जागरण संपादकीय: घटिया निर्माण
यह ठीक है कि दिल्ली-देहरादून इकोनमिक कारिडोर की सड़क धंसने के मामले को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने गंभीरता से लिया।
HighLights
दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर की सड़क पहली बारिश में बुरी तरह धंसी।
निर्माण गुणवत्ता और जल निकासी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए।
घटिया निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई की मांग।
इससे शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता कि जिस दिल्ली-देहरादून इकोनमिक कारिडोर का उद्घाटन इसी अप्रैल में प्रधानमंत्री ने किया था, उसकी सड़क पहली बरसात में ही धंस गई। यह सड़क इतनी बुरी तरह धंसी कि कई वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गए। यह गनीमत रही कि किसी की जान नहीं गई, लेकिन यह प्रश्न तो उठेगा ही कि आखिर कोई नई बनी सड़क ढाई माह में ही पहली बरसात का सामना क्यों नहीं कर पाई?
इस प्रश्न का संभावित उत्तर यही हो सकता है कि या तो सड़क निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया या फिर जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की गई। कारण कुछ भी हो, इस तरह के मामले सड़क निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी की ही कहानी कहते हैं। यह कोई पहला मामला नहीं, जब कोई नई बनी सड़क धंस गई हो। इस तरह की घटनाएं रह-रहकर सामने आती रहती हैं।
कभी नई बनी सड़क धंस जाती है तो कभी नया बना पुल क्षतिग्रस्त हो जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं कि कोई पुल उद्घाटन के पहले ही गिर गया। समस्या केवल यही नहीं कि सड़कों और पुलों के निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता। समस्या यह भी है कि कई बार उनकी डिजाइन में तमाम खामियां होती हैं, जिसके चलते दुर्घटनाएं होती हैं।
यह ठीक है कि दिल्ली-देहरादून इकोनमिक कारिडोर की सड़क धंसने के मामले को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने गंभीरता से लिया और संबंधित प्रोजेक्ट मैनेजर एवं टीम लीडर को निलंबित करने के साथ कारिडोर का रखरखाव करने वाली कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, लेकिन यदि इस मामले में कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाती तो आगे भी ऐसे शर्मनाक मामले देखने को मिलेंगे। यह ध्यान रहे कि निलंबन या स्थानांतरण कोई कठोर कार्रवाई नहीं होती।
ज्यादातर मामलों में निलंबित अधिकारी कुछ समय बाद या तो बहाल हो जाते हैं या फिर उनका स्थानांतरण कर दिया जाता है। यह भी किसी से छिपा नहीं कि घटिया निर्माण के लिए जिम्मेदार कंपनियां यदि कभी काली सूची में डाली भी जाती हैं तो कुछ समय बाद वे इस सूची से बाहर आ जाती हैं या फिर नाम बदलकर नए सिरे से सक्रिय हो जाती हैं। यदि सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचे संबंधी अन्य निर्माण की गुणवत्ता में अनदेखी के सिलसिले को रोकना है तो संबंधित अधिकारियों को कठोर दंड का भागीदार बनाना होगा।
अपने देश की समस्या यह है कि घटिया निर्माण या फिर सार्वजनिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी के चलते होने वाले बड़े से बड़े हादसों के दोषी किसी अधिकारी की नौकरी मुश्किल से ही जाती है, क्योंकि जांच नौकरशाह करते हैं और वे येन-केन-प्रकारेण अपने साथी नौकरशाहों का बचाव ही करते हैं। इसका ही नतीजा है कि घटिया निर्माण का सिलसिला थम नहीं रहा है।












