नशीले पदार्थों के तस्करों की गतिविधियों को देखते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस यानी एनडीपीएस एक्ट में संशोधन करने की जो जरूरत जताई, उसकी पूर्ति यथाशीघ्र की जानी चाहिए। उचित यह होगा कि राज्य सरकारें इस कानून में वांछित संशोधन के लिए सुझाव देने का काम तत्परता से करें, क्योंकि नशे के तस्करों से निपटने में उनका योगदान बहुत अहम है।

वे इससे भी परिचित हैं कि नशे के तस्कर एनडीपीएस एक्ट की किन खामियों का लाभ उठाते हैं। निःसंदेह नशा तस्करों के खिलाफ सख्ती बरती जा रही है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि उनके हौसले पस्त नहीं हो पा रहे हैं और इसका पता इससे चलता है कि नारकोटिक्स ब्यूरो एवं अन्य एजेंसियों की तमाम सक्रियता के बाद भी देश में बड़े पैमाने पर चोरी-छिपे मादक पदार्थ लाए जा रहे हैं।

देश के कुछ राज्यों और विशेष रूप से सीमावर्ती राज्यों में नशे के तस्करों की गतिविधियां कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही हैं। इनमें पंजाब के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के राज्य प्रमुख हैं। भारत में विशेष रूप से पाकिस्तान, म्यांमार, ईरान आदि से बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थ आ रहे हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि पिछले कुछ समय से देश में भी नशीले पदार्थों का चोरी-छिपे निर्माण किया जा रहा है। निःसंदेह यह भी एक चुनौती है।

देश में किस तरह नशीले पदार्थों की आवक बढ़ रही है, इसका पता इससे चलता है कि जहां वर्ष 2004 से 2014 के बीच 26 लाख किलो सिंथेटिक मादक पदार्थ जब्त किए गए, वहीं 2014 से 2026 के बीच 1.18 करोड़ किलो सिंथेटिक मादक पदार्थ जब्त किए गए। इससे एक ओर जहां यह पता चलता है कि मादक पदार्थों की तस्करी रोकने में संबंधित एजेंसियों को लगातार सफलता मिल रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी रेखांकित होता है कि मादक पदार्थों के तस्करों का दुस्साहस बढ़ रहा है।

मादक पदार्थों के तस्करों पर सख्ती बरतने की आवश्यकता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि नशा केवल युवा पीढ़ी के भविष्य को ही बर्बाद नहीं करता, बल्कि उसके कारोबारी देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी पैदा करते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि नशीले पदार्थों की तस्करी से हासिल किए जाने वाले पैसे से अपराधी आधुनिक हथियार खरीदते हैं।

अपराधियों के कई गिरोह ऐसे हैं, जो अपने अपराध तंत्र को खड़ा करने के लिए नशीले पदार्थों का कारोबार करते हैं। इसी तरह कई आतंकी संगठन भी नशीले पदार्थों की तस्करी करते हैं। यह सही है कि मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाने की बात की जा रही है, लेकिन जब तक नशे के कारोबारी दबाव में नहीं आते, तब तक इस नीति के वांछित नतीजे हासिल नहीं हो सकते।