विचार: घाटे का सबब साबित हुआ युद्ध
इस समझौते की सफलता दो बातों पर निर्भर करेगी कि क्या ट्रंप अपनी कथनी पर कायम रहेंगे और क्या नेतन्याहू अमेरिका से दूरी बनाते हुए हिजबुल्ला को समाप्त करने के अपने प्रयास जारी रख पाएंगे या नहीं?
HighLights
अमेरिका को युद्ध में भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान हुआ।
ईरान को प्रतिबंध हटने से आर्थिक गति और लाभ मिला।
चीन, भारत, रूस, यूरोप को शांति से लाभ हुआ।
जितेंद्र कुमार त्रिपाठी। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। समझौते पर अमल की राह में कुछ गतिरोधों के बावजूद स्थितियां नियंत्रण में हैं। चूंकि समझौते पर सहमति को कुछ समय बीत गया है, इसलिए इस आकलन को लेकर उत्सुकता बढ़ना स्वाभाविक है कि इस युद्ध और उसके बाद की स्थिति में किसे क्या हासिल हुआ? इसकी पड़ताल करें तो अमेरिका हर तरह से घाटे में रहा। विश्व के सबसे शक्तिशाली देश की उसकी छवि को गहरा झटका लगा है।
समझौते की शर्तों को भी देखें तो अमेरिका बैकफुट पर दिखेगा। जैसे समझौते की एक शर्त यह कहती है कि दोनों पक्ष परस्पर संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे। चूंकि भौगोलिक दृष्टि से ईरान के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह अमेरिका पर आक्रमण करे, इसलिए इस प्रविधान से ईरान का ही लाभ है, क्योंकि अमेरिका अब उस पर आक्रमण नहीं कर सकता। अमेरिका अपने व्यापक हितों की पूर्ति करने में भी अक्षम रहा। ईरान में सत्ता परिवर्तन का उसका मंसूबा धरा रह गया।
ईरान में न केवल कट्टरपंथी सरकार काबिज है, बल्कि दिवंगत शीर्ष नेता खामेनेई के जनाजे में उमड़ी भीड़ भी यही दर्शाने वाली रही कि उसके प्रति समर्थन में कोई कमी नहीं आई है। इतने लंबे समय तक भीषण हमले झेलने के बावजूद ईरान के पास ड्रोन और मिसाइलों का आधा जखीरा अभी भी बचा हुआ है। अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी पूरी तरह से बेपटरी नहीं कर पाया।
दूसरी ओर, अमेरिका पर बोझ की बात करें तो इस युद्ध में अमेरिका ने 1,000 से अधिक क्रूज मिसाइलें और 1,500 से अधिक एयर डिफेंस मिसाइलें खर्च कीं। इतने रक्षा उत्पादन की भरपाई में छह वर्ष तक लग सकते हैं। पेंटागन ने बीते दिनों हथियारों के उत्पादन और आपूर्ति के लिए 29 अरब डालर का बजट मांगा था, जो मूडीज एनालिसिस के अनुसार 132 अरब डालर से अधिक हो सकता है। इसमें खाड़ी स्थित क्षतिग्रस्त अमेरिका के बीस सैन्य अड्डों और 42 लड़ाकू जहाजों की मरम्मत का खर्च शामिल नहीं है। अमेरिका पर इस युद्ध के चलते 1,000 अरब डालर का आर्थिक बोझ पड़ने का आसार है, जिसमें 300 अरब डालर की राशि ईरान में पुनर्निर्माण की प्रतिबद्धता से जुड़ा निवेश है। इस युद्ध में 13 अमेरिकी सैनिकों की जान गईं एवं अमेरिका में महंगाई का असर भी पड़ा।
ईरान युद्ध के कारण विश्व भर में हुई अमेरिका की किरकिरी के चलते राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू राजनीति की राह फिसलन भरी हो गई है। न केवल विपक्षी डेमोक्रेट, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के धड़े भी उनके विरोध में उतर आए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर और ट्रंप के वफादार माने जाने वाले बिल कैसिडी ने तो इस समझौते को अमेरिकी विदेश नीति की "दशकों में सबसे बड़ी