक गई है। यह सवाल अनुत्तरित है कि दलबदलुओं को रास्ते से भटकाव का अहसास सत्ता से बेदखली के बाद ही क्यों हुआ? सांसदों का मामला और दिलचस्प है। 28 लोकसभा सदस्यों में से 20 ने ममता की पुरानी वफादार काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बगावत कर दी, तो 13 में से चार राज्यसभा सदस्य इस्तीफा देने की नैतिकता दिखा चुके हैं। ममता के नाम पर राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने वाले इन सांसदों को भी राज्य-सत्ता से बेदखली के बाद ही नेता और पार्टी में खामियां नजर आईं।
तृणमूल की शासन शैली से लेकर अभिषेक बनर्जी के दबदबे तक अचानक तो कुछ नहीं हुआ! जिस तरह ये सांसद अल्पज्ञात नेशनल सिटीजंस पार्टी आफ इंडिया में शामिल हुए, उससे भी खेल साफ हो गया। जिस दल के उम्मीदवार की कभी जमानत तक नहीं बच पाई, उसे दलबदल से अचानक 20 सांसद मिल गए तथा चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार सरीखे सत्ता के खिलाड़ियों से भी संख्या के खेल में आगे निकल गया। बंगाल की सत्ता के लिए कांग्रेस से अलग होकर बनी तथा भाजपा एवं कांग्रेस, दोनों से ही चुनावी गठबंधन कर चुकी तृणमूल की अगर कोई विचारधारा रही, तो इन विधायकों-सांसदों ने उसे सत्ता की धारा में विलीन कर दिया, जो आज भाजपा है।
यदि उद्देश्य संविधान संशोधन के लिए जरूरी संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाना है, तो जाहिर है कि यह खेल सिर्फ बंगाल और तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाला था। सो, महाराष्ट्र में टूटी-फूटी उद्धव शिवसेना के सांसदों की भी अंतरात्मा अचानक जाग गई। भाजपा के विरुद्ध आक्रामक प्रचार से विपक्षी गठबंधन के घटक के रूप में शिवसेना उद्धव गुट के उम्मीदवार के तौर पर 2024 में जीते नौ में से छह सांसद बगावत कर विद्रोह के पिछले नायक एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए। तृणमूल की तरह उद्धव की शिवसेना पर भी रास्ते से भटक जाने और आंतरिक लोकतंत्र न होने के आरोप लगे, लेकिन यह सवाल फिर अनुत्तरित है कि यह अहसास अब आकर क्यों हुआ? जाहिर है, सांसदों के बाद विधायकों की भी अंतरात्मा जगेगी। शिंदे की शिवसेना का वजन बढ़ाकर अपने ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पंख कतरने की राजनीतिक थ्योरी भी चर्चा में है, पर फिलहाल निष्कर्ष यही है कि उद्धव अपने पिता बाल ठाकरे की शिवसेना संभाल नहीं पाए। बेशक उद्धव की छवि जोड़तोड़ में माहिर जुझारू राजनेता की नहीं, पर इस सच से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने समान विचार वाले सबसे पुराने मित्र दल भाजपा से नाता तोड़ कर धुर विरोधी कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। उद्धव शिवसेना के सांसदों-विधायकों की बगावत सत्ता की धारा में विचारधारा को विलीन कर देना है, तो शिवसेना का कांग्रेस और राकांपा के साथ गठबंधन भी उसके अलावा कुछ और नहीं था।
अयोध्या ढांचे के ध्वंस पर गर्व करने वाली शिवसेना का कांग्रेस से गठबंधन, सत्ता के समीकरण के अलावा किसी और तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता। अपनी राजनीति का विश्लेषण करने पर उद्धव को यह अहसास हो। अगली सेंधमारी का खतरा शरद पवार की टूटी-फूटी राकांपा पर मंडरा रहा है। विपक्षी गठबंधन के घटक के रूप में उसके टिकट पर पिछले चुनाव में आठ सांसद जीत कर आए हैं। एक बार नाकामी के बाद भतीजे अजित पवार पिछली बार राकांपा तोड़ने में सफल हो ही गए थे। 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ कर राकांपा बनाने वाले शरद पवार भी लगातार कांग्रेस से गठबंधन करते रहे हैं, जो उनके फैसले पर सवालिया निशान ही है। अब राकांपा में एक और टूट की अटकलों के बीच उसके कांग्रेस में विलय की चर्चाएं भी चल पड़ी हैं। तोड़फोड़ के जरिये संसद में दो-तिहाई बहुमत का खेल बंगाल और महाराष्ट्र से ही पूरा नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के सहयोगी सुभासपा के मुखिया और मंत्री ओमप्रकाश राजभर ही नहीं, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी मुख्य विपक्षी दल सपा के सांसदों में बड़ी टूट की आशंका जताई है। पिछले चुनाव में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीत कर 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा को 33 सीटों पर रोक बहुमत से वंचित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। सपा में विभाजन के लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों की बगावत भले आसान न हो, लेकिन तृणमूल और उद्धव शिवसेना के उदाहरणों के मद्देनजर नामुमकिन नहीं। दलबदल के खेल से प्रभावित सभी दल परिवार केंद्रित हैं। हां, सात राज्यसभा सदस्यों की बगावत वाली आम आदमी पार्टी का मामला कुछ अलग है।
बहरहाल उत्तर प्रदेश इसलिए भी एजेंडे में सबसे ऊपर है, क्योंकि अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की ‘हैट्रिक’ के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सत्ता की ‘हैट्रिक’ करना चाहेंगे। 2029 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी उत्तर प्रदेश में सत्ता की हरसंभव बिसात बिछाना भाजपा के लिए जरूरी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)