भूल" बताया है। ईरान के विरुद्ध इजरायली मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने से पहले ही उसे रोक देने के चलते यहूदी समुदाय भी नाराज है। अमेरिकी सत्ता एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान में यहूदियों का वर्चस्व किसी से छिपा नहीं रहा है। इस समझौते से ट्रंप का कद कुछ कमजोर पड़ा है तो किसी स्थिति में इसके नाकाम रहने का उन्हें और भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में ट्रंप और उनकी नीतियां स्वाभाविक रूप से कसौटी पर होंगी।
युद्ध में भारी नुकसान उठाने के बावजूद ईरान कुछ फायदे की स्थिति में ही दिखता है। अमेरिका ने ईरानी उत्पादों पर जो प्रतिबंध हटाने की बात की है, उससे ईरान की आर्थिकी को गति मिलेगी। ईरान को परमाणु संवर्धन तथा हथियार बनाने पर रोक तो जारी रहेगी, लेकिन नागरिक उपयोग जैसे बिजली उत्पादन के लिए आणविक ऊर्जा के प्रयोग की अनुमति होगी। ईरान को एक बड़ा फायदा होर्मुज जलमार्ग के रूप में मिले रणनीतिक विकल्प का भी मिला है। जहां ईरान होर्मुज में चुंगी वसूलने की बात कर रहा है तो ओमान ने इस मुद्दे से पल्ला झाड़ लिया है। वहीं ट्रंप बार-बार दोहरा रहे हैं कि ईरान को कोई चुंगी नहीं वसूलने दी जाएगी। अगर ईरान को ऐसा कोई अधिकार मिला तो उसके घातक परिणाम होंगे, क्योंकि ऐसी स्थिति में मलक्का, पाक जलडमरूमध्य और बाब-अल-अंदब जैसे रणनीतिक स्थानों के आसपास तटवर्ती देश भी ऐसे शुल्क की मांग करने लगेंगे।
यह समझौता अपने मौजूदा स्वरूप में अमल में आता है तो अमेरिका के बाद सबसे अधिक नुकसान इजरायल को उठाना पड़ेगा। इजरायली जनता प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से पूछेगी कि लगभग चार वर्षों से जारी युद्ध में भारी जानमाल का नुकसान उठाने के बाद देश को आखिर क्या हासिल हुआ? उनके लिए यह राजनीतिक अस्तित्व का मुद्दा बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति से कूटनीतिक दूरी और जनता का आक्रोश उनके लिए परेशानी बढ़ाएगा। अमेरिकी सुरक्षा आवरण को लेकर खाड़ी के देशों का भरोसा भी टूटा है। अब यह देखना है कि क्या ये देश समझौते के अनुसार अपने दुश्मन ईरान के पुनर्निर्माण में सहयोग देंगे या नहीं?
अन्य देशों के दृष्टिकोण से देखें तो युद्ध रुकने की स्थिति में सर्वाधिक लाभ चीन को मिला है। वर्ष 2021 में चीन ने ईरान में 400 अरब डालर के निवेश के बदले बीस वर्षों तक तेल आपूर्ति का जो समझौता किया था वह युद्ध रुकने की स्थिति में आगे बढ़ेगा। भारत को भी युद्ध रुकने से लाभ ही है। इससे कच्चे तेल की अवरुद्ध हुई आपूर्ति फिर सुचारु होगी। चाबहार परियोजना को लेकर भी भारत की राह सुगम हो सकती है। पाकिस्तान के लिए राहत की बात यही रही कि ईरान और सऊदी के बीच पिसने से बच गया।
हालांकि समझौते का श्रेय लेने के उसके मंसूबे धरे ही रह गए, क्योंकि मध्यस्थता के सेहरा कतर के सिर बंधा। इस समझौते पर हस्ताक्षर भी इस्लामाबाद के बजाय जेनेवा में हुए। रूस भी लाभ की स्थिति में है कि उस पर प्रतिबंध नरम पड़ेंगे और ईरान के साथ संबंधों को नया आयाम मिलेगा। हालांकि इससे रूस के तेल एवं गैस का निर्यात प्रभावित हो सकता है। यूरोप को भी ऊर्जा के मोर्चे पर स्थिरता मिलेगी। रूस के प्रति यूरोपीय देशों का रवैया भी कुछ नरम हो सकता है। हालांकि
(लेखक पूर्व राजदूत हैं)












